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असम की कल्पना पटवारी: जिनकी आवाज ने छठ गीतों को दी नई पहचान, भोजपुरी लोकसंगीत की बनी आत्मा
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छठ महापर्व की गूंज इस वक्त पूरे देश में सुनाई दे रही है। हर घाट, हर आंगन और हर घर में भक्तिभाव से भरे गीतों की मधुर ध्वनि वातावरण को पवित्र बना रही है।
इन्हीं गीतों में एक आवाज ऐसी भी है जिसने लाखों दिलों को छू लिया है — कल्पना पटवारी की। असम की इस गायिका ने भोजपुरी लोकसंगीत को नई ऊंचाई दी है और अपनी सुरीली आवाज से छठ जैसे पावन पर्व को अमर बना दिया है।
संगीत से जीवन की शुरुआत
27 अक्टूबर 1978 को असम में जन्मीं कल्पना पटवारी ने बचपन से ही संगीत की साधना शुरू कर दी थी। लोकसंगीत के प्रति उनका झुकाव इतना गहरा था कि उन्होंने इसे ही अपना जीवन बना लिया। असम की धरती से निकलकर उन्होंने भोजपुरी, अवधी, मैथिली, पंजाबी, असमिया और बांग्ला सहित 30 से अधिक भाषाओं में गाने गाए हैं।
छठ गीतों की आत्मा बनी कल्पना की आवाज
छठ पूजा पर जब ‘उगी हे दीनानाथ’, ‘कांच ही बांस के बहंगिया’ या ‘छठी माई के महिमा अपार’ जैसे गीत गूंजते हैं, तो उनमें कल्पना पटवारी की आवाज एक भावनात्मक गहराई जोड़ देती है। उनके गीतों में भक्ति और लोक परंपरा का ऐसा संगम है जो सीधे दिल को छू जाता है।
लोकसंगीत को दी नई पहचान
कल्पना पटवारी ने केवल छठ गीत ही नहीं, बल्कि भोजपुरी के पारंपरिक लोकगीतों — कजरी, सोहर, बिरहा और झूमर — को भी फिर से जीवंत किया। उनकी कोशिशों ने भोजपुरी लोकसंगीत को सीमाओं से बाहर निकालकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। उन्होंने दुनिया के कई देशों में भारतीय लोकधुनों का प्रतिनिधित्व किया और साबित किया कि संगीत किसी भाषा या प्रदेश का मोहताज नहीं होता।
फिल्मों में भी दी अपनी सुरीली पहचान
कल्पना पटवारी ने भोजपुरी फिल्मों में भी कई सुपरहिट गाने गाकर पहचान बनाई। उनकी गायकी में गांवों की सादगी, लोकविश्वास की गहराई और त्योहारों की आत्मा झलकती है। यही वजह है कि वे केवल एक गायिका नहीं, बल्कि लोक संस्कृति की प्रतिनिधि बन चुकी हैं।
असम से उत्तर भारत तक दिलों पर राज
असम से निकली इस आवाज ने आज बिहार, झारखंड और पूर्वांचल ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर भारत के दिलों में जगह बना ली है। कल्पना पटवारी आज भी नई पीढ़ी को लोकसंगीत से जोड़ने का काम कर रही हैं, ताकि परंपरा की यह डोर कभी न टूटे।
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असम की कल्पना पटवारी: जिनकी आवाज ने छठ गीतों को दी नई पहचान, भोजपुरी लोकसंगीत की बनी आत्मा
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इन्हीं गीतों में एक आवाज ऐसी भी है जिसने लाखों दिलों को छू लिया है — कल्पना पटवारी की। असम की इस गायिका ने भोजपुरी लोकसंगीत को नई ऊंचाई दी है और अपनी सुरीली आवाज से छठ जैसे पावन पर्व को अमर बना दिया है।
संगीत से जीवन की शुरुआत
27 अक्टूबर 1978 को असम में जन्मीं कल्पना पटवारी ने बचपन से ही संगीत की साधना शुरू कर दी थी। लोकसंगीत के प्रति उनका झुकाव इतना गहरा था कि उन्होंने इसे ही अपना जीवन बना लिया। असम की धरती से निकलकर उन्होंने भोजपुरी, अवधी, मैथिली, पंजाबी, असमिया और बांग्ला सहित 30 से अधिक भाषाओं में गाने गाए हैं।
छठ गीतों की आत्मा बनी कल्पना की आवाज
छठ पूजा पर जब ‘उगी हे दीनानाथ’, ‘कांच ही बांस के बहंगिया’ या ‘छठी माई के महिमा अपार’ जैसे गीत गूंजते हैं, तो उनमें कल्पना पटवारी की आवाज एक भावनात्मक गहराई जोड़ देती है। उनके गीतों में भक्ति और लोक परंपरा का ऐसा संगम है जो सीधे दिल को छू जाता है।
लोकसंगीत को दी नई पहचान
कल्पना पटवारी ने केवल छठ गीत ही नहीं, बल्कि भोजपुरी के पारंपरिक लोकगीतों — कजरी, सोहर, बिरहा और झूमर — को भी फिर से जीवंत किया। उनकी कोशिशों ने भोजपुरी लोकसंगीत को सीमाओं से बाहर निकालकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। उन्होंने दुनिया के कई देशों में भारतीय लोकधुनों का प्रतिनिधित्व किया और साबित किया कि संगीत किसी भाषा या प्रदेश का मोहताज नहीं होता।
फिल्मों में भी दी अपनी सुरीली पहचान
कल्पना पटवारी ने भोजपुरी फिल्मों में भी कई सुपरहिट गाने गाकर पहचान बनाई। उनकी गायकी में गांवों की सादगी, लोकविश्वास की गहराई और त्योहारों की आत्मा झलकती है। यही वजह है कि वे केवल एक गायिका नहीं, बल्कि लोक संस्कृति की प्रतिनिधि बन चुकी हैं।
असम से उत्तर भारत तक दिलों पर राज
असम से निकली इस आवाज ने आज बिहार, झारखंड और पूर्वांचल ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर भारत के दिलों में जगह बना ली है। कल्पना पटवारी आज भी नई पीढ़ी को लोकसंगीत से जोड़ने का काम कर रही हैं, ताकि परंपरा की यह डोर कभी न टूटे।
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