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GST 2.0 का दोहरा असर, आम जनता को राहत, लेकिन छत्तीसगढ़ को 1500 करोड़ का नुकसान होने का अनुमान
रायपुर (छ.ग.)
GST 2.0 लागू होने के बाद जहां देश में उपभोक्ताओं को राहत और कर संग्रह में वृद्धि देखने को मिली है, वहीं उत्पादन-प्रधान राज्यों के लिए यह चुनौती बन गया है।
जीएसटी 2.0 लागू होने के बाद देश की कर व्यवस्था में व्यापक बदलाव देखने को मिला है। इस नई प्रणाली का उद्देश्य कर संरचना को सरल बनाना और उपभोक्ताओं को राहत प्रदान करना है। इसके परिणामस्वरूप कई वस्तुएं सस्ती हुई हैं और कर संग्रह में भी लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। हाल के आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2025 में देश का कुल जीएसटी संग्रह 1.75 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 6.1 प्रतिशत अधिक था। वहीं जनवरी 2026 में यह बढ़कर 1.93 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जिसमें 6.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
राज्यों पर पड़े असर की स्थिति
हालांकि इस सुधार का प्रभाव सभी राज्यों पर समान नहीं पड़ा है। विशेष रूप से उत्पादन-प्रधान राज्यों के लिए यह व्यवस्था कुछ वित्तीय चुनौतियाँ लेकर आई है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में, जहां बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होता है, लेकिन स्थानीय खपत अपेक्षाकृत कम है, वहां राजस्व संतुलन बिगड़ने की आशंका बढ़ गई है। इसी कारण राज्य के वित्तीय ढांचे पर अतिरिक्त दबाव देखा जा रहा है।
छत्तीसगढ़ में राजस्व कमी का कारण
जीएसटी की गंतव्य आधारित प्रणाली के तहत कर का लाभ उस राज्य को मिलता है जहां वस्तु या सेवा का उपभोग होता है। छत्तीसगढ़ में स्टील, आयरन और कोयले का उत्पादन अधिक होने के बावजूद इन उत्पादों का उपभोग अन्य राज्यों में होता है। इस वजह से कर का बड़ा हिस्सा अन्य राज्यों को चला जाता है। यही स्थिति राज्य के राजस्व में कमी का मुख्य कारण बन रही है।
कोयला उद्योग और ITC का प्रभाव
राज्य की अर्थव्यवस्था में कोयला उद्योग की अहम भूमिका है। पहले कोयले पर कम जीएसटी दर और इनपुट टैक्स क्रेडिट के अधिक उपयोग के कारण कंपनियों के पास बड़ी मात्रा में ITC जमा हो गया था। अब जब जीएसटी दर में बदलाव किया गया है, कंपनियां पुराने ITC का समायोजन कर रही हैं, जिससे राज्य को नकद राजस्व में कमी का सामना करना पड़ रहा है।
अन्य राज्यों पर भी असर
यह स्थिति केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। ओडिशा और झारखंड जैसे अन्य उत्पादन-प्रधान राज्यों में भी इसी तरह की चुनौती सामने आ रही है। इन राज्यों में भी राजस्व में लगभग 1000 करोड़ रुपये तक की संभावित कमी का अनुमान लगाया गया है। उत्पादन और उपभोग के असंतुलन के कारण यह समस्या और गहरी होती दिखाई दे रही है।
भविष्य की संभावनाएं और समाधान
विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति में सुधार आने में समय लग सकता है और 2027-28 तक स्थिति स्थिर हो सकती है। तब तक राज्यों पर वित्तीय दबाव बना रह सकता है। समाधान के रूप में IGST सेटलमेंट प्रणाली की समीक्षा, उत्पादन-प्रधान राज्यों के लिए संतुलित राजस्व व्यवस्था और क्षतिपूर्ति तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता बताई जा रही है, ताकि सभी राज्यों को जीएसटी का समान लाभ मिल सके।
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GST 2.0 का दोहरा असर, आम जनता को राहत, लेकिन छत्तीसगढ़ को 1500 करोड़ का नुकसान होने का अनुमान
रायपुर (छ.ग.)
जीएसटी 2.0 लागू होने के बाद देश की कर व्यवस्था में व्यापक बदलाव देखने को मिला है। इस नई प्रणाली का उद्देश्य कर संरचना को सरल बनाना और उपभोक्ताओं को राहत प्रदान करना है। इसके परिणामस्वरूप कई वस्तुएं सस्ती हुई हैं और कर संग्रह में भी लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। हाल के आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2025 में देश का कुल जीएसटी संग्रह 1.75 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 6.1 प्रतिशत अधिक था। वहीं जनवरी 2026 में यह बढ़कर 1.93 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जिसमें 6.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
राज्यों पर पड़े असर की स्थिति
हालांकि इस सुधार का प्रभाव सभी राज्यों पर समान नहीं पड़ा है। विशेष रूप से उत्पादन-प्रधान राज्यों के लिए यह व्यवस्था कुछ वित्तीय चुनौतियाँ लेकर आई है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में, जहां बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होता है, लेकिन स्थानीय खपत अपेक्षाकृत कम है, वहां राजस्व संतुलन बिगड़ने की आशंका बढ़ गई है। इसी कारण राज्य के वित्तीय ढांचे पर अतिरिक्त दबाव देखा जा रहा है।
छत्तीसगढ़ में राजस्व कमी का कारण
जीएसटी की गंतव्य आधारित प्रणाली के तहत कर का लाभ उस राज्य को मिलता है जहां वस्तु या सेवा का उपभोग होता है। छत्तीसगढ़ में स्टील, आयरन और कोयले का उत्पादन अधिक होने के बावजूद इन उत्पादों का उपभोग अन्य राज्यों में होता है। इस वजह से कर का बड़ा हिस्सा अन्य राज्यों को चला जाता है। यही स्थिति राज्य के राजस्व में कमी का मुख्य कारण बन रही है।
कोयला उद्योग और ITC का प्रभाव
राज्य की अर्थव्यवस्था में कोयला उद्योग की अहम भूमिका है। पहले कोयले पर कम जीएसटी दर और इनपुट टैक्स क्रेडिट के अधिक उपयोग के कारण कंपनियों के पास बड़ी मात्रा में ITC जमा हो गया था। अब जब जीएसटी दर में बदलाव किया गया है, कंपनियां पुराने ITC का समायोजन कर रही हैं, जिससे राज्य को नकद राजस्व में कमी का सामना करना पड़ रहा है।
अन्य राज्यों पर भी असर
यह स्थिति केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। ओडिशा और झारखंड जैसे अन्य उत्पादन-प्रधान राज्यों में भी इसी तरह की चुनौती सामने आ रही है। इन राज्यों में भी राजस्व में लगभग 1000 करोड़ रुपये तक की संभावित कमी का अनुमान लगाया गया है। उत्पादन और उपभोग के असंतुलन के कारण यह समस्या और गहरी होती दिखाई दे रही है।
भविष्य की संभावनाएं और समाधान
विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति में सुधार आने में समय लग सकता है और 2027-28 तक स्थिति स्थिर हो सकती है। तब तक राज्यों पर वित्तीय दबाव बना रह सकता है। समाधान के रूप में IGST सेटलमेंट प्रणाली की समीक्षा, उत्पादन-प्रधान राज्यों के लिए संतुलित राजस्व व्यवस्था और क्षतिपूर्ति तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता बताई जा रही है, ताकि सभी राज्यों को जीएसटी का समान लाभ मिल सके।
