USD vs INR: 92 के करीब पहुंचा रुपया, लगातार दबाव ने बढ़ाई चिंता

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विदेशी निवेशकों की बिकवाली, मजबूत डॉलर और वैश्विक अनिश्चितता से भारतीय मुद्रा रिकॉर्ड निचले स्तर पर

भारतीय मुद्रा को लेकर चिंता बढ़ाने वाला संकेत सामने आया है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया कारोबार के दौरान 92 के करीब पहुंच गया, जो अब तक का सबसे कमजोर स्तर माना जा रहा है। दिन के सत्र में रुपया करीब 40 पैसे टूटकर 91.95–91.97 के आसपास कारोबार करता देखा गया। यह गिरावट लगातार कई सत्रों से जारी दबाव को दर्शाती है।

जनवरी के तीसरे सप्ताह में रुपये में तेज कमजोरी दर्ज की गई। विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मजबूती और वैश्विक जोखिम बढ़ने के कारण निवेशकों का रुझान सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर बढ़ा, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव आया।

रुपये की कमजोरी का असर आयात आधारित उद्योगों, कच्चे तेल की लागत और महंगाई के जोखिम पर पड़ सकता है। साथ ही, विदेशी कर्ज और डॉलर में भुगतान करने वाली कंपनियों की लागत बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।

गिरावट के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये पर दबाव के पीछे तीन मुख्य कारण हैं। पहला, जनवरी महीने में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की भारी बिकवाली। शेयर बाजार से हजारों करोड़ रुपये की निकासी ने डॉलर की मांग बढ़ाई, जिससे रुपया कमजोर हुआ।

दूसरा, अमेरिकी डॉलर की वैश्विक मजबूती। अमेरिकी केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों को ऊंचे स्तर पर बनाए रखने और सख्त मौद्रिक रुख के चलते डॉलर इंडेक्स मजबूत हुआ है। मजबूत डॉलर आमतौर पर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं को कमजोर करता है।

तीसरा, वैश्विक व्यापार और भू-राजनीतिक अनिश्चितता। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रेड टेंशन, टैरिफ को लेकर अनिश्चितता और मध्य पूर्व व यूरोप से जुड़े तनावों ने निवेशकों को जोखिम से दूर रहने के लिए प्रेरित किया है। इसका सीधा फायदा डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड जैसे सुरक्षित निवेशों को मिला है।

सरकारी और आरबीआई की भूमिका
सूत्रों के अनुसार, भारतीय रिज़र्व बैंक रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि आरबीआई का उद्देश्य किसी खास स्तर को बचाने से ज्यादा अस्थिरता को नियंत्रित करना है।

बाजार विश्लेषकों का कहना है कि 92 का स्तर रुपये के लिए एक अहम मनोवैज्ञानिक और तकनीकी स्तर हो सकता है। यदि वैश्विक जोखिम घटता है और निवेशकों का भरोसा लौटता है, तो रुपया 90.50–90.70 के दायरे में कुछ मजबूती दिखा सकता है। हालांकि, निकट भविष्य में उतार-चढ़ाव बने रहने की संभावना जताई जा रही है।

निवेशकों के लिए संदेश
विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि निवेशक वैश्विक घटनाक्रम, अमेरिकी नीतियों और कच्चे तेल की कीमतों पर करीबी नजर रखें, क्योंकि आने वाले दिनों में यही कारक रुपये की दिशा तय करेंगे।

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www.dainikjagranmpcg.com
23 Jan 2026 By ANKITA

USD vs INR: 92 के करीब पहुंचा रुपया, लगातार दबाव ने बढ़ाई चिंता

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भारतीय मुद्रा को लेकर चिंता बढ़ाने वाला संकेत सामने आया है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया कारोबार के दौरान 92 के करीब पहुंच गया, जो अब तक का सबसे कमजोर स्तर माना जा रहा है। दिन के सत्र में रुपया करीब 40 पैसे टूटकर 91.95–91.97 के आसपास कारोबार करता देखा गया। यह गिरावट लगातार कई सत्रों से जारी दबाव को दर्शाती है।

जनवरी के तीसरे सप्ताह में रुपये में तेज कमजोरी दर्ज की गई। विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मजबूती और वैश्विक जोखिम बढ़ने के कारण निवेशकों का रुझान सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर बढ़ा, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव आया।

रुपये की कमजोरी का असर आयात आधारित उद्योगों, कच्चे तेल की लागत और महंगाई के जोखिम पर पड़ सकता है। साथ ही, विदेशी कर्ज और डॉलर में भुगतान करने वाली कंपनियों की लागत बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।

गिरावट के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये पर दबाव के पीछे तीन मुख्य कारण हैं। पहला, जनवरी महीने में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की भारी बिकवाली। शेयर बाजार से हजारों करोड़ रुपये की निकासी ने डॉलर की मांग बढ़ाई, जिससे रुपया कमजोर हुआ।

दूसरा, अमेरिकी डॉलर की वैश्विक मजबूती। अमेरिकी केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों को ऊंचे स्तर पर बनाए रखने और सख्त मौद्रिक रुख के चलते डॉलर इंडेक्स मजबूत हुआ है। मजबूत डॉलर आमतौर पर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं को कमजोर करता है।

तीसरा, वैश्विक व्यापार और भू-राजनीतिक अनिश्चितता। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रेड टेंशन, टैरिफ को लेकर अनिश्चितता और मध्य पूर्व व यूरोप से जुड़े तनावों ने निवेशकों को जोखिम से दूर रहने के लिए प्रेरित किया है। इसका सीधा फायदा डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड जैसे सुरक्षित निवेशों को मिला है।

सरकारी और आरबीआई की भूमिका
सूत्रों के अनुसार, भारतीय रिज़र्व बैंक रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि आरबीआई का उद्देश्य किसी खास स्तर को बचाने से ज्यादा अस्थिरता को नियंत्रित करना है।

बाजार विश्लेषकों का कहना है कि 92 का स्तर रुपये के लिए एक अहम मनोवैज्ञानिक और तकनीकी स्तर हो सकता है। यदि वैश्विक जोखिम घटता है और निवेशकों का भरोसा लौटता है, तो रुपया 90.50–90.70 के दायरे में कुछ मजबूती दिखा सकता है। हालांकि, निकट भविष्य में उतार-चढ़ाव बने रहने की संभावना जताई जा रही है।

निवेशकों के लिए संदेश
विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि निवेशक वैश्विक घटनाक्रम, अमेरिकी नीतियों और कच्चे तेल की कीमतों पर करीबी नजर रखें, क्योंकि आने वाले दिनों में यही कारक रुपये की दिशा तय करेंगे।

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