हाईएस्ट पेड एक्ट्रेस होने के दावे पर बोलीं हेमा मालिनी, पैसों के लिए कभी काम नहीं किया

बालीवुड डेस्क

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दिग्गज अभिनेत्री ने कहा कि उनके दौर में कलाकारों को आज जैसी भारी-भरकम फीस नहीं मिलती थी। फिल्मों से मिलने वाला सम्मान और दर्शकों का प्यार ही उनके लिए सबसे बड़ी कमाई रहा।

बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्री और सांसद हेमा मालिनी ने एक बार फिर अपने लंबे फिल्मी करियर को लेकर खुलकर बात की है। 1970 और 80 के दशक की सबसे लोकप्रिय अभिनेत्रियों में शुमार रहीं हेमा मालिनी ने इस धारणा को खारिज कर दिया कि वह अपने दौर की सबसे ज्यादा फीस लेने वाली अभिनेत्री थीं। उन्होंने कहा कि उस समय फिल्म इंडस्ट्री का माहौल आज से बिल्कुल अलग था और कलाकारों को मौजूदा दौर जैसी करोड़ों रुपये की फीस नहीं मिलती थी। उनके मुताबिक, उन्होंने कभी भी पैसों को प्राथमिकता देकर फिल्में नहीं कीं। उनके लिए अभिनय, दर्शकों का प्यार और फिल्मों से मिलने वाला सम्मान ही सबसे ज्यादा मायने रखता था।

एक बातचीत के दौरान हेमा मालिनी से जब पूछा गया कि क्या वह अपने समय की सबसे महंगी अभिनेत्री थीं, तो उन्होंने इस दावे पर हैरानी जताई। उन्होंने कहा कि आखिर यह बात किसने फैलाई कि वह सबसे ज्यादा फीस लेने वाली स्टार थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके दौर में कलाकारों को बहुत सीमित मेहनताना मिलता था और आज के बड़े सितारों की तुलना में उन्हें उसका छोटा-सा हिस्सा भी नहीं मिलता था। उन्होंने कहा कि आज जिस तरह फिल्मों के लिए करोड़ों रुपये की फीस चर्चा का विषय बनती है, उस समय ऐसी स्थिति बिल्कुल नहीं थी। हेमा मालिनी ने बताया कि उनकी लोकप्रियता बढ़ने के साथ उनकी फीस में जरूर कुछ बढ़ोतरी हुई थी, लेकिन यह बढ़ोतरी बहुत मामूली होती थी। निर्माता और निर्देशक उनके काम से खुश होकर अपनी इच्छा से मेहनताना थोड़ा बढ़ा देते थे। उन्होंने कभी किसी फिल्म के लिए पहले से बड़ी रकम की मांग नहीं रखी और न ही फीस को लेकर किसी तरह की शर्तें रखीं। उनका मानना था कि यदि दर्शक किसी कलाकार को पसंद करते हैं तो वही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।

उन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों का भी जिक्र किया और बताया कि उनके सभी पेशेवर फैसलों की जिम्मेदारी उनकी मां संभालती थीं। फिल्मों की बातचीत से लेकर आर्थिक मामलों तक हर चीज उनकी मां देखती थीं। हेमा मालिनी ने कहा कि उनकी मां का स्वभाव बेहद सरल और उदार था। अगर कोई निर्माता आर्थिक परेशानी का हवाला देते हुए कम फीस देने की बात कहता था, तो उनकी मां बिना किसी विवाद के उसकी बात मान लेती थीं। उन्होंने कभी भी किसी निर्माता पर ज्यादा भुगतान का दबाव नहीं बनाया।

दिग्गज अभिनेत्री ने कहा कि कई बार निर्माता एक लिफाफे में जो भी मेहनताना देते थे, वह उसे खुशी-खुशी स्वीकार कर लेती थीं। उनके लिए वह केवल भुगतान नहीं, बल्कि उनके काम का सम्मान होता था। उन्होंने कहा कि फिल्मों में काम करने का उद्देश्य केवल पैसा कमाना नहीं था, बल्कि अच्छा सिनेमा करना और लोगों के दिलों में जगह बनाना था। यही वजह है कि उन्होंने अपने पूरे करियर में कभी फीस को लेकर विवाद या प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बनने की कोशिश नहीं की।

हेमा मालिनी का फिल्मी सफर वर्ष 1968 में फिल्म 'सपनों का सौदागर' से शुरू हुआ था। पहली ही फिल्म से उन्होंने दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। इसके बाद 1970 और 1980 का दशक उनके नाम रहा। उन्होंने एक के बाद एक कई सफल फिल्मों में काम किया और जल्द ही हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय अभिनेत्रियों में शामिल हो गईं। 'सीता और गीता', 'शोले', 'ड्रीम गर्ल', 'सत्ते पे सत्ता' और 'बागबान' जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को आज भी याद किया जाता है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस, अभिनय शैली और नृत्य कौशल ने उन्हें दर्शकों के बीच अलग पहचान दिलाई। इसी लोकप्रियता के कारण उन्हें बॉलीवुड की 'ड्रीम गर्ल' का नाम मिला, जो आज भी उनकी पहचान बना हुआ है।

फिल्मों के अलावा हेमा मालिनी ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य, खासकर भरतनाट्यम में भी अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने देश और विदेश में कई मंचों पर अपनी प्रस्तुतियां दीं और भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अभिनय और नृत्य दोनों क्षेत्रों में उनके योगदान की लगातार सराहना होती रही है। बाद के वर्षों में उन्होंने निर्देशन और फिल्म निर्माण में भी कदम रखा। वर्ष 1992 में उन्होंने फिल्म 'दिल आशना है' का निर्देशन और निर्माण किया। इस फिल्म में शाहरुख खान और दिव्या भारती मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे। इसके बाद 1995 में उन्होंने फिल्म 'मोहिनी' का निर्माण किया, जिसमें उनकी भतीजी मधू और अभिनेता सुदेश बेरी प्रमुख भूमिकाओं में थे। हालांकि निर्देशन के क्षेत्र में उन्होंने ज्यादा फिल्में नहीं बनाईं, लेकिन इस अनुभव को भी उन्होंने अपने करियर का महत्वपूर्ण हिस्सा माना।

समय के साथ हेमा मालिनी ने फिल्मों में काम कम कर दिया और राजनीति की ओर सक्रिय हो गईं। वर्तमान में वह लोकसभा सांसद के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभा रही हैं। इसके साथ ही वह सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी लगातार भाग लेती हैं। भारतीय सिनेमा में उनके लंबे और उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए वर्ष 2000 में उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया गया। बाद में वर्ष 2012 में उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि भी प्रदान की गई।

हेमा मालिनी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब फिल्म इंडस्ट्री में कलाकारों की फीस को लेकर लगातार चर्चाएं होती रहती हैं। बड़े सितारों की करोड़ों रुपये की फीस अक्सर सुर्खियां बनती है, लेकिन हेमा मालिनी का कहना है कि उनके दौर में फिल्मों की सफलता का पैमाना केवल पैसा नहीं था। उनके अनुसार, कलाकार की सबसे बड़ी कमाई दर्शकों का विश्वास, सम्मान और वर्षों तक मिलने वाला प्यार होता है। यही सोच उन्हें आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे सम्मानित और प्रेरणादायक अभिनेत्रियों में शामिल करती है।

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08 Jul 2026 By Vaishnavi.J

हाईएस्ट पेड एक्ट्रेस होने के दावे पर बोलीं हेमा मालिनी, पैसों के लिए कभी काम नहीं किया

बालीवुड डेस्क

बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्री और सांसद हेमा मालिनी ने एक बार फिर अपने लंबे फिल्मी करियर को लेकर खुलकर बात की है। 1970 और 80 के दशक की सबसे लोकप्रिय अभिनेत्रियों में शुमार रहीं हेमा मालिनी ने इस धारणा को खारिज कर दिया कि वह अपने दौर की सबसे ज्यादा फीस लेने वाली अभिनेत्री थीं। उन्होंने कहा कि उस समय फिल्म इंडस्ट्री का माहौल आज से बिल्कुल अलग था और कलाकारों को मौजूदा दौर जैसी करोड़ों रुपये की फीस नहीं मिलती थी। उनके मुताबिक, उन्होंने कभी भी पैसों को प्राथमिकता देकर फिल्में नहीं कीं। उनके लिए अभिनय, दर्शकों का प्यार और फिल्मों से मिलने वाला सम्मान ही सबसे ज्यादा मायने रखता था।

एक बातचीत के दौरान हेमा मालिनी से जब पूछा गया कि क्या वह अपने समय की सबसे महंगी अभिनेत्री थीं, तो उन्होंने इस दावे पर हैरानी जताई। उन्होंने कहा कि आखिर यह बात किसने फैलाई कि वह सबसे ज्यादा फीस लेने वाली स्टार थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके दौर में कलाकारों को बहुत सीमित मेहनताना मिलता था और आज के बड़े सितारों की तुलना में उन्हें उसका छोटा-सा हिस्सा भी नहीं मिलता था। उन्होंने कहा कि आज जिस तरह फिल्मों के लिए करोड़ों रुपये की फीस चर्चा का विषय बनती है, उस समय ऐसी स्थिति बिल्कुल नहीं थी। हेमा मालिनी ने बताया कि उनकी लोकप्रियता बढ़ने के साथ उनकी फीस में जरूर कुछ बढ़ोतरी हुई थी, लेकिन यह बढ़ोतरी बहुत मामूली होती थी। निर्माता और निर्देशक उनके काम से खुश होकर अपनी इच्छा से मेहनताना थोड़ा बढ़ा देते थे। उन्होंने कभी किसी फिल्म के लिए पहले से बड़ी रकम की मांग नहीं रखी और न ही फीस को लेकर किसी तरह की शर्तें रखीं। उनका मानना था कि यदि दर्शक किसी कलाकार को पसंद करते हैं तो वही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।

उन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों का भी जिक्र किया और बताया कि उनके सभी पेशेवर फैसलों की जिम्मेदारी उनकी मां संभालती थीं। फिल्मों की बातचीत से लेकर आर्थिक मामलों तक हर चीज उनकी मां देखती थीं। हेमा मालिनी ने कहा कि उनकी मां का स्वभाव बेहद सरल और उदार था। अगर कोई निर्माता आर्थिक परेशानी का हवाला देते हुए कम फीस देने की बात कहता था, तो उनकी मां बिना किसी विवाद के उसकी बात मान लेती थीं। उन्होंने कभी भी किसी निर्माता पर ज्यादा भुगतान का दबाव नहीं बनाया।

दिग्गज अभिनेत्री ने कहा कि कई बार निर्माता एक लिफाफे में जो भी मेहनताना देते थे, वह उसे खुशी-खुशी स्वीकार कर लेती थीं। उनके लिए वह केवल भुगतान नहीं, बल्कि उनके काम का सम्मान होता था। उन्होंने कहा कि फिल्मों में काम करने का उद्देश्य केवल पैसा कमाना नहीं था, बल्कि अच्छा सिनेमा करना और लोगों के दिलों में जगह बनाना था। यही वजह है कि उन्होंने अपने पूरे करियर में कभी फीस को लेकर विवाद या प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बनने की कोशिश नहीं की।

हेमा मालिनी का फिल्मी सफर वर्ष 1968 में फिल्म 'सपनों का सौदागर' से शुरू हुआ था। पहली ही फिल्म से उन्होंने दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। इसके बाद 1970 और 1980 का दशक उनके नाम रहा। उन्होंने एक के बाद एक कई सफल फिल्मों में काम किया और जल्द ही हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय अभिनेत्रियों में शामिल हो गईं। 'सीता और गीता', 'शोले', 'ड्रीम गर्ल', 'सत्ते पे सत्ता' और 'बागबान' जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को आज भी याद किया जाता है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस, अभिनय शैली और नृत्य कौशल ने उन्हें दर्शकों के बीच अलग पहचान दिलाई। इसी लोकप्रियता के कारण उन्हें बॉलीवुड की 'ड्रीम गर्ल' का नाम मिला, जो आज भी उनकी पहचान बना हुआ है।

फिल्मों के अलावा हेमा मालिनी ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य, खासकर भरतनाट्यम में भी अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने देश और विदेश में कई मंचों पर अपनी प्रस्तुतियां दीं और भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अभिनय और नृत्य दोनों क्षेत्रों में उनके योगदान की लगातार सराहना होती रही है। बाद के वर्षों में उन्होंने निर्देशन और फिल्म निर्माण में भी कदम रखा। वर्ष 1992 में उन्होंने फिल्म 'दिल आशना है' का निर्देशन और निर्माण किया। इस फिल्म में शाहरुख खान और दिव्या भारती मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे। इसके बाद 1995 में उन्होंने फिल्म 'मोहिनी' का निर्माण किया, जिसमें उनकी भतीजी मधू और अभिनेता सुदेश बेरी प्रमुख भूमिकाओं में थे। हालांकि निर्देशन के क्षेत्र में उन्होंने ज्यादा फिल्में नहीं बनाईं, लेकिन इस अनुभव को भी उन्होंने अपने करियर का महत्वपूर्ण हिस्सा माना।

समय के साथ हेमा मालिनी ने फिल्मों में काम कम कर दिया और राजनीति की ओर सक्रिय हो गईं। वर्तमान में वह लोकसभा सांसद के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभा रही हैं। इसके साथ ही वह सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी लगातार भाग लेती हैं। भारतीय सिनेमा में उनके लंबे और उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए वर्ष 2000 में उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया गया। बाद में वर्ष 2012 में उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि भी प्रदान की गई।

हेमा मालिनी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब फिल्म इंडस्ट्री में कलाकारों की फीस को लेकर लगातार चर्चाएं होती रहती हैं। बड़े सितारों की करोड़ों रुपये की फीस अक्सर सुर्खियां बनती है, लेकिन हेमा मालिनी का कहना है कि उनके दौर में फिल्मों की सफलता का पैमाना केवल पैसा नहीं था। उनके अनुसार, कलाकार की सबसे बड़ी कमाई दर्शकों का विश्वास, सम्मान और वर्षों तक मिलने वाला प्यार होता है। यही सोच उन्हें आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे सम्मानित और प्रेरणादायक अभिनेत्रियों में शामिल करती है।

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