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‘द ताज स्टोरी’: क्या ताजमहल कभी मंदिर था? फिल्म की कहानी पर उठा नया विवाद
Bollywood
दिग्गज अभिनेता परेश रावल की नई फिल्म ‘द ताज स्टोरी’ रिलीज़ होते ही चर्चा में आ गई है। ऐतिहासिक और धार्मिक भावनाओं से जुड़ी इस फिल्म ने थिएटर तक पहुंचते ही बहस छेड़ दी है — क्या सच में ताजमहल कभी मंदिर था, या यह सिर्फ एक काल्पनिक कहानी है?
फिल्म की रिलीज़ के साथ शुरू हुआ विवाद
‘द ताज स्टोरी’ शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई और इसके साथ ही इसे लेकर विवाद भी तेज हो गया। फिल्म के खिलाफ एक याचिका अदालत में दायर की गई है। वहीं, इस विवाद के बीच फिल्म की टीम ने स्पष्ट किया है कि फिल्म का उद्देश्य इतिहास को चुनौती देना नहीं, बल्कि कल्पना और आस्था के बीच संवाद पैदा करना है।
निर्देशक बोले – “तथ्यों और कल्पना का संगम है कहानी”
फिल्म के डायरेक्टर तुषार गोयल ने बताया कि यह फिल्म “ऐतिहासिक तथ्यों से प्रेरित होकर गढ़ी गई एक काल्पनिक कहानी” है। उन्होंने कहा, “ऐसे विषय पर कहानी कहने के लिए एक मजबूत नैरेटिव जरूरी होता है। फिल्म की नींव इतिहास पर रखी गई है, लेकिन इसकी कहानी पूरी तरह ओरिजनल है।”
कोर्टरूम ड्रामा के रूप में पेश हुई कहानी
कहानी में मुख्य किरदार विष्णु दास, एक टूरिस्ट गाइड है जो यह दावा करता है कि ताजमहल पहले एक मंदिर था। वह इस विषय पर एक याचिका अदालत में दायर करता है, और वहां से शुरू होता है कोर्टरूम ड्रामा। उसकी दलीलों का सामना करता है अनवर राशिद, जिसे जाकिर हुसैन ने निभाया है।
निर्देशक ने बताया कि फिल्म की संरचना “ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स” पर आधारित है, जिन्हें कानूनी बहस और भावनात्मक टकराव के रूप में पिरोया गया है।
परेश रावल ने दी अपनी राय
जब परेश रावल से पूछा गया कि क्या वह मानते हैं कि ताजमहल के नीचे कभी मंदिर था, तो उन्होंने साफ कहा —
“हम ऐसा नहीं मानते कि ताजमहल के अंदर कोई मंदिर है। यह गलतफहमी इसलिए है क्योंकि कहा जाता है कि यह पहले राजा मानसिंह का महल था, जिसे बाद में मकबरे में बदल दिया गया। किसी हिंदू महल में मंदिर होना स्वाभाविक माना जाता है, लेकिन इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है।”
ज़ाकिर हुसैन ने दी ऐतिहासिक व्याख्या
अभिनेता जाकिर हुसैन ने कहा, “शाहजहां की जीवनी में उल्लेख मिलता है कि यह महल पहले से मौजूद था, जिसे बाद में मुमताज़ महल के लिए एक मकबरे में रूपांतरित किया गया। फिल्म इसी ऐतिहासिक परिवर्तन और उसके मानवीय पहलू को दिखाती है।”
उन्होंने आगे कहा कि फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि ताजमहल जैसे अद्भुत निर्माण के बाद कारीगरों के साथ कैसा व्यवहार हुआ, और कैसे समय के साथ इसके अर्थ बदलते गए।
आस्था और कल्पना का संगम
‘द ताज स्टोरी’ को लेकर दर्शकों में जिज्ञासा है — कुछ इसे इतिहास की नई व्याख्या मान रहे हैं, तो कुछ इसे धार्मिक भावनाओं से जुड़ा मुद्दा बता रहे हैं। फिल्म निश्चित तौर पर एक ऐसा संवाद शुरू करती है, जो आस्था, इतिहास और सिनेमा के बीच की रेखाओं को परखता है।
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फिल्म की रिलीज़ के साथ शुरू हुआ विवाद
‘द ताज स्टोरी’ शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई और इसके साथ ही इसे लेकर विवाद भी तेज हो गया। फिल्म के खिलाफ एक याचिका अदालत में दायर की गई है। वहीं, इस विवाद के बीच फिल्म की टीम ने स्पष्ट किया है कि फिल्म का उद्देश्य इतिहास को चुनौती देना नहीं, बल्कि कल्पना और आस्था के बीच संवाद पैदा करना है।
निर्देशक बोले – “तथ्यों और कल्पना का संगम है कहानी”
फिल्म के डायरेक्टर तुषार गोयल ने बताया कि यह फिल्म “ऐतिहासिक तथ्यों से प्रेरित होकर गढ़ी गई एक काल्पनिक कहानी” है। उन्होंने कहा, “ऐसे विषय पर कहानी कहने के लिए एक मजबूत नैरेटिव जरूरी होता है। फिल्म की नींव इतिहास पर रखी गई है, लेकिन इसकी कहानी पूरी तरह ओरिजनल है।”
कोर्टरूम ड्रामा के रूप में पेश हुई कहानी
कहानी में मुख्य किरदार विष्णु दास, एक टूरिस्ट गाइड है जो यह दावा करता है कि ताजमहल पहले एक मंदिर था। वह इस विषय पर एक याचिका अदालत में दायर करता है, और वहां से शुरू होता है कोर्टरूम ड्रामा। उसकी दलीलों का सामना करता है अनवर राशिद, जिसे जाकिर हुसैन ने निभाया है।
निर्देशक ने बताया कि फिल्म की संरचना “ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स” पर आधारित है, जिन्हें कानूनी बहस और भावनात्मक टकराव के रूप में पिरोया गया है।
परेश रावल ने दी अपनी राय
जब परेश रावल से पूछा गया कि क्या वह मानते हैं कि ताजमहल के नीचे कभी मंदिर था, तो उन्होंने साफ कहा —
“हम ऐसा नहीं मानते कि ताजमहल के अंदर कोई मंदिर है। यह गलतफहमी इसलिए है क्योंकि कहा जाता है कि यह पहले राजा मानसिंह का महल था, जिसे बाद में मकबरे में बदल दिया गया। किसी हिंदू महल में मंदिर होना स्वाभाविक माना जाता है, लेकिन इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है।”
ज़ाकिर हुसैन ने दी ऐतिहासिक व्याख्या
अभिनेता जाकिर हुसैन ने कहा, “शाहजहां की जीवनी में उल्लेख मिलता है कि यह महल पहले से मौजूद था, जिसे बाद में मुमताज़ महल के लिए एक मकबरे में रूपांतरित किया गया। फिल्म इसी ऐतिहासिक परिवर्तन और उसके मानवीय पहलू को दिखाती है।”
उन्होंने आगे कहा कि फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि ताजमहल जैसे अद्भुत निर्माण के बाद कारीगरों के साथ कैसा व्यवहार हुआ, और कैसे समय के साथ इसके अर्थ बदलते गए।
आस्था और कल्पना का संगम
‘द ताज स्टोरी’ को लेकर दर्शकों में जिज्ञासा है — कुछ इसे इतिहास की नई व्याख्या मान रहे हैं, तो कुछ इसे धार्मिक भावनाओं से जुड़ा मुद्दा बता रहे हैं। फिल्म निश्चित तौर पर एक ऐसा संवाद शुरू करती है, जो आस्था, इतिहास और सिनेमा के बीच की रेखाओं को परखता है।
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