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जालंधर में पहली ‘बाज’ ड्रोन बटालियन, पंजाब बॉर्डर पर बढ़ेगी सेना की निगरानी क्षमता
भारत
11 कोर के तहत बनी यूनिट में आधुनिक ड्रोन और विशेषज्ञ टीम; रियल-टाइम सर्विलांस से सीमा पर तेजी से मिलेगी जानकारी
जालंधर में भारतीय सेना ने ड्रोन वॉरफेयर को लेकर अपनी नई संरचना की शुरुआत कर दी है। 11 कोर यानी वज्र कोर के तहत पहली समर्पित ‘बाज ड्रोन बटालियन’ खड़ी की गई है। सेना के मुताबिक, इसका मकसद हवाई निगरानी, तेजी से सूचना जुटाने और युद्धक्षेत्र में मानवरहित प्रणालियों की उपयोगिता को एक नए स्तर पर ले जाना है। यह कदम ऐसे समय में आया है जब आधुनिक युद्ध में ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी से आगे बढ़कर लक्ष्य पहचान, खुफिया जानकारी जुटाने, रसद और सटीक सैन्य कार्रवाई तक फैल चुका है। सेना ने जून 2026 में भी ‘बाज बटालियन’ को अपनी व्यापक सैन्य आधुनिकीकरण योजना का हिस्सा बताया था।
जालंधर को क्यों चुना गया?
वज्र कोर का मुख्यालय जालंधर में है और यह पंजाब सेक्टर की सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पहली बाज बटालियन की स्थापना इसी फॉर्मेशन के तहत किया जाना पश्चिमी सीमा पर मानवरहित हवाई क्षमता को सीधे ऑपरेशनल कमांड से जोड़ने की दिशा में कदम माना जा रहा है। नई यूनिट का फोकस सिर्फ ड्रोन उड़ाने तक सीमित नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसके लिए ऐसे विशेषज्ञ तैयार किए जा रहे हैं जो ड्रोन संचालन के साथ उनके रखरखाव, डेटा के इस्तेमाल, सॉफ्टवेयर अपडेट और अलग-अलग सैन्य इकाइयों के साथ समन्वय को संभाल सकें।
ड्रोन बनेंगे सीमा की ‘आंखें’
बाज बटालियन का सबसे अहम काम लगातार हवाई निगरानी और इलाके की स्थिति की जानकारी उपलब्ध कराना होगा। ड्रोन से मिलने वाले सेंसर और इमेजरी डेटा का इस्तेमाल सैन्य कमांडरों को क्षेत्र की गतिविधियों की बेहतर तस्वीर देने में किया जा सकता है। पंजाब की सीमा पर ड्रोन का एक दूसरा महत्व भी है। पाकिस्तान से हथियार और नशीले पदार्थ भेजने के लिए छोटे मानवरहित विमानों के इस्तेमाल की घटनाएं सुरक्षा एजेंसियों के लिए लगातार चुनौती रही हैं। ऐसे माहौल में निगरानी की क्षमता बढ़ना सीमा प्रबंधन के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
‘बाज’ का ढांचा दूसरी ड्रोन यूनिट से अलग
सेना पहले ही इन्फैंट्री यूनिटों के स्तर पर छोटी ड्रोन प्लाटून और दूसरी विशेषज्ञ ड्रोन क्षमताओं को विकसित कर रही है। बाज बटालियन को इससे बड़े और अधिक संगठित स्तर पर मानवरहित प्रणालियों के संचालन के लिए तैयार किया जा रहा है। इस अंतर को समझने का एक आसान तरीका यह है कि छोटी ड्रोन प्लाटून का इस्तेमाल स्थानीय या फ्रंटलाइन जरूरतों के लिए किया जा सकता है, जबकि बाज जैसी विशेषज्ञ यूनिट बड़े ऑपरेशनल क्षेत्र में ड्रोन क्षमता को एकीकृत करने पर केंद्रित है।
हेरॉन से लेकर नए सिस्टम तक बढ़ रहा फोकस
रक्षा रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय सेना की ड्रोन क्षमता में हेरॉन और सर्चर जैसे प्लेटफॉर्म पहले से शामिल हैं। भविष्य में बड़े और लंबी दूरी के मानवरहित प्लेटफॉर्म भी इस नेटवर्क का हिस्सा बन सकते हैं। हालांकि, किसी खास प्लेटफॉर्म की तैनाती या उसके ऑपरेशनल इस्तेमाल को लेकर उपलब्ध आधिकारिक जानकारी और मीडिया रिपोर्टों में अंतर हो सकता है, इसलिए इसे निश्चित तैनाती के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। भारतीय सेना की ड्रोन नीति अब केवल प्लेटफॉर्म खरीदने तक सीमित नहीं दिखती। जून में सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भी ड्रोन को निगरानी, खुफिया जानकारी, लक्ष्य पहचान, सटीक कार्रवाई और सैनिकों की सुरक्षा जैसी कई भूमिकाओं से जोड़ा था।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद तेज हुआ बदलाव
ड्रोन की बढ़ती भूमिका को ऑपरेशन सिंदूर के अनुभवों ने भी रेखांकित किया। इसके बाद भारतीय सेना ने ड्रोन प्लाटून, भैरव बटालियन और दूसरी विशेषज्ञ क्षमताओं के जरिए अपनी मानवरहित युद्ध क्षमता को अलग-अलग स्तरों पर बढ़ाने की दिशा में काम किया है। बाज बटालियन इसी बदलाव को एक संगठित सैन्य ढांचे में आगे बढ़ाने की कोशिश है। इसका उद्देश्य ड्रोन, तकनीकी विशेषज्ञों, डेटा प्रोसेसिंग और कमांड सिस्टम को एक साथ जोड़कर ऐसी क्षमता तैयार करना है जो जरूरत के समय तेजी से इस्तेमाल की जा सके।
सिर्फ निगरानी नहीं, लॉजिस्टिक्स भी
मानवरहित प्रणालियों का इस्तेमाल अब केवल दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने तक सीमित नहीं है। सेना के लिए ड्रोन दूर स्थित सैनिकों तक जरूरी सामान पहुंचाने, इलाके का आकलन करने और कठिन क्षेत्रों में बिना मानव जोखिम के जानकारी जुटाने में भी उपयोगी हो सकते हैं। जालंधर में पहले से मौजूद सैन्य एविएशन और ड्रोन संबंधी बुनियादी ढांचा भी इस बदलाव के लिए महत्वपूर्ण है। जालंधर बेस पर विकसित कुछ स्वदेशी ड्रोन प्रणालियों का इस्तेमाल निगरानी के साथ-साथ सीमित लॉजिस्टिक जरूरतों के लिए भी किया गया है।
ड्रोन युद्ध के लिए बदल रही सेना की संरचना
बाज बटालियन को अकेली पहल के तौर पर देखने के बजाय सेना के व्यापक तकनीकी बदलाव के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। बाज के साथ अश्नि प्लाटून, शक्तिबाण जैसी ड्रोन क्षमताएं और भैरव जैसी नई संरचनाएं अलग-अलग स्तरों पर मानवरहित तकनीक को सैन्य अभियानों से जोड़ने की दिशा में काम कर रही हैं। जालंधर में पहली बाज बटालियन का गठन इस बदलाव को पंजाब के संवेदनशील पश्चिमी सेक्टर में सीधे लागू करने का महत्वपूर्ण कदम है।
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