रोजमर्रा के FMCG सामान हो सकते हैं महंगे, बिस्किट-साबुन से तेल तक बढ़ेंगे दाम

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कच्चे माल की बढ़ती लागत से कंपनियों पर दबाव, कीमत बढ़ाने के साथ पैकेट की मात्रा घटाने की तैयारी

देश में रोजाना इस्तेमाल होने वाले सामान की खरीदारी आने वाले दिनों में जेब पर थोड़ा ज्यादा असर डाल सकती है। बिस्किट, साबुन, तेल, पैकेज्ड फूड और दूसरी FMCG चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी की तैयारी चल रही है। कंपनियों के सामने कच्चे माल की बढ़ती लागत सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। जियोपॉलिटिकल तनाव के बीच पाम ऑयल, चीनी और क्रूड ऑयल जैसी जरूरी चीजों की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ा है। इसका सीधा असर कंपनियों की उत्पादन लागत और मुनाफे पर पड़ रहा है। ऐसे में FMCG कंपनियां जुलाई से सितंबर वाली तिमाही में कीमतों में बदलाव का विकल्प देख रही हैं।

कंपनियों के लिए परेशानी सिर्फ कच्चे माल तक सीमित नहीं है। पैकेजिंग, परिवहन और दूसरी लागतों में भी दबाव बना हुआ है। यही वजह है कि कंपनियां ग्राहकों पर पूरा बोझ एक साथ डालने के बजाय अलग-अलग तरीके अपना सकती हैं। अप्रैल से जून की पिछली तिमाही में भी कई FMCG कंपनियों ने अपने उत्पादों की कीमतों में करीब 2 से 5 फीसदी तक बढ़ोतरी की थी। अब लागत में फिर इजाफा होने से बाजार में एक और दौर की कीमत बढ़ोतरी की चर्चा तेज है। हालांकि हर कंपनी और हर उत्पाद पर इसका असर एक जैसा नहीं होगा।

इस बार कंपनियां केवल सीधे दाम बढ़ाने के बजाय ‘श्रिंकफ्लेशन’ का रास्ता भी अपना सकती हैं। इसका मतलब है कि ग्राहक को पैकेट पहले की तरह दिखेगा और कीमत में बड़ा बदलाव नजर नहीं आएगा, लेकिन उसके अंदर मौजूद सामान की मात्रा कम हो सकती है। मसलन, किसी उत्पाद का पैकेट पहले जितने ग्राम का था, उसे कम वजन में बेचा जा सकता है। इस तरीके से कंपनियां बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा संभालने की कोशिश करती हैं और ग्राहक को अचानक बड़ी कीमत बढ़ोतरी का झटका भी कम दिखाई देता है।

FMCG सेक्टर में पाम ऑयल की कीमतों का खास असर पड़ता है। साबुन, बिस्किट, नमकीन और कई दूसरे पैकेज्ड उत्पादों में पाम ऑयल का इस्तेमाल होता है। इसकी कीमत में बढ़ोतरी होने पर कंपनियों की लागत सीधे प्रभावित होती है। इसी तरह चीनी के दाम बढ़ने से बिस्किट, मिठाई, पेय पदार्थ और दूसरे खाद्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियों पर दबाव बढ़ता है। क्रूड ऑयल महंगा होने का असर पैकेजिंग और ट्रांसपोर्ट लागत के जरिए भी कंपनियों तक पहुंचता है।

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उत्पादन लागत बढ़ने के बाद कंपनियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि अतिरिक्त खर्च का कितना हिस्सा ग्राहक से वसूला जाए। अगर पूरी लागत ग्राहकों पर डाल दी जाए तो बिक्री पर असर पड़ने का खतरा रहता है। दूसरी तरफ कीमतें लंबे समय तक नहीं बढ़ाने पर कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए कंपनियां कीमत, पैकेट का आकार और प्रमोशनल ऑफर जैसे कई विकल्पों को साथ लेकर चल सकती हैं।

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रोजमर्रा के सामान के बाजार में छोटी कीमत बढ़ोतरी भी बड़े स्तर पर असर डाल सकती है। FMCG उत्पादों की खरीदारी आम परिवारों के मासिक बजट का नियमित हिस्सा होती है। साबुन, शैंपू, खाने का तेल, टूथपेस्ट, बिस्किट, चाय, पैकेज्ड स्नैक्स और दूसरे घरेलू सामान की खरीद लगातार होती रहती है। ऐसे में किसी एक उत्पाद पर कुछ रुपये की बढ़ोतरी भी लंबे समय में कुल घरेलू खर्च को प्रभावित कर सकती है।

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कंपनियां इस समय ग्राहकों की खरीद क्षमता पर भी नजर रख रही हैं। ग्रामीण और शहरी बाजार में मांग का पैटर्न अलग है। अगर कीमत ज्यादा बढ़ती है तो ग्राहक छोटे पैक की ओर जा सकते हैं। यही वजह है कि आने वाले समय में छोटे पैकेट और कम मात्रा वाले उत्पादों की मांग बढ़ने की संभावना भी देखी जा रही है। कंपनियां कम कीमत वाले पैक के जरिए ऐसे ग्राहकों को बनाए रखने की कोशिश कर सकती हैं जो एक बार में ज्यादा पैसा खर्च नहीं करना चाहते।

बाजार में प्रतिस्पर्धा भी कंपनियों के फैसले को प्रभावित करेगी। FMCG कंपनियां कीमत बढ़ाने से पहले यह देखती हैं कि प्रतिस्पर्धी ब्रांड किस स्तर पर अपने उत्पाद बेच रहे हैं। अगर कोई कंपनी बहुत ज्यादा कीमत बढ़ाती है तो ग्राहक दूसरे ब्रांड की तरफ जा सकता है। ऐसे में कीमतों में बढ़ोतरी धीरे-धीरे करने या उत्पाद की मात्रा में बदलाव करने का विकल्प कंपनियों के लिए ज्यादा व्यावहारिक हो सकता है।

पाम ऑयल, चीनी और क्रूड ऑयल की कीमतों में आगे होने वाले बदलाव भी FMCG कंपनियों की रणनीति तय करने में अहम रहेंगे। अगर इन कच्चे माल की लागत लंबे समय तक ऊंची रहती है तो कंपनियों पर कीमतों में संशोधन का दबाव बना रहेगा। वहीं लागत में राहत आने पर कुछ कंपनियां कीमतों को स्थिर रखने या प्रमोशनल ऑफर बढ़ाने का रास्ता भी अपना सकती हैं। अभी कंपनियों की नजर सितंबर तिमाही के मार्जिन और बाजार में मांग की स्थिति पर बनी हुई है।

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10 Aug 2026 By Priyanka

रोजमर्रा के FMCG सामान हो सकते हैं महंगे, बिस्किट-साबुन से तेल तक बढ़ेंगे दाम

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देश में रोजाना इस्तेमाल होने वाले सामान की खरीदारी आने वाले दिनों में जेब पर थोड़ा ज्यादा असर डाल सकती है। बिस्किट, साबुन, तेल, पैकेज्ड फूड और दूसरी FMCG चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी की तैयारी चल रही है। कंपनियों के सामने कच्चे माल की बढ़ती लागत सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। जियोपॉलिटिकल तनाव के बीच पाम ऑयल, चीनी और क्रूड ऑयल जैसी जरूरी चीजों की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ा है। इसका सीधा असर कंपनियों की उत्पादन लागत और मुनाफे पर पड़ रहा है। ऐसे में FMCG कंपनियां जुलाई से सितंबर वाली तिमाही में कीमतों में बदलाव का विकल्प देख रही हैं।

कंपनियों के लिए परेशानी सिर्फ कच्चे माल तक सीमित नहीं है। पैकेजिंग, परिवहन और दूसरी लागतों में भी दबाव बना हुआ है। यही वजह है कि कंपनियां ग्राहकों पर पूरा बोझ एक साथ डालने के बजाय अलग-अलग तरीके अपना सकती हैं। अप्रैल से जून की पिछली तिमाही में भी कई FMCG कंपनियों ने अपने उत्पादों की कीमतों में करीब 2 से 5 फीसदी तक बढ़ोतरी की थी। अब लागत में फिर इजाफा होने से बाजार में एक और दौर की कीमत बढ़ोतरी की चर्चा तेज है। हालांकि हर कंपनी और हर उत्पाद पर इसका असर एक जैसा नहीं होगा।

इस बार कंपनियां केवल सीधे दाम बढ़ाने के बजाय ‘श्रिंकफ्लेशन’ का रास्ता भी अपना सकती हैं। इसका मतलब है कि ग्राहक को पैकेट पहले की तरह दिखेगा और कीमत में बड़ा बदलाव नजर नहीं आएगा, लेकिन उसके अंदर मौजूद सामान की मात्रा कम हो सकती है। मसलन, किसी उत्पाद का पैकेट पहले जितने ग्राम का था, उसे कम वजन में बेचा जा सकता है। इस तरीके से कंपनियां बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा संभालने की कोशिश करती हैं और ग्राहक को अचानक बड़ी कीमत बढ़ोतरी का झटका भी कम दिखाई देता है।

FMCG सेक्टर में पाम ऑयल की कीमतों का खास असर पड़ता है। साबुन, बिस्किट, नमकीन और कई दूसरे पैकेज्ड उत्पादों में पाम ऑयल का इस्तेमाल होता है। इसकी कीमत में बढ़ोतरी होने पर कंपनियों की लागत सीधे प्रभावित होती है। इसी तरह चीनी के दाम बढ़ने से बिस्किट, मिठाई, पेय पदार्थ और दूसरे खाद्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियों पर दबाव बढ़ता है। क्रूड ऑयल महंगा होने का असर पैकेजिंग और ट्रांसपोर्ट लागत के जरिए भी कंपनियों तक पहुंचता है।

उत्पादन लागत बढ़ने के बाद कंपनियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि अतिरिक्त खर्च का कितना हिस्सा ग्राहक से वसूला जाए। अगर पूरी लागत ग्राहकों पर डाल दी जाए तो बिक्री पर असर पड़ने का खतरा रहता है। दूसरी तरफ कीमतें लंबे समय तक नहीं बढ़ाने पर कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए कंपनियां कीमत, पैकेट का आकार और प्रमोशनल ऑफर जैसे कई विकल्पों को साथ लेकर चल सकती हैं।

रोजमर्रा के सामान के बाजार में छोटी कीमत बढ़ोतरी भी बड़े स्तर पर असर डाल सकती है। FMCG उत्पादों की खरीदारी आम परिवारों के मासिक बजट का नियमित हिस्सा होती है। साबुन, शैंपू, खाने का तेल, टूथपेस्ट, बिस्किट, चाय, पैकेज्ड स्नैक्स और दूसरे घरेलू सामान की खरीद लगातार होती रहती है। ऐसे में किसी एक उत्पाद पर कुछ रुपये की बढ़ोतरी भी लंबे समय में कुल घरेलू खर्च को प्रभावित कर सकती है।

कंपनियां इस समय ग्राहकों की खरीद क्षमता पर भी नजर रख रही हैं। ग्रामीण और शहरी बाजार में मांग का पैटर्न अलग है। अगर कीमत ज्यादा बढ़ती है तो ग्राहक छोटे पैक की ओर जा सकते हैं। यही वजह है कि आने वाले समय में छोटे पैकेट और कम मात्रा वाले उत्पादों की मांग बढ़ने की संभावना भी देखी जा रही है। कंपनियां कम कीमत वाले पैक के जरिए ऐसे ग्राहकों को बनाए रखने की कोशिश कर सकती हैं जो एक बार में ज्यादा पैसा खर्च नहीं करना चाहते।

बाजार में प्रतिस्पर्धा भी कंपनियों के फैसले को प्रभावित करेगी। FMCG कंपनियां कीमत बढ़ाने से पहले यह देखती हैं कि प्रतिस्पर्धी ब्रांड किस स्तर पर अपने उत्पाद बेच रहे हैं। अगर कोई कंपनी बहुत ज्यादा कीमत बढ़ाती है तो ग्राहक दूसरे ब्रांड की तरफ जा सकता है। ऐसे में कीमतों में बढ़ोतरी धीरे-धीरे करने या उत्पाद की मात्रा में बदलाव करने का विकल्प कंपनियों के लिए ज्यादा व्यावहारिक हो सकता है।

पाम ऑयल, चीनी और क्रूड ऑयल की कीमतों में आगे होने वाले बदलाव भी FMCG कंपनियों की रणनीति तय करने में अहम रहेंगे। अगर इन कच्चे माल की लागत लंबे समय तक ऊंची रहती है तो कंपनियों पर कीमतों में संशोधन का दबाव बना रहेगा। वहीं लागत में राहत आने पर कुछ कंपनियां कीमतों को स्थिर रखने या प्रमोशनल ऑफर बढ़ाने का रास्ता भी अपना सकती हैं। अभी कंपनियों की नजर सितंबर तिमाही के मार्जिन और बाजार में मांग की स्थिति पर बनी हुई है।

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