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ईरान तनाव के बीच रूस का संकेत: भारत-चीन को बढ़ी हुई तेल आपूर्ति देने को तैयार
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पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच वैश्विक तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर आशंकाओं ने ऊर्जा आपूर्ति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे समय में रूस ने बड़ा संकेत दिया है कि आवश्यकता पड़ने पर वह भारत और चीन को कच्चे तेल की अतिरिक्त आपूर्ति कर सकता है।
रूस के उप प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक ने कहा कि वैश्विक बाजार में किसी भी तरह की कमी की स्थिति में उनका देश प्रमुख खरीदार देशों की जरूरतें पूरी करने के लिए तैयार है। उनका बयान ऐसे समय आया है जब ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।
रूस पहले से शीर्ष आपूर्तिकर्ता
रूस पहले ही भारत के लिए कच्चे तेल का प्रमुख स्रोत बना हुआ है। हाल के महीनों में भारत ने रूस से प्रतिदिन लगभग 10 लाख बैरल के आसपास तेल आयात किया है। भले ही कुछ उतार-चढ़ाव देखने को मिले हों, लेकिन कुल मिलाकर रूस की हिस्सेदारी मजबूत बनी हुई है।
इस बीच, मध्य पूर्व के पारंपरिक आपूर्तिकर्ता भी भारत को सप्लाई बढ़ा रहे हैं, फिर भी रूस की प्रतिस्पर्धी कीमतों और स्थिर आपूर्ति ने उसे भारतीय बाजार में अहम स्थान दिलाया है।
होर्मुज क्यों है रणनीतिक रूप से अहम?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाला बड़ा हिस्सा कच्चा तेल और गैस इसी रास्ते से अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचता है।
हालिया बयानों में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने इस मार्ग पर अपनी निगरानी और नियंत्रण का दावा किया है। वहीं डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि जरूरत पड़ने पर अमेरिकी नौसेना तेल टैंकरों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है। इन परस्पर बयानों ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया है।
भारत के लिए क्या मायने?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, और उसमें से एक महत्वपूर्ण मात्रा होर्मुज मार्ग से होकर आती है। यदि इस समुद्री रास्ते में लंबे समय तक व्यवधान पैदा होता है, तो आपूर्ति और कीमतों दोनों पर असर पड़ सकता है।
ऐसी स्थिति में रूस का अतिरिक्त आपूर्ति का संकेत भारत के लिए रणनीतिक रूप से राहत देने वाला माना जा रहा है। ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से विविध स्रोतों से आयात की नीति भारत के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
आगे क्या?
वैश्विक बाजार फिलहाल पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर नजर रखे हुए है। अगर तनाव बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता आ सकती है। वहीं रूस जैसे वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।

