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कॉमनवेल्थ फेंसिंग में भारत पहली बार ओवरऑल चैंपियन
स्पोर्ट्स डेस्क
लागोस में भारतीय फेंसर्स का शानदार प्रदर्शन, 13 गोल्ड समेत 35 मेडल जीते; पहली बार मिली विल्किंसन स्वॉर्ड ट्रॉफी
नाइजीरिया के लागोस में भारतीय फेंसिंग टीम ने बड़ा इतिहास रच दिया है। कॉमनवेल्थ फेंसिंग चैंपियनशिप में भारत पहली बार ओवरऑल चैंपियन बना है। भारतीय खिलाड़ियों ने सीनियर और अंडर-23 वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 35 मेडल अपने नाम किए, जिनमें 13 गोल्ड शामिल हैं। इस प्रदर्शन के दम पर भारत को प्रतिष्ठित विल्किंसन स्वॉर्ड ट्रॉफी भी मिली। यह ट्रॉफी कॉमनवेल्थ फेंसिंग फेडरेशन की ओर से चैंपियनशिप में सबसे बेहतरीन ओवरऑल प्रदर्शन करने वाले देश को दी जाती है। फेडरेशन के नियमों के मुताबिक यह पुरस्कार सीनियर इवेंट में देशों के कुल प्रदर्शन और हासिल किए गए अंकों के आधार पर तय होता है।
लागोस में इस साल की कॉमनवेल्थ फेंसिंग चैंपियनशिप 9 से 14 अगस्त तक आयोजित हुई। इसमें सीनियर, वेटरन और अंडर-23 वर्ग के मुकाबले हुए। भारत ने प्रतियोगिता में बड़ा दल उतारा था और पुरुषों के साथ महिला फेंसर्स ने भी कई इवेंट में मजबूत प्रदर्शन किया। भारत की सफलता की खास बात यह रही कि टीम ने फेंसिंग के तीनों हथियारों—सेबर, एपे और फॉइल—में पदक हासिल किए। भारतीय खिलाड़ियों ने अलग-अलग कैटेगरी में लगातार अच्छे नतीजे दिए और प्रतियोगिता के आगे बढ़ने के साथ मेडल टैली में अपनी स्थिति मजबूत की।
चैंपियनशिप के चौथे दिन भारतीय सीनियर खिलाड़ियों का प्रदर्शन खास तौर पर चर्चा में रहा। छह इवेंट के मुकाबलों में भारत ने पांच गोल्ड मेडल जीत लिए। पुरुष सेबर, महिला सेबर, पुरुष एपे, महिला एपे और महिला फॉइल में भारतीय खिलाड़ियों ने शीर्ष स्थान हासिल किया। पुरुष फॉइल में भारत को सिल्वर मेडल मिला। एक ही दिन इतने गोल्ड आने से टीम की स्थिति ओवरऑल चैंपियनशिप की दौड़ में काफी मजबूत हो गई। इससे पहले अंडर-23 वर्ग के खिलाड़ियों ने भी अपने मुकाबलों में पदक हासिल कर टीम के कुल स्कोर में अहम योगदान दिया था।
विल्किंसन स्वॉर्ड ट्रॉफी इस उपलब्धि का सबसे बड़ा हिस्सा रही। यह कोई सामान्य मेडल नहीं है। कॉमनवेल्थ फेंसिंग फेडरेशन के नियमों के अनुसार सीनियर चैंपियनशिप में देशों के प्रदर्शन के आधार पर अंक जोड़े जाते हैं और सबसे ज्यादा अंक हासिल करने वाले देश को यह ट्रॉफी मिलती है। यह पुरस्कार 1982 से दिया जा रहा है। यानी भारत ने सिर्फ पदकों की संख्या में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि अलग-अलग इवेंट में लगातार बेहतर नतीजे हासिल करके ओवरऑल स्कोर में भी बाकी देशों को पीछे छोड़ा।
भारत के लिए यह सफलता इसलिए भी अहम है क्योंकि फेंसिंग अभी देश के उन खेलों में शामिल है, जिन्हें क्रिकेट, बैडमिंटन या कुश्ती जितनी चर्चा नहीं मिलती। इसके बावजूद पिछले कुछ साल में भारतीय फेंसर्स ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी लगातार मजबूत की है। लागोस में मिली सफलता इसी बदलाव का संकेत मानी जा रही है। सीनियर खिलाड़ियों के साथ अंडर-23 फेंसर्स का प्रदर्शन बताता है कि भारत के पास इस खेल में अगली पीढ़ी के खिलाड़ी भी तैयार हो रहे हैं। प्रतियोगिता में भारत का सबसे बड़ा दल होने की बात भी पहले सामने आई थी।
मध्यप्रदेश की फेंसर खुशी डाभाड़े ने भी इस चैंपियनशिप में भारत की पदक तालिका में योगदान दिया। उन्होंने महिला एपे के व्यक्तिगत मुकाबले में सिल्वर मेडल हासिल किया। खुशी मध्यप्रदेश की स्पोर्ट्स फेंसिंग अकादमी से जुड़ी रही हैं और उनका यह प्रदर्शन राज्य के लिए भी खास उपलब्धि माना जा रहा है। इसी तरह नागपुर की श्रुति जोशी ने भी लागोस में अपने प्रदर्शन से ध्यान खींचा। वह हाल ही में विश्व चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली नागपुर की पहली फेंसर बनी थीं और अब कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में भी उन्होंने अपनी पहचान मजबूत की।
फेंसिंग में भारत की टीम सेबर, एपे और फॉइल तीनों में मुकाबला करती है। इन तीनों हथियारों की तकनीक और खेलने का तरीका अलग होता है, इसलिए किसी एक वर्ग में अच्छा प्रदर्शन करना और तीनों में लगातार पदक जीतना अलग चुनौती है। भारतीय टीम ने इस बार तीनों में संतुलित प्रदर्शन किया। खासकर महिला और पुरुष सेबर के साथ एपे में आए गोल्ड ने टीम के ओवरऑल स्कोर को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। फॉइल में भी भारत ने गोल्ड और सिल्वर दोनों हासिल किए।
फेंसिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महासचिव राजीव मेहता ने टीम के प्रदर्शन पर खिलाड़ियों, कोचिंग स्टाफ और सपोर्ट टीम को बधाई दी। उनके मुताबिक पहली बार कॉमनवेल्थ फेंसिंग में ओवरऑल खिताब हासिल करना खिलाड़ियों की मेहनत, अनुशासन और तैयारी का नतीजा है। भारतीय टीम के लिए यह उपलब्धि ऐसे समय में आई है जब देश में इस खेल को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन सुधारने की कोशिशें चल रही हैं। लागोस में मिली ट्रॉफी अब भारतीय फेंसिंग के रिकॉर्ड में एक नई उपलब्धि के तौर पर दर्ज हो गई है।
कॉमनवेल्थ फेंसिंग में भारत पहली बार ओवरऑल चैंपियन
स्पोर्ट्स डेस्क
नाइजीरिया के लागोस में भारतीय फेंसिंग टीम ने बड़ा इतिहास रच दिया है। कॉमनवेल्थ फेंसिंग चैंपियनशिप में भारत पहली बार ओवरऑल चैंपियन बना है। भारतीय खिलाड़ियों ने सीनियर और अंडर-23 वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 35 मेडल अपने नाम किए, जिनमें 13 गोल्ड शामिल हैं। इस प्रदर्शन के दम पर भारत को प्रतिष्ठित विल्किंसन स्वॉर्ड ट्रॉफी भी मिली। यह ट्रॉफी कॉमनवेल्थ फेंसिंग फेडरेशन की ओर से चैंपियनशिप में सबसे बेहतरीन ओवरऑल प्रदर्शन करने वाले देश को दी जाती है। फेडरेशन के नियमों के मुताबिक यह पुरस्कार सीनियर इवेंट में देशों के कुल प्रदर्शन और हासिल किए गए अंकों के आधार पर तय होता है।
लागोस में इस साल की कॉमनवेल्थ फेंसिंग चैंपियनशिप 9 से 14 अगस्त तक आयोजित हुई। इसमें सीनियर, वेटरन और अंडर-23 वर्ग के मुकाबले हुए। भारत ने प्रतियोगिता में बड़ा दल उतारा था और पुरुषों के साथ महिला फेंसर्स ने भी कई इवेंट में मजबूत प्रदर्शन किया। भारत की सफलता की खास बात यह रही कि टीम ने फेंसिंग के तीनों हथियारों—सेबर, एपे और फॉइल—में पदक हासिल किए। भारतीय खिलाड़ियों ने अलग-अलग कैटेगरी में लगातार अच्छे नतीजे दिए और प्रतियोगिता के आगे बढ़ने के साथ मेडल टैली में अपनी स्थिति मजबूत की।
चैंपियनशिप के चौथे दिन भारतीय सीनियर खिलाड़ियों का प्रदर्शन खास तौर पर चर्चा में रहा। छह इवेंट के मुकाबलों में भारत ने पांच गोल्ड मेडल जीत लिए। पुरुष सेबर, महिला सेबर, पुरुष एपे, महिला एपे और महिला फॉइल में भारतीय खिलाड़ियों ने शीर्ष स्थान हासिल किया। पुरुष फॉइल में भारत को सिल्वर मेडल मिला। एक ही दिन इतने गोल्ड आने से टीम की स्थिति ओवरऑल चैंपियनशिप की दौड़ में काफी मजबूत हो गई। इससे पहले अंडर-23 वर्ग के खिलाड़ियों ने भी अपने मुकाबलों में पदक हासिल कर टीम के कुल स्कोर में अहम योगदान दिया था।
विल्किंसन स्वॉर्ड ट्रॉफी इस उपलब्धि का सबसे बड़ा हिस्सा रही। यह कोई सामान्य मेडल नहीं है। कॉमनवेल्थ फेंसिंग फेडरेशन के नियमों के अनुसार सीनियर चैंपियनशिप में देशों के प्रदर्शन के आधार पर अंक जोड़े जाते हैं और सबसे ज्यादा अंक हासिल करने वाले देश को यह ट्रॉफी मिलती है। यह पुरस्कार 1982 से दिया जा रहा है। यानी भारत ने सिर्फ पदकों की संख्या में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि अलग-अलग इवेंट में लगातार बेहतर नतीजे हासिल करके ओवरऑल स्कोर में भी बाकी देशों को पीछे छोड़ा।
भारत के लिए यह सफलता इसलिए भी अहम है क्योंकि फेंसिंग अभी देश के उन खेलों में शामिल है, जिन्हें क्रिकेट, बैडमिंटन या कुश्ती जितनी चर्चा नहीं मिलती। इसके बावजूद पिछले कुछ साल में भारतीय फेंसर्स ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी लगातार मजबूत की है। लागोस में मिली सफलता इसी बदलाव का संकेत मानी जा रही है। सीनियर खिलाड़ियों के साथ अंडर-23 फेंसर्स का प्रदर्शन बताता है कि भारत के पास इस खेल में अगली पीढ़ी के खिलाड़ी भी तैयार हो रहे हैं। प्रतियोगिता में भारत का सबसे बड़ा दल होने की बात भी पहले सामने आई थी।
मध्यप्रदेश की फेंसर खुशी डाभाड़े ने भी इस चैंपियनशिप में भारत की पदक तालिका में योगदान दिया। उन्होंने महिला एपे के व्यक्तिगत मुकाबले में सिल्वर मेडल हासिल किया। खुशी मध्यप्रदेश की स्पोर्ट्स फेंसिंग अकादमी से जुड़ी रही हैं और उनका यह प्रदर्शन राज्य के लिए भी खास उपलब्धि माना जा रहा है। इसी तरह नागपुर की श्रुति जोशी ने भी लागोस में अपने प्रदर्शन से ध्यान खींचा। वह हाल ही में विश्व चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली नागपुर की पहली फेंसर बनी थीं और अब कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में भी उन्होंने अपनी पहचान मजबूत की।
फेंसिंग में भारत की टीम सेबर, एपे और फॉइल तीनों में मुकाबला करती है। इन तीनों हथियारों की तकनीक और खेलने का तरीका अलग होता है, इसलिए किसी एक वर्ग में अच्छा प्रदर्शन करना और तीनों में लगातार पदक जीतना अलग चुनौती है। भारतीय टीम ने इस बार तीनों में संतुलित प्रदर्शन किया। खासकर महिला और पुरुष सेबर के साथ एपे में आए गोल्ड ने टीम के ओवरऑल स्कोर को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। फॉइल में भी भारत ने गोल्ड और सिल्वर दोनों हासिल किए।
फेंसिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महासचिव राजीव मेहता ने टीम के प्रदर्शन पर खिलाड़ियों, कोचिंग स्टाफ और सपोर्ट टीम को बधाई दी। उनके मुताबिक पहली बार कॉमनवेल्थ फेंसिंग में ओवरऑल खिताब हासिल करना खिलाड़ियों की मेहनत, अनुशासन और तैयारी का नतीजा है। भारतीय टीम के लिए यह उपलब्धि ऐसे समय में आई है जब देश में इस खेल को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन सुधारने की कोशिशें चल रही हैं। लागोस में मिली ट्रॉफी अब भारतीय फेंसिंग के रिकॉर्ड में एक नई उपलब्धि के तौर पर दर्ज हो गई है।
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