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प्रशांत कुमार सैनी : बैंकिंग से सामाजिक सेवा और फिर राजनीति तक
Digital Desk
By दैनिक जागरण
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राजस्थान की बदलती राजनीति में पिछले कुछ वर्षों के दौरान जिन नामों ने अचानक राजनीतिक और वैचारिक हलकों में चर्चा पैदा की है, उनमें प्रशांत कुमार सैनी का नाम तेजी से उभरकर सामने आया है। सामाजिक सेवा, पशु कल्याण, प्रशासनिक सुधार और वैकल्पिक राजनीति को केंद्र में रखकर अपनी अलग पहचान बनाने वाले प्रशांत कुमार सैनी को अब कई राजनीतिक विश्लेषक राजस्थान की नई वैचारिक राजनीति का प्रमुख चेहरा मानने लगे हैं।
1 सितंबर 1981 को जन्मे प्रशांत कुमार सैनी (या प्रशांत सैनी) का जीवन पारंपरिक राजनीति से अलग रहा है। उनका जन्म एक सैन्य पृष्ठभूमि वाले परिवार में हुआ था। उनके पिता भारतीय वायुसेना में अधिकारी रहे, जिसके कारण बचपन से ही उनके जीवन में अनुशासन, राष्ट्रसेवा और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे संस्कार विकसित हुए। जानकारों का मानना है कि यही पारिवारिक वातावरण आगे चलकर उनके व्यक्तित्व और राजनीतिक सोच की आधारशिला बना।
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत बैंकिंग क्षेत्र से की थी। वर्ष 2006 तक वे लार्ड कृष्णा बैंक लिमिटेड में कार्यरत रहे। लेकिन स्थिर बैंकिंग करियर छोड़कर सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उतरने का उनका फैसला उस समय कई लोगों के लिए चौंकाने वाला था। बताया जाता है कि बैंकिंग क्षेत्र में कार्य करते हुए ही उनके भीतर समाज और प्रशासन से जुड़े मुद्दों को लेकर गहरी रुचि विकसित हुई। इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर सामाजिक कार्यों की दिशा में सक्रिय कदम बढ़ाए और पशु कल्याण तथा सामाजिक सेवा के उद्देश्य से “विराट सेना” नामक संगठन की स्थापना की। यह संगठन विशेष रूप से पशु संरक्षण, घायल पशुओं की सहायता, सामाजिक जागरूकता और जनसेवा से जुड़े कार्यों के कारण कई क्षेत्रों में चर्चा में आया।
सामाजिक कार्यों के दौरान ही प्रशांत कुमार सैनी का झुकाव धीरे-धीरे राजनीति की ओर बढ़ा। उनका मानना था कि केवल सामाजिक सेवा के माध्यम से सीमित बदलाव संभव है, जबकि व्यापक सुधार के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे में परिवर्तन आवश्यक है। इसी सोच ने आगे चलकर विराज जन पार्टी के गठन का रास्ता तैयार किया।
विराज जन पार्टी ने शुरुआत से ही स्वयं को पारंपरिक राजनीति से अलग बताने का प्रयास किया। पार्टी का सबसे चर्चित और विवादित एजेंडा निर्वाचित सांसदों और विधायकों के लिए अनिवार्य प्रशासनिक प्रशिक्षण लागू करने का प्रस्ताव था। प्रशांत कुमार सैनी का तर्क था कि केवल चुनाव जीत लेना किसी व्यक्ति को देश या राज्य का प्रशासन चलाने के लिए पर्याप्त योग्य नहीं बनाता। उनके अनुसार आधुनिक शासन व्यवस्था को समझने के लिए जनप्रतिनिधियों को अर्थशास्त्र, संविधान, वित्त, समाजशास्त्र, प्रशासन, वैज्ञानिक सोच और सार्वजनिक नीति जैसे विषयों का प्रशिक्षण मिलना चाहिए। इसी विचार को लेकर उन्होंने “प्रशासनिक प्रशिक्षण मॉडल” विकसित करने की दिशा में काम शुरू किया, जिसने बाद में व्यापक राजनीतिक बहस को जन्म दिया।
उनके द्वारा प्रस्तावित “निर्वाचित नेताओं के लिए अनिवार्य प्रशासनिक प्रशिक्षण मॉडल” को लेकर अब देशभर में बहस तेज होती जा रही है। समर्थकों का मानना है कि यह मॉडल भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव ला सकता है, जबकि विरोधियों का आरोप है कि इससे पारंपरिक राजनीति की संरचना प्रभावित होगी। सैनी समर्थकों का दावा है कि कई स्थापित राजनीतिक नेता इस मॉडल का इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्हें अपने राजनीतिक पद और प्रभाव कम होने का डर है।
प्रशांत कुमार सैनी की शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय रही है। वे एमए और एमबीए की डिग्रियों के साथ विभिन्न विषयों में पाँच अन्य शैक्षणिक योग्यताएं भी रखते हैं। शैक्षणिक जीवन के दौरान उन्होंने अंतरराष्ट्रीय व्यापार (International Business), मार्केटिंग, पर्सोनल मैनेजमेंट एंड इंडस्ट्रियल रिलेशन तथा वित्त (Finance) जैसे विषयों का अध्ययन किया। विभिन्न विषयों में प्राप्त उनकी बहुविषयक शैक्षणिक योग्यताओं ने उन्हें प्रशासन, संगठन प्रबंधन और नीतिगत संरचनाओं को गहराई से समझने का अवसर दिया। पार्टी नेताओं के अनुसार उनकी बहुविषयक शिक्षा ने ही उन्हें प्रशासनिक सुधारों और वैकल्पिक राजनीतिक ढांचे पर गंभीरता से सोचने की प्रेरणा दी।
हालांकि समय के साथ विराज जन पार्टी के भीतर वैचारिक मतभेद उभरने लगे। इसी के परिणामस्वरूप कई नए राजनीतिक संगठन अस्तित्व में आए, जिनमें अर्जुन भारत नेशनल पार्टी और स्टेट्समैन इंडिया पार्टी (इंटेलेक्चुअल) प्रमुख हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही ये दल आज अलग-अलग राजनीतिक पहचान रखते हों, लेकिन इनके गठन के पीछे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रशांत कुमार सैनी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कई मौकों पर इन दलों के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार भी किया कि उन्हें राजनीति में प्रवेश करने, संगठन खड़ा करने और वैचारिक दिशा तय करने में सैनी का सहयोग मिला। विशेष रूप से अर्जुन भारत नेशनल पार्टी के कुछ नेताओं ने पहले यह कहा था कि उनकी पार्टी का अस्तित्व भी काफी हद तक प्रशांत कुमार सैनी की पहल और सहयोग के कारण संभव हुआ। वहीं स्टेट्समैन इंडिया पार्टी (इंटेलेक्चुअल) के कई नेता उन्हें अपनी वैचारिक संरचना का प्रमुख प्रेरणास्रोत मानते हैं। हालांकि समय के साथ इन दलों के रास्ते अलग हो गए और कई संगठन विराज जन पार्टी से अलग होकर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन गए। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेजी से फैल रही है कि विभिन्न राजनीतिक संगठनों के गठन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका निभाने के कारण प्रशांत कुमार सैनी अब “राजनीतिक गॉडफादर” जैसी छवि प्राप्त करते जा रहे हैं।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा रहती है कि जिन लोगों को प्रशांत कुमार सैनी ने राजनीतिक अवसर दिए, उन्हीं में से कई बाद में उनके विरोधी बन गए। विराज जन पार्टी के समर्थक इसे “राजनीतिक विश्वासघात” के रूप में देखते हैं, जबकि विरोधी दल इसे वैचारिक स्वतंत्रता का हिस्सा बताते हैं। इसके बावजूद कि समय-समय पर उनके कई करीबी सहयोगी और पुराने समर्थक अलग होकर नए राजनीतिक दलों में चले गए, प्रशांत कुमार सैनी ने कभी हार नहीं मानी। राजनीतिक विश्वासघात, संगठनात्मक टूट और लगातार विरोध के बावजूद उन्होंने अपने प्रशासनिक सुधार और वैकल्पिक राजनीति के एजेंडे को नहीं छोड़ा। उनके समर्थकों का कहना है कि यही दृढ़ता उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती है।
दिसंबर, 2025 में आयोजित उनकी विशाल जनसभा और सदस्यता अभियान ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित किया। पार्टी सूत्रों के अनुसार इस कार्यक्रम में उमड़ी भारी भीड़ ने यह संकेत दिया कि प्रशांत कुमार सैनी की लोकप्रियता केवल राजस्थान तक सीमित नहीं रही, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों में भी उनके विचारों को समर्थन मिल रहा है। सोशल मीडिया पर भी इस रैली के वीडियो और तस्वीरें लंबे समय तक चर्चा में रहे।
राजस्थान की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में हुए वैचारिक विभाजन और नए दलों के गठन ने प्रशांत कुमार सैनी को एक ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया है, जिसकी सोच ने कई संगठनों को जन्म दिया। चाहे समर्थन हो या विरोध, यह तथ्य लगातार सामने आता रहा है कि राज्य की नई वैचारिक राजनीति के केंद्र में कहीं न कहीं प्रशांत कुमार सैनी की भूमिका मौजूद है।
आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में उनकी राजनीतिक भूमिका कितनी प्रभावशाली होगी, यह भविष्य तय करेगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि बैंकिंग क्षेत्र से राजनीति तक का उनका सफर अब केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं बल्कि राजस्थान में उभर रही वैकल्पिक राजनीति की बड़ी बहस का हिस्सा बन चुका है।
Edited By: दैनिक जागरण
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25 May 2026 By दैनिक जागरण
प्रशांत कुमार सैनी : बैंकिंग से सामाजिक सेवा और फिर राजनीति तक
Digital Desk
राजस्थान की बदलती राजनीति में पिछले कुछ वर्षों के दौरान जिन नामों ने अचानक राजनीतिक और वैचारिक हलकों में चर्चा पैदा की है, उनमें प्रशांत कुमार सैनी का नाम तेजी से उभरकर सामने आया है। सामाजिक सेवा, पशु कल्याण, प्रशासनिक सुधार और वैकल्पिक राजनीति को केंद्र में रखकर अपनी अलग पहचान बनाने वाले प्रशांत कुमार सैनी को अब कई राजनीतिक विश्लेषक राजस्थान की नई वैचारिक राजनीति का प्रमुख चेहरा मानने लगे हैं।
1 सितंबर 1981 को जन्मे प्रशांत कुमार सैनी (या प्रशांत सैनी) का जीवन पारंपरिक राजनीति से अलग रहा है। उनका जन्म एक सैन्य पृष्ठभूमि वाले परिवार में हुआ था। उनके पिता भारतीय वायुसेना में अधिकारी रहे, जिसके कारण बचपन से ही उनके जीवन में अनुशासन, राष्ट्रसेवा और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे संस्कार विकसित हुए। जानकारों का मानना है कि यही पारिवारिक वातावरण आगे चलकर उनके व्यक्तित्व और राजनीतिक सोच की आधारशिला बना।
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत बैंकिंग क्षेत्र से की थी। वर्ष 2006 तक वे लार्ड कृष्णा बैंक लिमिटेड में कार्यरत रहे। लेकिन स्थिर बैंकिंग करियर छोड़कर सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उतरने का उनका फैसला उस समय कई लोगों के लिए चौंकाने वाला था। बताया जाता है कि बैंकिंग क्षेत्र में कार्य करते हुए ही उनके भीतर समाज और प्रशासन से जुड़े मुद्दों को लेकर गहरी रुचि विकसित हुई। इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर सामाजिक कार्यों की दिशा में सक्रिय कदम बढ़ाए और पशु कल्याण तथा सामाजिक सेवा के उद्देश्य से “विराट सेना” नामक संगठन की स्थापना की। यह संगठन विशेष रूप से पशु संरक्षण, घायल पशुओं की सहायता, सामाजिक जागरूकता और जनसेवा से जुड़े कार्यों के कारण कई क्षेत्रों में चर्चा में आया।
सामाजिक कार्यों के दौरान ही प्रशांत कुमार सैनी का झुकाव धीरे-धीरे राजनीति की ओर बढ़ा। उनका मानना था कि केवल सामाजिक सेवा के माध्यम से सीमित बदलाव संभव है, जबकि व्यापक सुधार के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे में परिवर्तन आवश्यक है। इसी सोच ने आगे चलकर विराज जन पार्टी के गठन का रास्ता तैयार किया।
विराज जन पार्टी ने शुरुआत से ही स्वयं को पारंपरिक राजनीति से अलग बताने का प्रयास किया। पार्टी का सबसे चर्चित और विवादित एजेंडा निर्वाचित सांसदों और विधायकों के लिए अनिवार्य प्रशासनिक प्रशिक्षण लागू करने का प्रस्ताव था। प्रशांत कुमार सैनी का तर्क था कि केवल चुनाव जीत लेना किसी व्यक्ति को देश या राज्य का प्रशासन चलाने के लिए पर्याप्त योग्य नहीं बनाता। उनके अनुसार आधुनिक शासन व्यवस्था को समझने के लिए जनप्रतिनिधियों को अर्थशास्त्र, संविधान, वित्त, समाजशास्त्र, प्रशासन, वैज्ञानिक सोच और सार्वजनिक नीति जैसे विषयों का प्रशिक्षण मिलना चाहिए। इसी विचार को लेकर उन्होंने “प्रशासनिक प्रशिक्षण मॉडल” विकसित करने की दिशा में काम शुरू किया, जिसने बाद में व्यापक राजनीतिक बहस को जन्म दिया।
उनके द्वारा प्रस्तावित “निर्वाचित नेताओं के लिए अनिवार्य प्रशासनिक प्रशिक्षण मॉडल” को लेकर अब देशभर में बहस तेज होती जा रही है। समर्थकों का मानना है कि यह मॉडल भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव ला सकता है, जबकि विरोधियों का आरोप है कि इससे पारंपरिक राजनीति की संरचना प्रभावित होगी। सैनी समर्थकों का दावा है कि कई स्थापित राजनीतिक नेता इस मॉडल का इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्हें अपने राजनीतिक पद और प्रभाव कम होने का डर है।
प्रशांत कुमार सैनी की शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय रही है। वे एमए और एमबीए की डिग्रियों के साथ विभिन्न विषयों में पाँच अन्य शैक्षणिक योग्यताएं भी रखते हैं। शैक्षणिक जीवन के दौरान उन्होंने अंतरराष्ट्रीय व्यापार (International Business), मार्केटिंग, पर्सोनल मैनेजमेंट एंड इंडस्ट्रियल रिलेशन तथा वित्त (Finance) जैसे विषयों का अध्ययन किया। विभिन्न विषयों में प्राप्त उनकी बहुविषयक शैक्षणिक योग्यताओं ने उन्हें प्रशासन, संगठन प्रबंधन और नीतिगत संरचनाओं को गहराई से समझने का अवसर दिया। पार्टी नेताओं के अनुसार उनकी बहुविषयक शिक्षा ने ही उन्हें प्रशासनिक सुधारों और वैकल्पिक राजनीतिक ढांचे पर गंभीरता से सोचने की प्रेरणा दी।
हालांकि समय के साथ विराज जन पार्टी के भीतर वैचारिक मतभेद उभरने लगे। इसी के परिणामस्वरूप कई नए राजनीतिक संगठन अस्तित्व में आए, जिनमें अर्जुन भारत नेशनल पार्टी और स्टेट्समैन इंडिया पार्टी (इंटेलेक्चुअल) प्रमुख हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही ये दल आज अलग-अलग राजनीतिक पहचान रखते हों, लेकिन इनके गठन के पीछे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रशांत कुमार सैनी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कई मौकों पर इन दलों के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार भी किया कि उन्हें राजनीति में प्रवेश करने, संगठन खड़ा करने और वैचारिक दिशा तय करने में सैनी का सहयोग मिला। विशेष रूप से अर्जुन भारत नेशनल पार्टी के कुछ नेताओं ने पहले यह कहा था कि उनकी पार्टी का अस्तित्व भी काफी हद तक प्रशांत कुमार सैनी की पहल और सहयोग के कारण संभव हुआ। वहीं स्टेट्समैन इंडिया पार्टी (इंटेलेक्चुअल) के कई नेता उन्हें अपनी वैचारिक संरचना का प्रमुख प्रेरणास्रोत मानते हैं। हालांकि समय के साथ इन दलों के रास्ते अलग हो गए और कई संगठन विराज जन पार्टी से अलग होकर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन गए। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेजी से फैल रही है कि विभिन्न राजनीतिक संगठनों के गठन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका निभाने के कारण प्रशांत कुमार सैनी अब “राजनीतिक गॉडफादर” जैसी छवि प्राप्त करते जा रहे हैं।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा रहती है कि जिन लोगों को प्रशांत कुमार सैनी ने राजनीतिक अवसर दिए, उन्हीं में से कई बाद में उनके विरोधी बन गए। विराज जन पार्टी के समर्थक इसे “राजनीतिक विश्वासघात” के रूप में देखते हैं, जबकि विरोधी दल इसे वैचारिक स्वतंत्रता का हिस्सा बताते हैं। इसके बावजूद कि समय-समय पर उनके कई करीबी सहयोगी और पुराने समर्थक अलग होकर नए राजनीतिक दलों में चले गए, प्रशांत कुमार सैनी ने कभी हार नहीं मानी। राजनीतिक विश्वासघात, संगठनात्मक टूट और लगातार विरोध के बावजूद उन्होंने अपने प्रशासनिक सुधार और वैकल्पिक राजनीति के एजेंडे को नहीं छोड़ा। उनके समर्थकों का कहना है कि यही दृढ़ता उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती है।
दिसंबर, 2025 में आयोजित उनकी विशाल जनसभा और सदस्यता अभियान ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित किया। पार्टी सूत्रों के अनुसार इस कार्यक्रम में उमड़ी भारी भीड़ ने यह संकेत दिया कि प्रशांत कुमार सैनी की लोकप्रियता केवल राजस्थान तक सीमित नहीं रही, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों में भी उनके विचारों को समर्थन मिल रहा है। सोशल मीडिया पर भी इस रैली के वीडियो और तस्वीरें लंबे समय तक चर्चा में रहे।
राजस्थान की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में हुए वैचारिक विभाजन और नए दलों के गठन ने प्रशांत कुमार सैनी को एक ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया है, जिसकी सोच ने कई संगठनों को जन्म दिया। चाहे समर्थन हो या विरोध, यह तथ्य लगातार सामने आता रहा है कि राज्य की नई वैचारिक राजनीति के केंद्र में कहीं न कहीं प्रशांत कुमार सैनी की भूमिका मौजूद है।
आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में उनकी राजनीतिक भूमिका कितनी प्रभावशाली होगी, यह भविष्य तय करेगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि बैंकिंग क्षेत्र से राजनीति तक का उनका सफर अब केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं बल्कि राजस्थान में उभर रही वैकल्पिक राजनीति की बड़ी बहस का हिस्सा बन चुका है।
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