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1 अप्रैल से लागू होंगे इनकम टैक्स के नए नियम: सैलरी, कंपनी घर-गाड़ी और गिफ्ट्स पर बदलेगा टैक्स कैलकुलेशन
बिजनेस न्यूज
वित्त वर्ष 2026-27 से लागू होगी नई टैक्स व्यवस्था; रिटायरमेंट फंड में ₹7.5 लाख से ज्यादा योगदान, ऑफिस कार और एम्प्लॉयर गिफ्ट्स पर टैक्स के नए प्रावधान
केंद्र सरकार 1 अप्रैल 2026 से देश में इनकम टैक्स के नए नियम लागू करने जा रही है, जिससे सैलरी स्ट्रक्चर, कंपनी से मिलने वाली सुविधाओं और रिटायरमेंट फंड पर टैक्स की गणना का तरीका बदल जाएगा। सरकार द्वारा तैयार किए गए इनकम टैक्स रूल्स 2026 मौजूदा इनकम टैक्स नियमों की जगह लेंगे और इन्हें वित्त वर्ष 2026-27 से लागू किया जाएगा। इसका असर असेसमेंट ईयर 2027-28 से दाखिल होने वाले आयकर रिटर्न पर दिखाई देगा।
सरकार का उद्देश्य टैक्स कैलकुलेशन को सरल बनाना और सैलरी के साथ मिलने वाली सुविधाओं यानी ‘पर्र्क्स’ की वैल्यू तय करने के लिए एक स्पष्ट फॉर्मूला तैयार करना है। इससे टैक्स असेसमेंट में पारदर्शिता बढ़ाने की कोशिश की गई है। इन प्रस्तावित नियमों को फरवरी 2026 में जनता के सुझावों के लिए जारी किया गया था।
नए नियमों के तहत कंपनी द्वारा कर्मचारी के रिटायरमेंट फंड में सालाना ₹7.5 लाख से ज्यादा योगदान अब टैक्स के दायरे में आएगा। इसमें प्रोविडेंट फंड (PF), नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) और सुपरएन्युएशन फंड में कंपनी की ओर से जमा राशि शामिल होगी। सीमा से अधिक राशि और उससे मिलने वाले रिटर्न को टैक्सेबल आय माना जाएगा।
सैलरी के साथ मिलने वाले कंपनी के आवास की टैक्स वैल्यू भी अब शहर की आबादी के आधार पर तय होगी। 40 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में इसे कर्मचारी की सैलरी का 10 प्रतिशत, 15 से 40 लाख आबादी वाले शहरों में 7.5 प्रतिशत और छोटे शहरों में 5 प्रतिशत माना जाएगा। यदि कर्मचारी खुद किराया देता है, तो वह राशि इस मूल्य से घटाई जा सकेगी।
इसी तरह ऑफिस की कार का निजी और आधिकारिक उपयोग भी टैक्सेबल सुविधा माना जाएगा। 1.6 लीटर तक के इंजन वाली कार पर प्रति माह ₹5,000 और उससे बड़े इंजन वाली कार पर ₹7,000 की टैक्स वैल्यू तय की गई है। यदि कंपनी ड्राइवर की सुविधा देती है, तो अतिरिक्त ₹3,000 प्रतिमाह जोड़े जाएंगे।
कॉरपोरेट सेक्टर में कर्मचारियों को मिलने वाले त्योहारी गिफ्ट और वाउचर भी नए नियमों के तहत सीमित कर दिए गए हैं। अब साल भर में ₹15,000 तक के गिफ्ट ही टैक्स-फ्री होंगे। इससे अधिक राशि पूरी तरह टैक्स के दायरे में आएगी।
इसके अलावा ऑफिस में मिलने वाला भोजन भी एक सीमा तक टैक्स से मुक्त रहेगा। यदि भोजन या पेय पदार्थ की कीमत ₹200 प्रति मील से अधिक नहीं है, तो उस पर टैक्स नहीं लगेगा। वहीं कंपनी से लिए गए कम ब्याज या बिना ब्याज के लोन पर भी टैक्स लगाया जाएगा, जिसकी गणना भारतीय स्टेट बैंक की ब्याज दर के आधार पर होगी। हालांकि ₹2 लाख तक के लोन और गंभीर बीमारी के इलाज के लिए लिए गए ऋण को छूट दी गई है।
विशेषज्ञों के मुताबिक इन बदलावों का सीधा असर कर्मचारियों की टेक-होम सैलरी और सैलरी स्ट्रक्चर पर पड़ सकता है। कंपनियों को अपने पेरोल सिस्टम और टैक्स कैलकुलेशन सॉफ्टवेयर अपडेट करने होंगे ताकि फॉर्म-16 और सैलरी स्लिप में नई वैल्यू शामिल की जा सके।
टैक्स विशेषज्ञों का सुझाव है कि कर्मचारियों को नए नियम लागू होने से पहले अपने सैलरी कंपोनेंट्स जैसे कंपनी कार, आवास और रिटायरमेंट फंड की समीक्षा कर लेनी चाहिए, ताकि संभावित टैक्स देनदारी को बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सके। यह बदलाव देश के लाखों वेतनभोगी कर्मचारियों और कॉरपोरेट सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण सरकारी अपडेट माना जा रहा है।
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केंद्र सरकार 1 अप्रैल 2026 से देश में इनकम टैक्स के नए नियम लागू करने जा रही है, जिससे सैलरी स्ट्रक्चर, कंपनी से मिलने वाली सुविधाओं और रिटायरमेंट फंड पर टैक्स की गणना का तरीका बदल जाएगा। सरकार द्वारा तैयार किए गए इनकम टैक्स रूल्स 2026 मौजूदा इनकम टैक्स नियमों की जगह लेंगे और इन्हें वित्त वर्ष 2026-27 से लागू किया जाएगा। इसका असर असेसमेंट ईयर 2027-28 से दाखिल होने वाले आयकर रिटर्न पर दिखाई देगा।
सरकार का उद्देश्य टैक्स कैलकुलेशन को सरल बनाना और सैलरी के साथ मिलने वाली सुविधाओं यानी ‘पर्र्क्स’ की वैल्यू तय करने के लिए एक स्पष्ट फॉर्मूला तैयार करना है। इससे टैक्स असेसमेंट में पारदर्शिता बढ़ाने की कोशिश की गई है। इन प्रस्तावित नियमों को फरवरी 2026 में जनता के सुझावों के लिए जारी किया गया था।
नए नियमों के तहत कंपनी द्वारा कर्मचारी के रिटायरमेंट फंड में सालाना ₹7.5 लाख से ज्यादा योगदान अब टैक्स के दायरे में आएगा। इसमें प्रोविडेंट फंड (PF), नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) और सुपरएन्युएशन फंड में कंपनी की ओर से जमा राशि शामिल होगी। सीमा से अधिक राशि और उससे मिलने वाले रिटर्न को टैक्सेबल आय माना जाएगा।
सैलरी के साथ मिलने वाले कंपनी के आवास की टैक्स वैल्यू भी अब शहर की आबादी के आधार पर तय होगी। 40 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में इसे कर्मचारी की सैलरी का 10 प्रतिशत, 15 से 40 लाख आबादी वाले शहरों में 7.5 प्रतिशत और छोटे शहरों में 5 प्रतिशत माना जाएगा। यदि कर्मचारी खुद किराया देता है, तो वह राशि इस मूल्य से घटाई जा सकेगी।
इसी तरह ऑफिस की कार का निजी और आधिकारिक उपयोग भी टैक्सेबल सुविधा माना जाएगा। 1.6 लीटर तक के इंजन वाली कार पर प्रति माह ₹5,000 और उससे बड़े इंजन वाली कार पर ₹7,000 की टैक्स वैल्यू तय की गई है। यदि कंपनी ड्राइवर की सुविधा देती है, तो अतिरिक्त ₹3,000 प्रतिमाह जोड़े जाएंगे।
कॉरपोरेट सेक्टर में कर्मचारियों को मिलने वाले त्योहारी गिफ्ट और वाउचर भी नए नियमों के तहत सीमित कर दिए गए हैं। अब साल भर में ₹15,000 तक के गिफ्ट ही टैक्स-फ्री होंगे। इससे अधिक राशि पूरी तरह टैक्स के दायरे में आएगी।
इसके अलावा ऑफिस में मिलने वाला भोजन भी एक सीमा तक टैक्स से मुक्त रहेगा। यदि भोजन या पेय पदार्थ की कीमत ₹200 प्रति मील से अधिक नहीं है, तो उस पर टैक्स नहीं लगेगा। वहीं कंपनी से लिए गए कम ब्याज या बिना ब्याज के लोन पर भी टैक्स लगाया जाएगा, जिसकी गणना भारतीय स्टेट बैंक की ब्याज दर के आधार पर होगी। हालांकि ₹2 लाख तक के लोन और गंभीर बीमारी के इलाज के लिए लिए गए ऋण को छूट दी गई है।
विशेषज्ञों के मुताबिक इन बदलावों का सीधा असर कर्मचारियों की टेक-होम सैलरी और सैलरी स्ट्रक्चर पर पड़ सकता है। कंपनियों को अपने पेरोल सिस्टम और टैक्स कैलकुलेशन सॉफ्टवेयर अपडेट करने होंगे ताकि फॉर्म-16 और सैलरी स्लिप में नई वैल्यू शामिल की जा सके।
टैक्स विशेषज्ञों का सुझाव है कि कर्मचारियों को नए नियम लागू होने से पहले अपने सैलरी कंपोनेंट्स जैसे कंपनी कार, आवास और रिटायरमेंट फंड की समीक्षा कर लेनी चाहिए, ताकि संभावित टैक्स देनदारी को बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सके। यह बदलाव देश के लाखों वेतनभोगी कर्मचारियों और कॉरपोरेट सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण सरकारी अपडेट माना जा रहा है।
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