भारत की इकोनॉमी 6वें स्थान पर फिसली, IMF रिपोर्ट में ब्रिटेन आगे; रुपये की कमजोरी बनी बड़ी वजह

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डॉलर के मुकाबले गिरते रुपये और बेस ईयर बदलाव का असर; IMF का अनुमान—2027 तक भारत फिर टॉप-4 में शामिल होगा

भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक स्तर पर एक पायदान नीचे खिसककर छठे स्थान पर पहुंच गई है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था International Monetary Fund की ताजा रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है, जिसमें बताया गया है कि ब्रिटेन ने भारत को पीछे छोड़ते हुए पांचवां स्थान हासिल कर लिया है। इस बदलाव के पीछे मुख्य रूप से रुपये की डॉलर के मुकाबले कमजोरी और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के आकलन में बदलाव को जिम्मेदार माना जा रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की GDP लगभग 3.92 ट्रिलियन डॉलर रहने का अनुमान है, जो अगले वित्त वर्ष 2026-27 में बढ़कर 4.15 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। वहीं, ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था इसी अवधि में 4 ट्रिलियन डॉलर से अधिक बनी रहने का अनुमान है, जिससे वह रैंकिंग में आगे निकल गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार इस गिरावट के पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला, GDP के बेस ईयर को 2011-12 से बदलकर 2022-23 करना, जिससे अर्थव्यवस्था के आकार में 2.8% से 3.8% तक का अंतर देखने को मिला। दूसरा, डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में गिरावट, जो वर्ष की शुरुआत में करीब 89.91 से बढ़कर 93.38 तक पहुंच गई। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर में मापी जाने वाली GDP का मूल्य कम हो गया।

इसके विपरीत, ब्रिटिश मुद्रा की मजबूती ने वहां की अर्थव्यवस्था के मूल्यांकन को बढ़ाया, जिससे वैश्विक तुलना में उसे बढ़त मिली। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि मुद्रा विनिमय दरों में बदलाव का असर देशों की रैंकिंग पर सीधे पड़ता है, भले ही घरेलू आर्थिक गतिविधियां स्थिर बनी रहें।

हालांकि, मौजूदा गिरावट को दीर्घकालिक संकेत नहीं माना जा रहा है। अनुमान जताया गया है कि भारत आने वाले वर्षों में मजबूत आर्थिक वृद्धि दर्ज करेगा और 2027 तक जापान और ब्रिटेन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है।

GDP किसी देश में एक वर्ष के दौरान उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को दर्शाता है। यह आर्थिक विकास का प्रमुख सूचक माना जाता है। GDP में वृद्धि से रोजगार, आय और निवेश के अवसर बढ़ते हैं, जबकि गिरावट से आर्थिक गतिविधियों पर दबाव पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, भारत की रैंकिंग में आई यह गिरावट मुख्यतः वैश्विक मुद्रा उतार-चढ़ाव और सांख्यिकीय बदलावों का परिणाम है, जबकि दीर्घकालिक आर्थिक दृष्टिकोण अभी भी सकारात्मक बना हुआ है।

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16 Apr 2026 By Nitin Trivedi

भारत की इकोनॉमी 6वें स्थान पर फिसली, IMF रिपोर्ट में ब्रिटेन आगे; रुपये की कमजोरी बनी बड़ी वजह

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भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक स्तर पर एक पायदान नीचे खिसककर छठे स्थान पर पहुंच गई है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था International Monetary Fund की ताजा रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है, जिसमें बताया गया है कि ब्रिटेन ने भारत को पीछे छोड़ते हुए पांचवां स्थान हासिल कर लिया है। इस बदलाव के पीछे मुख्य रूप से रुपये की डॉलर के मुकाबले कमजोरी और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के आकलन में बदलाव को जिम्मेदार माना जा रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की GDP लगभग 3.92 ट्रिलियन डॉलर रहने का अनुमान है, जो अगले वित्त वर्ष 2026-27 में बढ़कर 4.15 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। वहीं, ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था इसी अवधि में 4 ट्रिलियन डॉलर से अधिक बनी रहने का अनुमान है, जिससे वह रैंकिंग में आगे निकल गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार इस गिरावट के पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला, GDP के बेस ईयर को 2011-12 से बदलकर 2022-23 करना, जिससे अर्थव्यवस्था के आकार में 2.8% से 3.8% तक का अंतर देखने को मिला। दूसरा, डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में गिरावट, जो वर्ष की शुरुआत में करीब 89.91 से बढ़कर 93.38 तक पहुंच गई। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर में मापी जाने वाली GDP का मूल्य कम हो गया।

इसके विपरीत, ब्रिटिश मुद्रा की मजबूती ने वहां की अर्थव्यवस्था के मूल्यांकन को बढ़ाया, जिससे वैश्विक तुलना में उसे बढ़त मिली। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि मुद्रा विनिमय दरों में बदलाव का असर देशों की रैंकिंग पर सीधे पड़ता है, भले ही घरेलू आर्थिक गतिविधियां स्थिर बनी रहें।

हालांकि, मौजूदा गिरावट को दीर्घकालिक संकेत नहीं माना जा रहा है। अनुमान जताया गया है कि भारत आने वाले वर्षों में मजबूत आर्थिक वृद्धि दर्ज करेगा और 2027 तक जापान और ब्रिटेन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है।

GDP किसी देश में एक वर्ष के दौरान उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को दर्शाता है। यह आर्थिक विकास का प्रमुख सूचक माना जाता है। GDP में वृद्धि से रोजगार, आय और निवेश के अवसर बढ़ते हैं, जबकि गिरावट से आर्थिक गतिविधियों पर दबाव पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, भारत की रैंकिंग में आई यह गिरावट मुख्यतः वैश्विक मुद्रा उतार-चढ़ाव और सांख्यिकीय बदलावों का परिणाम है, जबकि दीर्घकालिक आर्थिक दृष्टिकोण अभी भी सकारात्मक बना हुआ है।

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