G20 2026: डिजिटल एसेट गवर्नेंस में नया संतुलन तय करने का समय

डिजिटल डेस्क

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लेखक: दिलीप चेनॉय, चेयरपर्सन, भारत वेब3 एसोसिएशन

साल 2026 में अमेरिका ने G20 की अध्यक्षता संभाल ली है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने फाइनेंस ट्रैक की प्राथमिकताएं और कार्यक्रम भी जारी कर दिए हैं। इनमें “एक मजबूत डिजिटल एसेट इकोसिस्टम को बढ़ावा देना” प्रमुख रूप से शामिल है। इसके साथ ही सीमा-पार भुगतान सुधारना, भुगतान धोखाधड़ी पर रोक, वित्तीय साक्षरता बढ़ाना, वित्तीय नियमों का आधुनिकीकरण और कर्ज में पारदर्शिता जैसे मुद्दे भी एजेंडा में हैं। खास बात यह है कि वर्चुअल डिजिटल एसेट्स को इस पूरे ढांचे में शामिल कर लिया गया है, जिससे वे अब वैश्विक आर्थिक शासन का हिस्सा बनते दिख रहे हैं।

भारत के लिए यह बदलाव एक अहम समय पर आया है। 2023 में अपनी G20 अध्यक्षता के दौरान भारत ने वर्चुअल डिजिटल एसेट्स पर एक समन्वित वैश्विक दृष्टिकोण तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। नई दिल्ली लीडर्स’ डिक्लेरेशन में फाइनेंशियल स्टेबिलिटी बोर्ड (FSB) की सिफारिशों को मंजूरी दी गई थी, जिनमें इन एसेट्स के नियमन, निगरानी और स्थिर कॉइन व्यवस्था शामिल थी। IMF–FSB की संयुक्त रिपोर्ट और रोडमैप का भी स्वागत किया गया था, जिसमें खास तौर पर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की कमजोरियों को पहचाना गया। साथ ही FATF मानकों के अनुरूप मनी लॉन्ड्रिंग और आतंक वित्तपोषण पर रोक की बात दोहराई गई। भारत का स्पष्ट रुख था—इनोवेशन हो, लेकिन संतुलित और नियंत्रित ढांचे के भीतर।

अब अमेरिका की अध्यक्षता उसी आधार को आगे बढ़ाते हुए इनोवेशन और आधुनिक नियमन पर ज्यादा जोर दे रही है। “इकोसिस्टम की मजबूती” पर जोर देकर अमेरिका विकास-केंद्रित सोच को आगे बढ़ा रहा है। भारत जैसे देशों के लिए चुनौती यह है कि वे इस नए दृष्टिकोण के साथ जुड़ें, लेकिन वित्तीय स्थिरता और व्यापक आर्थिक संतुलन को प्राथमिकता में बनाए रखें।

भारत ने इस दिशा में अपने घरेलू ढांचे को मजबूत किया है। वर्चुअल डिजिटल एसेट सेवा प्रदाताओं को एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग कानूनों के तहत लाया गया है। उन्हें फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट में रजिस्ट्रेशन करना होता है, ग्राहक पहचान (KYC) नियम लागू करने होते हैं और संदिग्ध लेनदेन की रिपोर्ट देनी होती है। इसके अलावा भारत ने OECD के Crypto-Asset Reporting Framework (CARF) को लागू करने का भी फैसला किया है। 1 अप्रैल 2027 से देशों के बीच डिजिटल एसेट लेनदेन की जानकारी अपने-आप साझा होगी। यूनियन बजट 2026 में गलत या अधूरी जानकारी देने पर रोजाना जुर्माने का प्रस्ताव भी रखा गया है। इससे निगरानी और पारदर्शिता दोनों बढ़ेंगी।

हालांकि, घरेलू बाजार में कुछ असंतुलन अभी भी मौजूद हैं। भारत में काम करने वाले एक्सचेंज कड़े नियमों और टैक्स ढांचे का पालन करते हैं, जबकि कई विदेशी प्लेटफॉर्म भारतीय यूजर्स को बिना ऐसे नियमों के सेवा दे रहे हैं। रिसर्च में सामने आया है कि TDS लागू होने के बाद ट्रेडिंग का बड़ा हिस्सा विदेशों की ओर चला गया है। इससे घरेलू बाजार में तरलता (liquidity) कम हुई है और टैक्स संग्रह पर भी असर पड़ा है। यानी पारदर्शिता बढ़ाने के लिए बनाए गए नियमों ने कुछ हद तक रेगुलेटरी आर्बिट्रेज को बढ़ावा दिया है।

अमेरिका की G20 अध्यक्षता भारत के लिए एक मौका है कि वह अपने घरेलू सुधारों को वैश्विक नीतियों के साथ संतुलित करे। यह बहस अब “इनोवेशन बनाम नियमन” की नहीं रहनी चाहिए। भारत को “रेगुलेटरी समानता” की बात रखनी चाहिए—यानी जो प्लेटफॉर्म भारतीय यूजर्स को सेवा दे रहे हैं, उन पर समान नियम लागू हों, चाहे वे देश में हों या विदेश में। साथ ही IMF–FSB रोडमैप के सिद्धांतों को भी केंद्र में बनाए रखना जरूरी है, जिसमें स्थिर कॉइन की पारदर्शिता, सीमा-पार डेटा साझा करना और वित्तीय जोखिमों की निगरानी शामिल है।

भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय सहयोग इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकता है। ब्लॉकचेन इंटरऑपरेबिलिटी, नियामक मानक और सीमा-पार भुगतान के नए मॉडल पर मिलकर काम किया जा सकता है। भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और CBDC (सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी) पर चल रहे प्रयोग ऐसे सहयोग के लिए मजबूत आधार दे सकते हैं। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और रेमिटेंस सिस्टम भी ज्यादा कुशल हो सकता है।

घरेलू स्तर पर भी स्पष्टता जरूरी है। एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग नियमों और CARF से पारदर्शिता तो बढ़ेगी, लेकिन TDS जैसे प्रावधानों की तकनीकी समीक्षा जरूरी है, ताकि बाजार में तरलता बनी रहे और निगरानी भी कमजोर न हो। साथ ही, नियमों का पालन करने वाले Web3 और ब्लॉकचेन स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन देने से भारत की क्षमता मजबूत हो सकती है।

वर्चुअल डिजिटल एसेट्स पर वैश्विक चर्चा अब एक नए चरण में पहुंच चुकी है। शुरुआती दौर में जहां अनिश्चितता और सावधानी थी, वहीं अब फोकस एकीकरण, मानकीकरण और प्रतिस्पर्धा पर है। अमेरिका जहां इनोवेशन को आगे बढ़ा रहा है, वहीं भारत का लक्ष्य यह होना चाहिए कि यह विकास एक संतुलित और स्थिर ढांचे के भीतर हो।

भारत पहले ही समन्वय, स्थिरता और संतुलन के सिद्धांतों को सामने रख चुका है। 2026 की G20 अध्यक्षता इन सिद्धांतों को मजबूत संस्थागत रूप देने का अवसर है। अगर घरेलू नीतियों और वैश्विक रणनीति के बीच तालमेल बना रहा, तो भारत न केवल वैश्विक डिजिटल एसेट नीति को दिशा दे सकता है, बल्कि अपनी डिजिटल अर्थव्यवस्था को भी अधिक मजबूत और विश्वसनीय बना सकता है।

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23 Mar 2026 By Nitin Trivedi

G20 2026: डिजिटल एसेट गवर्नेंस में नया संतुलन तय करने का समय

डिजिटल डेस्क

साल 2026 में अमेरिका ने G20 की अध्यक्षता संभाल ली है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने फाइनेंस ट्रैक की प्राथमिकताएं और कार्यक्रम भी जारी कर दिए हैं। इनमें “एक मजबूत डिजिटल एसेट इकोसिस्टम को बढ़ावा देना” प्रमुख रूप से शामिल है। इसके साथ ही सीमा-पार भुगतान सुधारना, भुगतान धोखाधड़ी पर रोक, वित्तीय साक्षरता बढ़ाना, वित्तीय नियमों का आधुनिकीकरण और कर्ज में पारदर्शिता जैसे मुद्दे भी एजेंडा में हैं। खास बात यह है कि वर्चुअल डिजिटल एसेट्स को इस पूरे ढांचे में शामिल कर लिया गया है, जिससे वे अब वैश्विक आर्थिक शासन का हिस्सा बनते दिख रहे हैं।

भारत के लिए यह बदलाव एक अहम समय पर आया है। 2023 में अपनी G20 अध्यक्षता के दौरान भारत ने वर्चुअल डिजिटल एसेट्स पर एक समन्वित वैश्विक दृष्टिकोण तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। नई दिल्ली लीडर्स’ डिक्लेरेशन में फाइनेंशियल स्टेबिलिटी बोर्ड (FSB) की सिफारिशों को मंजूरी दी गई थी, जिनमें इन एसेट्स के नियमन, निगरानी और स्थिर कॉइन व्यवस्था शामिल थी। IMF–FSB की संयुक्त रिपोर्ट और रोडमैप का भी स्वागत किया गया था, जिसमें खास तौर पर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की कमजोरियों को पहचाना गया। साथ ही FATF मानकों के अनुरूप मनी लॉन्ड्रिंग और आतंक वित्तपोषण पर रोक की बात दोहराई गई। भारत का स्पष्ट रुख था—इनोवेशन हो, लेकिन संतुलित और नियंत्रित ढांचे के भीतर।

अब अमेरिका की अध्यक्षता उसी आधार को आगे बढ़ाते हुए इनोवेशन और आधुनिक नियमन पर ज्यादा जोर दे रही है। “इकोसिस्टम की मजबूती” पर जोर देकर अमेरिका विकास-केंद्रित सोच को आगे बढ़ा रहा है। भारत जैसे देशों के लिए चुनौती यह है कि वे इस नए दृष्टिकोण के साथ जुड़ें, लेकिन वित्तीय स्थिरता और व्यापक आर्थिक संतुलन को प्राथमिकता में बनाए रखें।

भारत ने इस दिशा में अपने घरेलू ढांचे को मजबूत किया है। वर्चुअल डिजिटल एसेट सेवा प्रदाताओं को एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग कानूनों के तहत लाया गया है। उन्हें फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट में रजिस्ट्रेशन करना होता है, ग्राहक पहचान (KYC) नियम लागू करने होते हैं और संदिग्ध लेनदेन की रिपोर्ट देनी होती है। इसके अलावा भारत ने OECD के Crypto-Asset Reporting Framework (CARF) को लागू करने का भी फैसला किया है। 1 अप्रैल 2027 से देशों के बीच डिजिटल एसेट लेनदेन की जानकारी अपने-आप साझा होगी। यूनियन बजट 2026 में गलत या अधूरी जानकारी देने पर रोजाना जुर्माने का प्रस्ताव भी रखा गया है। इससे निगरानी और पारदर्शिता दोनों बढ़ेंगी।

हालांकि, घरेलू बाजार में कुछ असंतुलन अभी भी मौजूद हैं। भारत में काम करने वाले एक्सचेंज कड़े नियमों और टैक्स ढांचे का पालन करते हैं, जबकि कई विदेशी प्लेटफॉर्म भारतीय यूजर्स को बिना ऐसे नियमों के सेवा दे रहे हैं। रिसर्च में सामने आया है कि TDS लागू होने के बाद ट्रेडिंग का बड़ा हिस्सा विदेशों की ओर चला गया है। इससे घरेलू बाजार में तरलता (liquidity) कम हुई है और टैक्स संग्रह पर भी असर पड़ा है। यानी पारदर्शिता बढ़ाने के लिए बनाए गए नियमों ने कुछ हद तक रेगुलेटरी आर्बिट्रेज को बढ़ावा दिया है।

अमेरिका की G20 अध्यक्षता भारत के लिए एक मौका है कि वह अपने घरेलू सुधारों को वैश्विक नीतियों के साथ संतुलित करे। यह बहस अब “इनोवेशन बनाम नियमन” की नहीं रहनी चाहिए। भारत को “रेगुलेटरी समानता” की बात रखनी चाहिए—यानी जो प्लेटफॉर्म भारतीय यूजर्स को सेवा दे रहे हैं, उन पर समान नियम लागू हों, चाहे वे देश में हों या विदेश में। साथ ही IMF–FSB रोडमैप के सिद्धांतों को भी केंद्र में बनाए रखना जरूरी है, जिसमें स्थिर कॉइन की पारदर्शिता, सीमा-पार डेटा साझा करना और वित्तीय जोखिमों की निगरानी शामिल है।

भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय सहयोग इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकता है। ब्लॉकचेन इंटरऑपरेबिलिटी, नियामक मानक और सीमा-पार भुगतान के नए मॉडल पर मिलकर काम किया जा सकता है। भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और CBDC (सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी) पर चल रहे प्रयोग ऐसे सहयोग के लिए मजबूत आधार दे सकते हैं। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और रेमिटेंस सिस्टम भी ज्यादा कुशल हो सकता है।

घरेलू स्तर पर भी स्पष्टता जरूरी है। एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग नियमों और CARF से पारदर्शिता तो बढ़ेगी, लेकिन TDS जैसे प्रावधानों की तकनीकी समीक्षा जरूरी है, ताकि बाजार में तरलता बनी रहे और निगरानी भी कमजोर न हो। साथ ही, नियमों का पालन करने वाले Web3 और ब्लॉकचेन स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन देने से भारत की क्षमता मजबूत हो सकती है।

वर्चुअल डिजिटल एसेट्स पर वैश्विक चर्चा अब एक नए चरण में पहुंच चुकी है। शुरुआती दौर में जहां अनिश्चितता और सावधानी थी, वहीं अब फोकस एकीकरण, मानकीकरण और प्रतिस्पर्धा पर है। अमेरिका जहां इनोवेशन को आगे बढ़ा रहा है, वहीं भारत का लक्ष्य यह होना चाहिए कि यह विकास एक संतुलित और स्थिर ढांचे के भीतर हो।

भारत पहले ही समन्वय, स्थिरता और संतुलन के सिद्धांतों को सामने रख चुका है। 2026 की G20 अध्यक्षता इन सिद्धांतों को मजबूत संस्थागत रूप देने का अवसर है। अगर घरेलू नीतियों और वैश्विक रणनीति के बीच तालमेल बना रहा, तो भारत न केवल वैश्विक डिजिटल एसेट नीति को दिशा दे सकता है, बल्कि अपनी डिजिटल अर्थव्यवस्था को भी अधिक मजबूत और विश्वसनीय बना सकता है।

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