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50 साल बाद भी यादगार ‘संन्यासी’: जब हेमा मालिनी के डांस और मनोज कुमार की अभिनय ने मचाई थी धूम
Bollywood
बॉलीवुड की क्लासिक फिल्मों में शुमार ‘संन्यासी’ (Sanyasi) की रिलीज़ को आज पूरे 50 साल हो गए हैं। मनोज कुमार और हेमा मालिनी की जोड़ी से सजी यह फिल्म अपने समय की सबसे चर्चित फिल्मों में रही थी।
साल 1975 में जब ‘दीवार’, ‘शोले’ और ‘जय संतोषी मां’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में रिलीज हुईं, उसी साल ‘संन्यासी’ ने अपने बिंदास गीतों, बोल्ड डांस और संवादों के ज़रिए दर्शकों के दिलों में अलग पहचान बनाई।
इस फिल्म के गीत ‘चल संन्यासी मंदिर में...’ ने तो रिलीज़ के समय जैसे तूफान मचा दिया था। लता मंगेशकर और मुकेश की आवाज़ में रिकॉर्ड इस गाने पर हेमा मालिनी की अदाओं और डांस ने दर्शकों को बार-बार थिएटर खींच लाया।
गानों ने बनाई फिल्म की पहचान
‘संन्यासी’ का संगीत शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने तैयार किया था और खास बात यह रही कि इसमें एक या दो नहीं बल्कि छह गीतकारों ने गाने लिखे थे — इंदीवर, हसरत जयपुरी, वर्मा मलिक, एम.जी. हशमत, विश्वेश्वर शर्मा और विट्ठलभाई पटेल।
इन्हीं में से पं. विश्वेश्वर शर्मा द्वारा लिखा गीत “चल संन्यासी मंदिर में…” आज भी फिल्म की पहचान बना हुआ है। उनके दूसरे गीत “जैसा मेरा रूप रंगीला…” ने भी लोकप्रियता हासिल की थी।
हालांकि उस दौर में इस गीत के बोलों को लेकर विवाद भी हुआ था। कई धार्मिक संगठनों ने इसे ‘अश्लील’ बताकर विरोध जताया, लेकिन फिल्म के संवादों में ही मनोज कुमार इस विवाद का जवाब देते हैं — “क्यों हम जाएं मंदिर में, पाप है तेरे अंदर में…”
यह संवाद फिल्म के मूल संदेश को उजागर करता है — कि प्रेम ही पूजा है, प्रेम ही जीवन है।
जब मेनका बनीं हेमा मालिनी
फिल्म में हेमा मालिनी ने उस दौर के हिसाब से बेहद साहसिक और आकर्षक किरदार निभाया था। कहानी में वह एक ऐसी नायिका हैं जो अपने ब्रह्मचारी प्रेमी (मनोज कुमार) को सांसारिक जीवन की ओर लौटने के लिए प्रेरित करती हैं। उनके अभिनय, अभिव्यक्ति और नृत्य ने ‘संन्यासी’ को उस समय की सबसे बोल्ड और भावनात्मक फिल्मों में शामिल कर दिया।
कहानी में धर्म बनाम पाखंड
निर्देशक सोहनलाल कंवर ने इस फिल्म के जरिए समाज में फैले धार्मिक पाखंड पर गहरी चोट की थी। फिल्म में प्राण, प्रेमनाथ, सुलोचना और अरुणा ईरानी जैसे कलाकारों ने अपने किरदारों के जरिए यह दिखाया कि कैसे धर्म के नाम पर लोगों की भावनाओं से खेला जाता है।
प्रेमनाथ का किरदार, जो साधु बनकर अपराध करता है, आगे चलकर बॉलीवुड में ‘पाखंडी बाबा’ जैसे किरदारों की प्रेरणा बना।
अन्य लोकप्रिय गीत
फिल्म के अन्य गाने जैसे “सुन बाल ब्रह्मचारी मैं हूं कन्या कुमारी”, “बाली उमरिया भजन करूं कैसे” और “ये है गीता का ज्ञान” भी उस समय रेडियो और रिकॉर्डिंग कंपनियों पर छाए रहे। इन गानों की कोरियोग्राफी और भव्य सेट डिज़ाइन ने फिल्म को दर्शनीय बना दिया।
आज के दौर में असंभव फिल्म
आज जब सेंसर बोर्ड की कसौटी और समाज की संवेदनशीलता बदल चुकी है, ऐसे में ‘संन्यासी’ जैसी फिल्म का बन पाना लगभग असंभव लगता है। फिल्म में दिखाए गए संवाद और डांस सीन आज के दौर में विवाद खड़ा कर सकते थे, मगर 1975 में इन्हीं ने फिल्म को सफलता और साहस दोनों का प्रतीक बना दिया।
50 साल बाद भी अमर धुनें
आज ‘संन्यासी’ की धुनें पुरानी यादों को जिंदा कर देती हैं। मनोज कुमार का संयमित अभिनय और हेमा मालिनी की लाजवाब अदाएं आज भी सिनेमा प्रेमियों के दिलों में बसती हैं।
यह फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि उस दौर के समाज, संस्कृति और धर्म पर एक साहसी टिप्पणी थी।
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साल 1975 में जब ‘दीवार’, ‘शोले’ और ‘जय संतोषी मां’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में रिलीज हुईं, उसी साल ‘संन्यासी’ ने अपने बिंदास गीतों, बोल्ड डांस और संवादों के ज़रिए दर्शकों के दिलों में अलग पहचान बनाई।
इस फिल्म के गीत ‘चल संन्यासी मंदिर में...’ ने तो रिलीज़ के समय जैसे तूफान मचा दिया था। लता मंगेशकर और मुकेश की आवाज़ में रिकॉर्ड इस गाने पर हेमा मालिनी की अदाओं और डांस ने दर्शकों को बार-बार थिएटर खींच लाया।
गानों ने बनाई फिल्म की पहचान
‘संन्यासी’ का संगीत शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने तैयार किया था और खास बात यह रही कि इसमें एक या दो नहीं बल्कि छह गीतकारों ने गाने लिखे थे — इंदीवर, हसरत जयपुरी, वर्मा मलिक, एम.जी. हशमत, विश्वेश्वर शर्मा और विट्ठलभाई पटेल।
इन्हीं में से पं. विश्वेश्वर शर्मा द्वारा लिखा गीत “चल संन्यासी मंदिर में…” आज भी फिल्म की पहचान बना हुआ है। उनके दूसरे गीत “जैसा मेरा रूप रंगीला…” ने भी लोकप्रियता हासिल की थी।
हालांकि उस दौर में इस गीत के बोलों को लेकर विवाद भी हुआ था। कई धार्मिक संगठनों ने इसे ‘अश्लील’ बताकर विरोध जताया, लेकिन फिल्म के संवादों में ही मनोज कुमार इस विवाद का जवाब देते हैं — “क्यों हम जाएं मंदिर में, पाप है तेरे अंदर में…”
यह संवाद फिल्म के मूल संदेश को उजागर करता है — कि प्रेम ही पूजा है, प्रेम ही जीवन है।
जब मेनका बनीं हेमा मालिनी
फिल्म में हेमा मालिनी ने उस दौर के हिसाब से बेहद साहसिक और आकर्षक किरदार निभाया था। कहानी में वह एक ऐसी नायिका हैं जो अपने ब्रह्मचारी प्रेमी (मनोज कुमार) को सांसारिक जीवन की ओर लौटने के लिए प्रेरित करती हैं। उनके अभिनय, अभिव्यक्ति और नृत्य ने ‘संन्यासी’ को उस समय की सबसे बोल्ड और भावनात्मक फिल्मों में शामिल कर दिया।
कहानी में धर्म बनाम पाखंड
निर्देशक सोहनलाल कंवर ने इस फिल्म के जरिए समाज में फैले धार्मिक पाखंड पर गहरी चोट की थी। फिल्म में प्राण, प्रेमनाथ, सुलोचना और अरुणा ईरानी जैसे कलाकारों ने अपने किरदारों के जरिए यह दिखाया कि कैसे धर्म के नाम पर लोगों की भावनाओं से खेला जाता है।
प्रेमनाथ का किरदार, जो साधु बनकर अपराध करता है, आगे चलकर बॉलीवुड में ‘पाखंडी बाबा’ जैसे किरदारों की प्रेरणा बना।
अन्य लोकप्रिय गीत
फिल्म के अन्य गाने जैसे “सुन बाल ब्रह्मचारी मैं हूं कन्या कुमारी”, “बाली उमरिया भजन करूं कैसे” और “ये है गीता का ज्ञान” भी उस समय रेडियो और रिकॉर्डिंग कंपनियों पर छाए रहे। इन गानों की कोरियोग्राफी और भव्य सेट डिज़ाइन ने फिल्म को दर्शनीय बना दिया।
आज के दौर में असंभव फिल्म
आज जब सेंसर बोर्ड की कसौटी और समाज की संवेदनशीलता बदल चुकी है, ऐसे में ‘संन्यासी’ जैसी फिल्म का बन पाना लगभग असंभव लगता है। फिल्म में दिखाए गए संवाद और डांस सीन आज के दौर में विवाद खड़ा कर सकते थे, मगर 1975 में इन्हीं ने फिल्म को सफलता और साहस दोनों का प्रतीक बना दिया।
50 साल बाद भी अमर धुनें
आज ‘संन्यासी’ की धुनें पुरानी यादों को जिंदा कर देती हैं। मनोज कुमार का संयमित अभिनय और हेमा मालिनी की लाजवाब अदाएं आज भी सिनेमा प्रेमियों के दिलों में बसती हैं।
यह फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि उस दौर के समाज, संस्कृति और धर्म पर एक साहसी टिप्पणी थी।
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