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चीनी महंगी होने पर सरकार का जवाब, एथेनॉल नहीं जमाखोरी वजह
Digital Desk
एक महीने में दाम ₹55 के पार पहुंचे; सरकार ने स्टॉक लिमिट और ड्यूटी फ्री इंपोर्ट जैसे कदम उठाए
देश में चीनी के दाम लगातार ऊपर जाने के बीच सरकार ने एथेनॉल उत्पादन को इसकी वजह मानने वाले दावों को खारिज किया है। खाद्य और उपभोक्ता मंत्रालय की ओर से शुक्रवार को कहा गया कि चीनी की कीमतों में हालिया तेजी का कारण एथेनॉल नहीं है। मंत्रालय के मुताबिक बाजार में कम उत्पादन, त्योहारी सीजन के दौरान बढ़ी मांग और कुछ स्तर पर जमाखोरी ने कीमतों पर दबाव बढ़ाया है। पिछले करीब एक महीने में चीनी के दाम बढ़कर 55 रुपए प्रति किलो से ऊपर पहुंच गए हैं। कीमतों में इस तेजी के बाद एथेनॉल के लिए गन्ने और चीनी के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठ रहे थे। सरकार ने साफ किया है कि बाजार में उपलब्धता और मांग के बीच बने अंतर को कीमत बढ़ने की बड़ी वजह माना जा रहा है।
सरकारी पक्ष के मुताबिक चीनी का उत्पादन कम रहने और त्योहारी सीजन में खपत बढ़ने का सीधा असर बाजार पर पड़ा है। त्योहारों के दौरान मिठाई, पेय पदार्थ और दूसरी खाद्य चीजों में चीनी की मांग सामान्य दिनों के मुकाबले बढ़ जाती है। इसी दौरान अगर बाजार में सप्लाई अपेक्षा के मुताबिक नहीं रहे तो खुदरा कीमतों पर दबाव बनता है। मंत्रालय ने जमाखोरी को भी मौजूदा तेजी की एक वजह बताया है। यानी बाजार में जरूरत के मुताबिक स्टॉक उपलब्ध होने के बावजूद कुछ मात्रा के रोके जाने से कीमतों में बढ़ोतरी की स्थिति बनी। सरकार की ओर से इसी को देखते हुए चीनी के स्टॉक पर सीमा लगाने जैसे कदम उठाए गए हैं। इन कदमों का मकसद बाजार में उपलब्धता बनाए रखना और कारोबारियों के पास जरूरत से ज्यादा स्टॉक जमा होने की स्थिति को रोकना है।
चीनी के दाम को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने आयात से जुड़ा कदम भी उठाया है। मंत्रालय के अनुसार ड्यूटी फ्री इंपोर्ट की अनुमति देने का फैसला बाजार में अतिरिक्त चीनी उपलब्ध कराने के मकसद से लिया गया है। इससे घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। सरकार का मानना है कि उपलब्धता बढ़ने से कीमतों पर बना दबाव कम हो सकता है। दूसरी तरफ स्टॉक लिमिट के जरिए बाजार में चीनी की जमाखोरी पर नजर रखी जा रही है। कीमतों में अचानक हुई बढ़ोतरी के बाद सरकार की ओर से सप्लाई, स्टॉक और बाजार भाव की स्थिति पर निगरानी बढ़ाई गई है। कारोबारियों और चीनी उद्योग से जुड़े लोगों के पास मौजूद स्टॉक को लेकर भी जानकारी जुटाई जा रही है।
इसी बीच सरकार ने अक्टूबर में करीब 10 लाख टन चीनी उत्पादन का लक्ष्य रखा है। अक्टूबर से चीनी मिलों में उत्पादन का काम तेज होने की उम्मीद है। सरकार की नजर इस बात पर है कि नए उत्पादन से घरेलू बाजार में उपलब्धता कितनी बढ़ती है। उत्पादन बढ़ने पर आने वाले समय में सप्लाई की स्थिति बेहतर हो सकती है। फिलहाल बाजार में दाम 55 रुपए प्रति किलो के स्तर को पार कर चुके हैं, जिससे आम उपभोक्ताओं के बजट पर भी असर पड़ रहा है। चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी का असर मिठाई और बेकरी से जुड़े कारोबार पर भी पड़ता है, क्योंकि इन उद्योगों में चीनी एक प्रमुख कच्चा माल है। हालांकि सरकार ने मौजूदा स्थिति के पीछे एथेनॉल उत्पादन को मुख्य कारण मानने से इनकार किया है।
चीनी और एथेनॉल के उत्पादन का मुद्दा पिछले कुछ समय से लगातार चर्चा में रहा है। गन्ने से चीनी के साथ एथेनॉल बनाने की नीति को लेकर यह सवाल उठता रहा है कि इससे घरेलू बाजार के लिए चीनी की उपलब्धता प्रभावित होती है या नहीं। सरकार का कहना है कि इस बार कीमतों में आई तेजी को सिर्फ एथेनॉल से जोड़ना सही नहीं है। मंत्रालय ने कम उत्पादन और त्योहारी मांग के साथ जमाखोरी को भी महत्वपूर्ण कारण बताया है। बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए आयात की व्यवस्था और स्टॉक लिमिट जैसे कदम इसी दौरान लागू किए गए हैं। अक्टूबर में 10 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य भी इसी सप्लाई स्थिति पर नजर रखते हुए रखा गया है।
फिलहाल चीनी की कीमतों में तेजी को लेकर सरकार और बाजार दोनों की नजर उत्पादन तथा उपलब्ध स्टॉक पर बनी हुई है। एक महीने के भीतर कीमतों के 55 रुपए प्रति किलो से ऊपर पहुंचने के बाद उपभोक्ता बाजार में इसका असर दिखाई दे रहा है। सरकार की ओर से उठाए गए कदमों में स्टॉक लिमिट और ड्यूटी फ्री इंपोर्ट प्रमुख हैं। खाद्य और उपभोक्ता मंत्रालय ने अपने बयान में एथेनॉल को कीमत बढ़ने का कारण मानने से इनकार किया है और कम उत्पादन, त्योहारी मांग तथा जमाखोरी को इसके पीछे बताया है। अक्टूबर में 10 लाख टन चीनी उत्पादन का लक्ष्य भी तय किया गया है।
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