मिडिल ईस्ट तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से बाजार में डॉलर की मांग बढ़ी

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रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर, डॉलर के मुकाबले 92.33 तक गिरा

नई दिल्ली। वैश्विक बाजार में बढ़ती अनिश्चितता और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बीच भारतीय रुपया सोमवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 92.33 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिर गया। यह अब तक का सबसे कमजोर स्तर है। दिन के कारोबार में रुपया करीब 46 पैसे टूटकर इस स्तर पर पहुंचा। विशेषज्ञों के मुताबिक मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध, महंगे होते कच्चे तेल और डॉलर की बढ़ती मांग के कारण रुपये पर दबाव बना हुआ है।

विदेशी मुद्रा बाजार के कारोबारियों के अनुसार रुपया सुबह 92.19 के स्तर पर खुला, जो शुरुआती अनुमान से बेहतर था। हालांकि कारोबार शुरू होते ही तेल कंपनियों और निवेशकों की ओर से डॉलर की खरीद बढ़ गई, जिससे रुपये में तेजी से गिरावट आई। बाजार सूत्रों का कहना है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने बाजार खुलने से पहले हस्तक्षेप कर स्थिति संभालने की कोशिश की, लेकिन वैश्विक दबाव के कारण रुपया कमजोर पड़ गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण आपूर्ति बाधित होने की आशंका से ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 117 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। पिछले एक सप्ताह में इसमें करीब 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि ईरान से जुड़े युद्ध शुरू होने के बाद कुल मिलाकर तेल की कीमतें लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने पर रिफाइनिंग कंपनियों को ज्यादा डॉलर चुकाने पड़ते हैं। इससे विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर हो जाता है। एक बैंक के करेंसी ट्रेडर के मुताबिक, मौजूदा हालात में जब तक तेल की कीमतें स्थिर नहीं होतीं, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है।

वैश्विक निवेशक भी फिलहाल सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। अमेरिकी डॉलर को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ‘सेफ हेवन’ माना जाता है। युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के समय निवेशक जोखिम भरे बाजारों से पैसा निकालकर डॉलर में निवेश करना पसंद करते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रवृत्ति से उभरते बाजारों की मुद्राओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

विश्लेषण रिपोर्टों के अनुसार तेल आयात पर निर्भर देशों की करेंसी सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती है। इसमें भारत के अलावा फिलीपींस जैसी अर्थव्यवस्थाएं भी शामिल हैं। इस साल की शुरुआत से अब तक रुपया दो प्रतिशत से ज्यादा कमजोर हो चुका है, जिससे यह 2026 में उभरते बाजारों की कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में गिना जा रहा है।

रुपये की कमजोरी का असर आम लोगों पर भी पड़ सकता है। विदेश में पढ़ाई या यात्रा करने वालों को डॉलर खरीदने के लिए अधिक रुपये खर्च करने पड़ेंगे। वहीं मोबाइल, लैपटॉप और विदेश से आयात होने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के दाम भी बढ़ सकते हैं। यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहीं तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है।

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10 Mar 2026 By Nitin Trivedi

मिडिल ईस्ट तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से बाजार में डॉलर की मांग बढ़ी

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नई दिल्ली। वैश्विक बाजार में बढ़ती अनिश्चितता और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बीच भारतीय रुपया सोमवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 92.33 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिर गया। यह अब तक का सबसे कमजोर स्तर है। दिन के कारोबार में रुपया करीब 46 पैसे टूटकर इस स्तर पर पहुंचा। विशेषज्ञों के मुताबिक मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध, महंगे होते कच्चे तेल और डॉलर की बढ़ती मांग के कारण रुपये पर दबाव बना हुआ है।

विदेशी मुद्रा बाजार के कारोबारियों के अनुसार रुपया सुबह 92.19 के स्तर पर खुला, जो शुरुआती अनुमान से बेहतर था। हालांकि कारोबार शुरू होते ही तेल कंपनियों और निवेशकों की ओर से डॉलर की खरीद बढ़ गई, जिससे रुपये में तेजी से गिरावट आई। बाजार सूत्रों का कहना है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने बाजार खुलने से पहले हस्तक्षेप कर स्थिति संभालने की कोशिश की, लेकिन वैश्विक दबाव के कारण रुपया कमजोर पड़ गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण आपूर्ति बाधित होने की आशंका से ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 117 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। पिछले एक सप्ताह में इसमें करीब 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि ईरान से जुड़े युद्ध शुरू होने के बाद कुल मिलाकर तेल की कीमतें लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने पर रिफाइनिंग कंपनियों को ज्यादा डॉलर चुकाने पड़ते हैं। इससे विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर हो जाता है। एक बैंक के करेंसी ट्रेडर के मुताबिक, मौजूदा हालात में जब तक तेल की कीमतें स्थिर नहीं होतीं, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है।

वैश्विक निवेशक भी फिलहाल सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। अमेरिकी डॉलर को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ‘सेफ हेवन’ माना जाता है। युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के समय निवेशक जोखिम भरे बाजारों से पैसा निकालकर डॉलर में निवेश करना पसंद करते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रवृत्ति से उभरते बाजारों की मुद्राओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

विश्लेषण रिपोर्टों के अनुसार तेल आयात पर निर्भर देशों की करेंसी सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती है। इसमें भारत के अलावा फिलीपींस जैसी अर्थव्यवस्थाएं भी शामिल हैं। इस साल की शुरुआत से अब तक रुपया दो प्रतिशत से ज्यादा कमजोर हो चुका है, जिससे यह 2026 में उभरते बाजारों की कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में गिना जा रहा है।

रुपये की कमजोरी का असर आम लोगों पर भी पड़ सकता है। विदेश में पढ़ाई या यात्रा करने वालों को डॉलर खरीदने के लिए अधिक रुपये खर्च करने पड़ेंगे। वहीं मोबाइल, लैपटॉप और विदेश से आयात होने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के दाम भी बढ़ सकते हैं। यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहीं तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है।

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