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पेट्रोल-डीजल घाटा: तेल कंपनियां प्रति लीटर 18 तक नुकसान में
बिजनेस न्यूज
Petrol Diesel Loss के बीच कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं, LPG पर 80,000 करोड़ का दबाव
देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें भले ही स्थिर बनी हुई हैं, लेकिन इससे तेल कंपनियों पर वित्तीय दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। “पेट्रोल-डीजल लॉस” की स्थिति में सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को हर लीटर पेट्रोल पर करीब ₹14 और डीजल पर लगभग ₹18 तक का नुकसान झेलना पड़ रहा है।
रेटिंग एजेंसी की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है, लेकिन घरेलू स्तर पर कीमतें नहीं बढ़ाई गईं। इसका सीधा असर कंपनियों के मुनाफे (मार्जिन) पर पड़ा है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति पर दबाव और बढ़ गया है।
नई दिल्ली से जारी आंकड़ों के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के चलते कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसका असर यह हुआ कि कुछ ही हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 120 डॉलर के पार पहुंच गईं। ऐसे में कंपनियों को महंगा कच्चा तेल खरीदना पड़ रहा है, जबकि उपभोक्ताओं को पुराने रेट पर ईंधन बेचना पड़ रहा है।
27 फरवरी से 30 अप्रैल के बीच इंडियन बास्केट में कच्चे तेल की कीमत करीब 42 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ गई। इसी अवधि में ब्रेंट क्रूड और ओपेक बास्केट में भी तेज उछाल दर्ज किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि सप्लाई चेन में बाधा और भू-राजनीतिक तनाव इस तेजी की मुख्य वजह हैं।
मिडिल ईस्ट असर
हॉर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल गुजरता है।इस रूट पर तनाव बढ़ने से वैश्विक सप्लाई प्रभावित हो रही है।ऊर्जा विशेषज्ञों के मुताबिक, इस मार्ग में किसी भी तरह की बाधा सीधे तौर पर तेल की कीमतों को प्रभावित करती है। यही कारण है कि मौजूदा संकट का असर केवल भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक बाजारों पर भी दिख रहा है।
रसोई और खेती पर असर
महंगे कच्चे तेल का असर अब आम उपभोक्ताओं तक पहुंच रहा है।LPG सिलेंडर और खाद की लागत में भी तेजी देखी जा रही है। रसोई गैस के मामले में कंपनियों को लागत से कम कीमत पर सिलेंडर बेचना पड़ रहा है, जिससे इस वित्त वर्ष में करीब ₹80,000 करोड़ का अंडर-रिकवरी बोझ बनने का अनुमान है। वहीं, उर्वरक सब्सिडी का खर्च भी बढ़ सकता है, जो पहले तय बजट से काफी अधिक हो सकता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि “अंडर-रिकवरी” का मतलब है कि कंपनियों को उत्पाद तैयार करने या खरीदने में जितनी लागत आती है, उससे कम कीमत पर बेचने से होने वाला अंतर नुकसान के रूप में दर्ज होता है। फिलहाल पेट्रोल, डीजल और LPG तीनों में यही स्थिति बन रही है।
इसका असर CNG और औद्योगिक क्षेत्रों पर भी पड़ रहा है। केमिकल, प्लास्टिक और उर्वरक उद्योगों की लागत बढ़ने से उनका भविष्य दबाव में दिखाई दे रहा है। कुछ एजेंसियों ने इन सेक्टरों के आउटलुक को “नेगेटिव” करार दिया है।सरकार फिलहाल कीमतों को स्थिर रखने की रणनीति पर काम कर रही है, ताकि आम जनता पर महंगाई का सीधा असर न पड़े।
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पेट्रोल-डीजल घाटा: तेल कंपनियां प्रति लीटर 18 तक नुकसान में
बिजनेस न्यूज
देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें भले ही स्थिर बनी हुई हैं, लेकिन इससे तेल कंपनियों पर वित्तीय दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। “पेट्रोल-डीजल लॉस” की स्थिति में सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को हर लीटर पेट्रोल पर करीब ₹14 और डीजल पर लगभग ₹18 तक का नुकसान झेलना पड़ रहा है।
रेटिंग एजेंसी की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है, लेकिन घरेलू स्तर पर कीमतें नहीं बढ़ाई गईं। इसका सीधा असर कंपनियों के मुनाफे (मार्जिन) पर पड़ा है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति पर दबाव और बढ़ गया है।
नई दिल्ली से जारी आंकड़ों के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के चलते कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसका असर यह हुआ कि कुछ ही हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 120 डॉलर के पार पहुंच गईं। ऐसे में कंपनियों को महंगा कच्चा तेल खरीदना पड़ रहा है, जबकि उपभोक्ताओं को पुराने रेट पर ईंधन बेचना पड़ रहा है।
27 फरवरी से 30 अप्रैल के बीच इंडियन बास्केट में कच्चे तेल की कीमत करीब 42 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ गई। इसी अवधि में ब्रेंट क्रूड और ओपेक बास्केट में भी तेज उछाल दर्ज किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि सप्लाई चेन में बाधा और भू-राजनीतिक तनाव इस तेजी की मुख्य वजह हैं।
मिडिल ईस्ट असर
हॉर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल गुजरता है।इस रूट पर तनाव बढ़ने से वैश्विक सप्लाई प्रभावित हो रही है।ऊर्जा विशेषज्ञों के मुताबिक, इस मार्ग में किसी भी तरह की बाधा सीधे तौर पर तेल की कीमतों को प्रभावित करती है। यही कारण है कि मौजूदा संकट का असर केवल भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक बाजारों पर भी दिख रहा है।
रसोई और खेती पर असर
महंगे कच्चे तेल का असर अब आम उपभोक्ताओं तक पहुंच रहा है।LPG सिलेंडर और खाद की लागत में भी तेजी देखी जा रही है। रसोई गैस के मामले में कंपनियों को लागत से कम कीमत पर सिलेंडर बेचना पड़ रहा है, जिससे इस वित्त वर्ष में करीब ₹80,000 करोड़ का अंडर-रिकवरी बोझ बनने का अनुमान है। वहीं, उर्वरक सब्सिडी का खर्च भी बढ़ सकता है, जो पहले तय बजट से काफी अधिक हो सकता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि “अंडर-रिकवरी” का मतलब है कि कंपनियों को उत्पाद तैयार करने या खरीदने में जितनी लागत आती है, उससे कम कीमत पर बेचने से होने वाला अंतर नुकसान के रूप में दर्ज होता है। फिलहाल पेट्रोल, डीजल और LPG तीनों में यही स्थिति बन रही है।
इसका असर CNG और औद्योगिक क्षेत्रों पर भी पड़ रहा है। केमिकल, प्लास्टिक और उर्वरक उद्योगों की लागत बढ़ने से उनका भविष्य दबाव में दिखाई दे रहा है। कुछ एजेंसियों ने इन सेक्टरों के आउटलुक को “नेगेटिव” करार दिया है।सरकार फिलहाल कीमतों को स्थिर रखने की रणनीति पर काम कर रही है, ताकि आम जनता पर महंगाई का सीधा असर न पड़े।
