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चुनाव जीतना ही नहीं, प्रशासन चलाने की समझ भी जरूरी: राजस्थान में "स्टेट्समैन इंडिया पार्टी (इंटेलेक्चुअल)"ने शुरू किया बड़ा अभियान
Digital Desk
राजस्थान की उभरती हुई राजनीतिक पार्टी "स्टेट्समैन इंडिया पार्टी (इंटेलेक्चुअल)" (Statesman India Party (Intellectual)/ SIPI) ने आज राज्यभर में एक बड़े जनसंपर्क और युवा जागरूकता अभियान की शुरुआत करते हुए निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के लिए “अनिवार्य प्रशासनिक प्रशिक्षण” लागू करने की मांग को फिर से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। पार्टी ने दावा किया है कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में केवल चुनाव जीत लेना प्रशासन चलाने की योग्यता का प्रमाण नहीं हो सकता और देश को अब ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो राजनीतिक रूप से लोकप्रिय होने के साथ-साथ प्रशासनिक रूप से भी प्रशिक्षित और सक्षम हो।
पार्टी द्वारा शुरू किए गए इस अभियान में युवाओं, शिक्षकों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न पेशेवर वर्गों से जुड़ने की कोशिश की जा रही है। जयपुर सहित राजस्थान के कई जिलों में पार्टी कार्यकर्ताओं ने पर्चे बांटे, बैठकों का आयोजन किया और सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को इस प्रस्ताव के समर्थन में जोड़ने की अपील की। पार्टी नेताओं का कहना है कि आने वाले दिनों में यह अभियान पूरे देश में भी फैलाया जाएगा।
पार्टी के अनुसार, यदि देश की नौकरशाही में किसी अधिकारी को प्रशासन संभालने से पहले कठिन परीक्षाओं, प्रशिक्षण और व्यावहारिक अभ्यास से गुजरना पड़ता है, तो सांसदों और विधायकों के लिए भी न्यूनतम प्रशासनिक समझ अनिवार्य होनी चाहिए। प्रस्तावित मॉडल के तहत चुनाव जीतने के बाद प्रत्येक सांसद और विधायक को एक निर्धारित अवधि का प्रशिक्षण लेना होगा। इसमें अर्थव्यवस्था, समाजशास्त्र, वैज्ञानिक सोच, संविधान, कानून, अंतरराष्ट्रीय संबंध, व्यापारिक वातावरण, बजट प्रबंधन, ग्रामीण विकास, तकनीकी प्रशासन और आपदा प्रबंधन जैसे विषय शामिल किए जाने की बात कही गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विचार भारतीय राजनीति में एक नया विमर्श खड़ा कर रहा है।
हालांकि इस अवधारणा को सबसे पहले विराज जन पार्टी और उसके संस्थापक प्रशांत कुमार सैनी द्वारा सामने रखा गया था। उस समय पार्टी ने तर्क दिया था कि जिस देश में प्रशासनिक अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण आवश्यक है, वहां नीति निर्माण और शासन चलाने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए भी मूलभूत प्रशासनिक दक्षता जरूरी होनी चाहिए।
बाद में यही विचार अलग होकर बनी Statesman India Party (Intellectual)/ (स्टेट्समैन इंडिया पार्टी (इंटेलेक्चुअल) ) ने और अधिक विस्तृत तथा व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत किया। पार्टी ने दावा किया कि उसने इस अवधारणा को केवल नारे तक सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रशिक्षण प्रणाली का एक विस्तृत मॉडल तैयार किया है जिसमें प्रशिक्षण की समय-सीमा, विषय, मूल्यांकन प्रक्रिया, व्यावहारिक अभ्यास और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े कई प्रावधान शामिल हैं।
गौरतलब है कि स्टेट्समैन इंडिया पार्टी (इंटेलेक्चुअल)/SIPI का गठन उन नेताओं और सदस्यों द्वारा किया गया था जो पहले विराज जन पार्टी और अर्जुन भारत नेशनल पार्टी (एबीएनपी) से जुड़े हुए थे। वैचारिक मतभेदों और राजनीतिक दिशा को लेकर हुए विवादों के बाद इस नए संगठन ने स्वयं को “बौद्धिक और प्रशासनिक सुधार आधारित राजनीतिक मंच” के रूप में प्रस्तुत किया।
वहीं दूसरी ओर, इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक विवाद भी तेज होता जा रहा है। अर्जुन भारत नेशनल पार्टी (ABNP) लगातार इस विचार का विरोध कर रही है। पार्टी का कहना है कि यह व्यवस्था लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है और इससे आम जनता के प्रतिनिधित्व पर असर पड़ेगा। पार्टी नेताओं का तर्क है कि यदि निर्वाचित प्रतिनिधियों को चुनाव जीतने के बाद किसी प्रशिक्षण या परीक्षा से गुजरना पड़ेगा, तो भविष्य में राजनीति केवल शिक्षित और संपन्न वर्ग तक सीमित होकर रह जाएगी। पार्टी ने यह भी आरोप लगाया है कि इस तरह की व्यवस्था लागू होने पर गरीब, ग्रामीण और धार्मिक रूप से सक्रिय समुदायों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
अर्जुन भारत नेशनल पार्टी ने हाल ही में यह आरोप भी लगाया था कि यह पूरा विचार वास्तव में विराज जन पार्टी की मूल रणनीति का हिस्सा है और Statesman India Party (Intellectual) उसी एजेंडे को आगे बढ़ा रही है। पार्टी का दावा है कि दोनों संगठन सार्वजनिक रूप से अलग दिखाई देते हैं, लेकिन कई मुद्दों पर उनकी सोच एक जैसी है।
इधर, प्रशांत कुमार सैनी ने अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि प्रशासनिक प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल शासन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना है। उन्होंने कहा कि “प्रशिक्षण का भ्रष्टाचार से कोई संबंध नहीं है। यदि कुछ अधिकारी प्रशिक्षण के बाद भी भ्रष्ट हो जाते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि प्रशिक्षण गलत है। समस्या व्यक्ति की नीयत में होती है, व्यवस्था में नहीं।”
हाल के महीनों में यह मुद्दा सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर भी चर्चा का विषय बना हुआ है। कुछ युवा वर्ग इस प्रस्ताव को आधुनिक और भविष्य उन्मुख सोच बता रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर अतिरिक्त शर्त लगाने के रूप में देख रहे हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह बहस और तेज हो सकती है क्योंकि कई क्षेत्रीय दल अब प्रशासनिक सुधार, राजनीतिक प्रशिक्षण और जवाबदेही जैसे मुद्दों को चुनावी एजेंडा बनाने लगे हैं।
इस बीच स्टेट्समैन इंडिया पार्टी (इंटेलेक्चुअल) ने घोषणा की है कि वह जल्द ही अपने प्रस्ताव का विस्तृत दस्तावेज राज्य और केंद्र सरकार को भेजेगी। पार्टी का कहना है कि यदि देश में डॉक्टर, इंजीनियर, न्यायाधीश, सैन्य अधिकारी और प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए विशेष प्रशिक्षण जरूरी है, तो करोड़ों लोगों के भविष्य से जुड़े निर्णय लेने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए भी न्यूनतम प्रशासनिक प्रशिक्षण आवश्यक होना चाहिए।
राजनीतिक हलकों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या आने वाले वर्षों में भारत की राजनीति केवल चुनावी भाषणों और जनसभाओं तक सीमित रहेगी या फिर प्रशासनिक दक्षता और पेशेवर क्षमता भी राजनीतिक नेतृत्व का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेगी।
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पार्टी द्वारा शुरू किए गए इस अभियान में युवाओं, शिक्षकों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न पेशेवर वर्गों से जुड़ने की कोशिश की जा रही है। जयपुर सहित राजस्थान के कई जिलों में पार्टी कार्यकर्ताओं ने पर्चे बांटे, बैठकों का आयोजन किया और सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को इस प्रस्ताव के समर्थन में जोड़ने की अपील की। पार्टी नेताओं का कहना है कि आने वाले दिनों में यह अभियान पूरे देश में भी फैलाया जाएगा।
पार्टी के अनुसार, यदि देश की नौकरशाही में किसी अधिकारी को प्रशासन संभालने से पहले कठिन परीक्षाओं, प्रशिक्षण और व्यावहारिक अभ्यास से गुजरना पड़ता है, तो सांसदों और विधायकों के लिए भी न्यूनतम प्रशासनिक समझ अनिवार्य होनी चाहिए। प्रस्तावित मॉडल के तहत चुनाव जीतने के बाद प्रत्येक सांसद और विधायक को एक निर्धारित अवधि का प्रशिक्षण लेना होगा। इसमें अर्थव्यवस्था, समाजशास्त्र, वैज्ञानिक सोच, संविधान, कानून, अंतरराष्ट्रीय संबंध, व्यापारिक वातावरण, बजट प्रबंधन, ग्रामीण विकास, तकनीकी प्रशासन और आपदा प्रबंधन जैसे विषय शामिल किए जाने की बात कही गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विचार भारतीय राजनीति में एक नया विमर्श खड़ा कर रहा है।
हालांकि इस अवधारणा को सबसे पहले विराज जन पार्टी और उसके संस्थापक प्रशांत कुमार सैनी द्वारा सामने रखा गया था। उस समय पार्टी ने तर्क दिया था कि जिस देश में प्रशासनिक अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण आवश्यक है, वहां नीति निर्माण और शासन चलाने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए भी मूलभूत प्रशासनिक दक्षता जरूरी होनी चाहिए।
बाद में यही विचार अलग होकर बनी Statesman India Party (Intellectual)/ (स्टेट्समैन इंडिया पार्टी (इंटेलेक्चुअल) ) ने और अधिक विस्तृत तथा व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत किया। पार्टी ने दावा किया कि उसने इस अवधारणा को केवल नारे तक सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रशिक्षण प्रणाली का एक विस्तृत मॉडल तैयार किया है जिसमें प्रशिक्षण की समय-सीमा, विषय, मूल्यांकन प्रक्रिया, व्यावहारिक अभ्यास और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े कई प्रावधान शामिल हैं।
गौरतलब है कि स्टेट्समैन इंडिया पार्टी (इंटेलेक्चुअल)/SIPI का गठन उन नेताओं और सदस्यों द्वारा किया गया था जो पहले विराज जन पार्टी और अर्जुन भारत नेशनल पार्टी (एबीएनपी) से जुड़े हुए थे। वैचारिक मतभेदों और राजनीतिक दिशा को लेकर हुए विवादों के बाद इस नए संगठन ने स्वयं को “बौद्धिक और प्रशासनिक सुधार आधारित राजनीतिक मंच” के रूप में प्रस्तुत किया।
वहीं दूसरी ओर, इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक विवाद भी तेज होता जा रहा है। अर्जुन भारत नेशनल पार्टी (ABNP) लगातार इस विचार का विरोध कर रही है। पार्टी का कहना है कि यह व्यवस्था लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है और इससे आम जनता के प्रतिनिधित्व पर असर पड़ेगा। पार्टी नेताओं का तर्क है कि यदि निर्वाचित प्रतिनिधियों को चुनाव जीतने के बाद किसी प्रशिक्षण या परीक्षा से गुजरना पड़ेगा, तो भविष्य में राजनीति केवल शिक्षित और संपन्न वर्ग तक सीमित होकर रह जाएगी। पार्टी ने यह भी आरोप लगाया है कि इस तरह की व्यवस्था लागू होने पर गरीब, ग्रामीण और धार्मिक रूप से सक्रिय समुदायों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
अर्जुन भारत नेशनल पार्टी ने हाल ही में यह आरोप भी लगाया था कि यह पूरा विचार वास्तव में विराज जन पार्टी की मूल रणनीति का हिस्सा है और Statesman India Party (Intellectual) उसी एजेंडे को आगे बढ़ा रही है। पार्टी का दावा है कि दोनों संगठन सार्वजनिक रूप से अलग दिखाई देते हैं, लेकिन कई मुद्दों पर उनकी सोच एक जैसी है।
इधर, प्रशांत कुमार सैनी ने अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि प्रशासनिक प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल शासन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना है। उन्होंने कहा कि “प्रशिक्षण का भ्रष्टाचार से कोई संबंध नहीं है। यदि कुछ अधिकारी प्रशिक्षण के बाद भी भ्रष्ट हो जाते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि प्रशिक्षण गलत है। समस्या व्यक्ति की नीयत में होती है, व्यवस्था में नहीं।”
हाल के महीनों में यह मुद्दा सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर भी चर्चा का विषय बना हुआ है। कुछ युवा वर्ग इस प्रस्ताव को आधुनिक और भविष्य उन्मुख सोच बता रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर अतिरिक्त शर्त लगाने के रूप में देख रहे हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह बहस और तेज हो सकती है क्योंकि कई क्षेत्रीय दल अब प्रशासनिक सुधार, राजनीतिक प्रशिक्षण और जवाबदेही जैसे मुद्दों को चुनावी एजेंडा बनाने लगे हैं।
इस बीच स्टेट्समैन इंडिया पार्टी (इंटेलेक्चुअल) ने घोषणा की है कि वह जल्द ही अपने प्रस्ताव का विस्तृत दस्तावेज राज्य और केंद्र सरकार को भेजेगी। पार्टी का कहना है कि यदि देश में डॉक्टर, इंजीनियर, न्यायाधीश, सैन्य अधिकारी और प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए विशेष प्रशिक्षण जरूरी है, तो करोड़ों लोगों के भविष्य से जुड़े निर्णय लेने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए भी न्यूनतम प्रशासनिक प्रशिक्षण आवश्यक होना चाहिए।
राजनीतिक हलकों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या आने वाले वर्षों में भारत की राजनीति केवल चुनावी भाषणों और जनसभाओं तक सीमित रहेगी या फिर प्रशासनिक दक्षता और पेशेवर क्षमता भी राजनीतिक नेतृत्व का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेगी।
