48 घंटे में अरागची का तीसरा पाकिस्तान दौरा, क्या अमेरिका-ईरान डील करीब?

अंतर्राष्ट्रीय डेस्क

By Rohit.P
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अब्बास अरागची 48 घंटे में तीसरी बार पाकिस्तान पहुंचे। अमेरिका-ईरान डील, होर्मुज स्ट्रेट और परमाणु विवाद पर कूटनीति तेज हुई।

इस्लामाबाद में अब्बास अरागची की लगातार आवाजाही ने पश्चिम एशिया की कूटनीति को अचानक तेज कर दिया है। 48 घंटे के भीतर तीसरी बार पाकिस्तान पहुंचे ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ऐसे समय इस्लामाबाद पहुंचे हैं, जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने की कोशिशें निर्णायक मोड़ पर हैं। अरागची का यह दौरा सिर्फ द्विपक्षीय संपर्क नहीं, बल्कि एक व्यापक कूटनीतिक कवायद का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें पाकिस्तान बैक-चैनल मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। इससे पहले अरागची रूस और ओमान का दौरा कर चुके हैं। व्हाइट हाउस ने भी पुष्टि की है कि ईरान की ओर से एक नया प्रस्ताव मिला है, जिस पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के साथ चर्चा की है। हालांकि, दोनों पक्ष अब भी मूल मुद्दों पर सहमत नहीं दिख रहे। ऐसे में अरागची की पाकिस्तान यात्रा को संभावित अमेरिका-ईरान डील की जमीन तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अरागची इस्लामाबाद के जरिए वॉशिंगटन तक नया संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तान इस पूरे गतिरोध में संदेशवाहक और मध्यस्थ, दोनों भूमिकाओं में उभरा है। सूत्रों के मुताबिक, अरागची अपने पिछले दौरे में एक “रेड लाइन दस्तावेज पाकिस्तान को सौंप चुके हैं, जिसमें ईरान की शर्तें स्पष्ट की गई थीं।

इन शर्तों में सबसे अहम होर्मुज स्ट्रेट को लेकर सुरक्षा ढांचा, अमेरिकी नौसैनिक दबाव में ढील और युद्धविराम के बाद परमाणु वार्ता की रूपरेखा शामिल है। ईरान की प्राथमिकता फिलहाल सैन्य तनाव कम करना और खाड़ी क्षेत्र में समुद्री आवाजाही सामान्य करना है।

पाकिस्तान की भूमिका

इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका अचानक केंद्रीय हो गई है। इस्लामाबाद ईरान और अमेरिका के बीच प्रत्यक्ष वार्ता का मंच नहीं, लेकिन भरोसेमंद संपर्क-चैनल के रूप में सामने आया है। अरागची की लगातार यात्राएं संकेत देती हैं कि तेहरान फिलहाल पाकिस्तान के जरिए ही अपनी शर्तें आगे बढ़ाना चाहता है।

पाकिस्तानी नेतृत्व पहले भी अमेरिका और ईरान के बीच सीमित संवाद को आगे बढ़ाने की कोशिश कर चुका है। मौजूदा दौर में उसकी भूमिका संदेशों के आदान-प्रदान, प्रस्तावों की भाषा और बातचीत के फ्रेमवर्क तक सीमित लेकिन अहम मानी जा रही है।

इससे पहले अरागची ने रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की। करीब 90 मिनट चली इस बैठक में अमेरिका-इजराइल से जुड़े संघर्ष, क्षेत्रीय सुरक्षा और ईरान-रूस रणनीतिक साझेदारी पर चर्चा हुई। ईरान ने संकेत दिया कि वह किसी भी संभावित समझौते से पहले रूस को अपने पक्ष में बनाए रखना चाहता है। पुतिन ने भी पश्चिम एशिया में शांति बहाली के प्रयासों का समर्थन करने की बात कही।

व्हाइट हाउस के अनुसार, ईरान ने जो प्रस्ताव भेजा है, उसमें होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने और युद्ध समाप्ति की दिशा में आगे बढ़ने की बात है। लेकिन इस प्रस्ताव में परमाणु कार्यक्रम पर तत्काल चर्चा शामिल नहीं है। यही सबसे बड़ा अड़ंगा बना हुआ है। अमेरिकी प्रशासन चाहता है कि परमाणु मुद्दा किसी भी समझौते का शुरुआती हिस्सा हो, जबकि ईरान पहले युद्धविराम और समुद्री रास्तों पर सहमति चाहता है।

अटका हुआ समझौता

यही मतभेद फिलहाल किसी बड़े समझौते को रोक रहे हैं। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि परमाणु मुद्दे को टालना ईरान को रणनीतिक बढ़त देगा। दूसरी ओर, तेहरान का तर्क है कि युद्ध और नाकेबंदी के बीच परमाणु शर्तों पर दबाव में बातचीत स्वीकार्य नहीं होगी।

इस गतिरोध का असर सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं है। होर्मुज स्ट्रेट में अनिश्चितता से वैश्विक तेल आपूर्ति, ऊर्जा कीमतों और समुद्री व्यापार पर दबाव बना हुआ है। यही वजह है कि ओमान, रूस और पाकिस्तान जैसे देश सक्रिय रूप से इस प्रक्रिया में जुड़े हुए हैं।

फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है, लेकिन अरागची की तेज कूटनीतिक सक्रियता यह संकेत जरूर देती है कि ईरान बातचीत का दरवाजा बंद नहीं करना चाहता। अब निगाहें इस बात पर हैं कि पाकिस्तान के जरिए भेजे गए ताजा प्रस्ताव पर वॉशिंगटन क्या रुख अपनाता है। अगर अमेरिका और ईरान शुरुआती शर्तों पर न्यूनतम सहमति बना लेते हैं, तो आने वाले दिनों में यह गतिरोध औपचारिक वार्ता में बदल सकता है।

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28 Apr 2026 By Rohit.P

48 घंटे में अरागची का तीसरा पाकिस्तान दौरा, क्या अमेरिका-ईरान डील करीब?

अंतर्राष्ट्रीय डेस्क

इस्लामाबाद में अब्बास अरागची की लगातार आवाजाही ने पश्चिम एशिया की कूटनीति को अचानक तेज कर दिया है। 48 घंटे के भीतर तीसरी बार पाकिस्तान पहुंचे ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ऐसे समय इस्लामाबाद पहुंचे हैं, जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने की कोशिशें निर्णायक मोड़ पर हैं। अरागची का यह दौरा सिर्फ द्विपक्षीय संपर्क नहीं, बल्कि एक व्यापक कूटनीतिक कवायद का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें पाकिस्तान बैक-चैनल मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। इससे पहले अरागची रूस और ओमान का दौरा कर चुके हैं। व्हाइट हाउस ने भी पुष्टि की है कि ईरान की ओर से एक नया प्रस्ताव मिला है, जिस पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के साथ चर्चा की है। हालांकि, दोनों पक्ष अब भी मूल मुद्दों पर सहमत नहीं दिख रहे। ऐसे में अरागची की पाकिस्तान यात्रा को संभावित अमेरिका-ईरान डील की जमीन तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अरागची इस्लामाबाद के जरिए वॉशिंगटन तक नया संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तान इस पूरे गतिरोध में संदेशवाहक और मध्यस्थ, दोनों भूमिकाओं में उभरा है। सूत्रों के मुताबिक, अरागची अपने पिछले दौरे में एक “रेड लाइन दस्तावेज पाकिस्तान को सौंप चुके हैं, जिसमें ईरान की शर्तें स्पष्ट की गई थीं।

इन शर्तों में सबसे अहम होर्मुज स्ट्रेट को लेकर सुरक्षा ढांचा, अमेरिकी नौसैनिक दबाव में ढील और युद्धविराम के बाद परमाणु वार्ता की रूपरेखा शामिल है। ईरान की प्राथमिकता फिलहाल सैन्य तनाव कम करना और खाड़ी क्षेत्र में समुद्री आवाजाही सामान्य करना है।

पाकिस्तान की भूमिका

इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका अचानक केंद्रीय हो गई है। इस्लामाबाद ईरान और अमेरिका के बीच प्रत्यक्ष वार्ता का मंच नहीं, लेकिन भरोसेमंद संपर्क-चैनल के रूप में सामने आया है। अरागची की लगातार यात्राएं संकेत देती हैं कि तेहरान फिलहाल पाकिस्तान के जरिए ही अपनी शर्तें आगे बढ़ाना चाहता है।

पाकिस्तानी नेतृत्व पहले भी अमेरिका और ईरान के बीच सीमित संवाद को आगे बढ़ाने की कोशिश कर चुका है। मौजूदा दौर में उसकी भूमिका संदेशों के आदान-प्रदान, प्रस्तावों की भाषा और बातचीत के फ्रेमवर्क तक सीमित लेकिन अहम मानी जा रही है।

इससे पहले अरागची ने रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की। करीब 90 मिनट चली इस बैठक में अमेरिका-इजराइल से जुड़े संघर्ष, क्षेत्रीय सुरक्षा और ईरान-रूस रणनीतिक साझेदारी पर चर्चा हुई। ईरान ने संकेत दिया कि वह किसी भी संभावित समझौते से पहले रूस को अपने पक्ष में बनाए रखना चाहता है। पुतिन ने भी पश्चिम एशिया में शांति बहाली के प्रयासों का समर्थन करने की बात कही।

व्हाइट हाउस के अनुसार, ईरान ने जो प्रस्ताव भेजा है, उसमें होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने और युद्ध समाप्ति की दिशा में आगे बढ़ने की बात है। लेकिन इस प्रस्ताव में परमाणु कार्यक्रम पर तत्काल चर्चा शामिल नहीं है। यही सबसे बड़ा अड़ंगा बना हुआ है। अमेरिकी प्रशासन चाहता है कि परमाणु मुद्दा किसी भी समझौते का शुरुआती हिस्सा हो, जबकि ईरान पहले युद्धविराम और समुद्री रास्तों पर सहमति चाहता है।

अटका हुआ समझौता

यही मतभेद फिलहाल किसी बड़े समझौते को रोक रहे हैं। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि परमाणु मुद्दे को टालना ईरान को रणनीतिक बढ़त देगा। दूसरी ओर, तेहरान का तर्क है कि युद्ध और नाकेबंदी के बीच परमाणु शर्तों पर दबाव में बातचीत स्वीकार्य नहीं होगी।

इस गतिरोध का असर सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं है। होर्मुज स्ट्रेट में अनिश्चितता से वैश्विक तेल आपूर्ति, ऊर्जा कीमतों और समुद्री व्यापार पर दबाव बना हुआ है। यही वजह है कि ओमान, रूस और पाकिस्तान जैसे देश सक्रिय रूप से इस प्रक्रिया में जुड़े हुए हैं।

फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है, लेकिन अरागची की तेज कूटनीतिक सक्रियता यह संकेत जरूर देती है कि ईरान बातचीत का दरवाजा बंद नहीं करना चाहता। अब निगाहें इस बात पर हैं कि पाकिस्तान के जरिए भेजे गए ताजा प्रस्ताव पर वॉशिंगटन क्या रुख अपनाता है। अगर अमेरिका और ईरान शुरुआती शर्तों पर न्यूनतम सहमति बना लेते हैं, तो आने वाले दिनों में यह गतिरोध औपचारिक वार्ता में बदल सकता है।

https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/aragchis-third-visit-to-pakistan-in-48-hours-is-us-iran/article-52264

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