RBI MPC Meeting 2026: क्या बदलेगी ब्याज दर? आज 10 बजे गवर्नर करेंगे बड़ा ऐलान, रेपो रेट 5.25% पर रहने की उम्मीद

बिजनेस डेस्क

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महंगाई, वैश्विक आर्थिक हालात और कच्चे तेल की कीमतों के बीच RBI की मौद्रिक नीति बैठक आज होगी समाप्त, विशेषज्ञों को रेपो रेट में फिलहाल बदलाव की उम्मीद नहीं।

आज भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक पर टिकी हुई हैं। तीन दिन तक चली इस महत्वपूर्ण बैठक का फैसला बुधवार सुबह 10 बजे RBI गवर्नर द्वारा सार्वजनिक किया जाएगा। माना जा रहा है कि केंद्रीय बैंक इस बार रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करेगा और इसे मौजूदा 5.25 प्रतिशत पर ही बरकरार रख सकता है। हालांकि, महंगाई, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और घरेलू विकास दर को लेकर RBI का रुख क्या रहेगा, इस पर बाजार और आम लोगों की निगाहें बनी हुई हैं।

रेपो रेट वह ब्याज दर होती है जिस पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण उपलब्ध कराता है। इसी दर के आधार पर बैंकों की लोन और जमा योजनाओं की ब्याज दरें भी प्रभावित होती हैं। यदि रेपो रेट में बदलाव होता है तो इसका सीधा असर होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन और ईएमआई पर देखने को मिलता है।

इस बार RBI किसी भी तरह की जल्दबाजी नहीं करेगा। बीते कुछ महीनों में महंगाई के आंकड़ों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और अमेरिका के फेडरल रिजर्व की सख्त मौद्रिक नीति भी भारत के लिए चुनौती बनी हुई है। ऐसे में केंद्रीय बैंक फिलहाल ब्याज दरों को स्थिर रखकर आर्थिक हालात पर नजर बनाए रखना चाहेगा।

RBI की पिछली मौद्रिक नीति समीक्षा जून 2026 में हुई थी। उस समय भी रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा गया था। हालांकि, केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2027 के लिए महंगाई के अनुमान को 4.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया था। इससे साफ संकेत मिला था कि महंगाई को लेकर रिजर्व बैंक अभी भी सतर्क है और भविष्य की परिस्थितियों के अनुसार ही आगे के फैसले लिए जाएंगे।

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इस वित्तीय वर्ष में RBI की कुल छह मौद्रिक नीति बैठकें प्रस्तावित हैं। अप्रैल और जून के बाद यह तीसरी बैठक है। वर्ष की अगली बैठकों में महंगाई, आर्थिक वृद्धि और वैश्विक परिस्थितियों के आधार पर आगे की रणनीति तय की जाएगी। यदि महंगाई लगातार ऊंचे स्तर पर बनी रहती है तो आने वाले महीनों में ब्याज दरों में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

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भारतीय अर्थव्यवस्था संतुलित स्थिति में दिखाई दे रही है। औद्योगिक गतिविधियां धीरे-धीरे मजबूत हो रही हैं, लेकिन खाद्य महंगाई और मौसम संबंधी चुनौतियां चिंता का विषय बनी हुई हैं। मानसून की स्थिति और कृषि उत्पादन का असर भी आने वाले महीनों में महंगाई पर पड़ सकता है। यही वजह है कि RBI फिलहाल स्थिति का आकलन करते हुए कोई बड़ा कदम उठाने से बच सकता है।

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इक्विरस सिक्योरिटीज के रिसर्च हेड मौलिक पटेल सहित कई बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि दिसंबर की मौद्रिक नीति समीक्षा में परिस्थितियों के अनुसार 25 बेसिस पॉइंट तक की बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है। उनका कहना है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि और मौसम से जुड़ी अनिश्चितताओं का असर खुदरा और थोक महंगाई पर दिखाई दे रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही तो वर्ष के अंत तक RBI को सख्त रुख अपनाना पड़ सकता है।

रेपो रेट को महंगाई नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी मौद्रिक उपकरण माना जाता है। जब बाजार में महंगाई बढ़ती है तो RBI रेपो रेट बढ़ाकर बैंकों के लिए कर्ज महंगा कर देता है। इसके बाद बैंक भी ग्राहकों के लिए लोन की ब्याज दरें बढ़ा देते हैं, जिससे बाजार में धन का प्रवाह कम होता है और मांग घटने के साथ महंगाई पर नियंत्रण पाने में मदद मिलती है।

इसके विपरीत जब अर्थव्यवस्था धीमी पड़ती है या निवेश और मांग बढ़ाने की जरूरत होती है, तब रिजर्व बैंक रेपो रेट में कटौती करता है। इससे बैंकों को सस्ता कर्ज मिलता है और वे ग्राहकों को कम ब्याज दर पर लोन उपलब्ध कराते हैं। इससे निवेश, खर्च और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलती है।

पिछले वर्षों में RBI ने आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार कई बार ब्याज दरों में बदलाव किया है। वर्ष 2025 के दौरान केंद्रीय बैंक ने चार अलग-अलग चरणों में कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती की थी, जिससे कारोबार और उपभोक्ताओं को राहत मिली थी। हालांकि अब बढ़ती महंगाई और वैश्विक आर्थिक दबावों के कारण केंद्रीय बैंक अधिक सतर्क नजर आ रहा है।

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05 Aug 2026 By Vaishnavi.J

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रेपो रेट वह ब्याज दर होती है जिस पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण उपलब्ध कराता है। इसी दर के आधार पर बैंकों की लोन और जमा योजनाओं की ब्याज दरें भी प्रभावित होती हैं। यदि रेपो रेट में बदलाव होता है तो इसका सीधा असर होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन और ईएमआई पर देखने को मिलता है।

इस बार RBI किसी भी तरह की जल्दबाजी नहीं करेगा। बीते कुछ महीनों में महंगाई के आंकड़ों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और अमेरिका के फेडरल रिजर्व की सख्त मौद्रिक नीति भी भारत के लिए चुनौती बनी हुई है। ऐसे में केंद्रीय बैंक फिलहाल ब्याज दरों को स्थिर रखकर आर्थिक हालात पर नजर बनाए रखना चाहेगा।

RBI की पिछली मौद्रिक नीति समीक्षा जून 2026 में हुई थी। उस समय भी रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा गया था। हालांकि, केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2027 के लिए महंगाई के अनुमान को 4.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया था। इससे साफ संकेत मिला था कि महंगाई को लेकर रिजर्व बैंक अभी भी सतर्क है और भविष्य की परिस्थितियों के अनुसार ही आगे के फैसले लिए जाएंगे।

इस वित्तीय वर्ष में RBI की कुल छह मौद्रिक नीति बैठकें प्रस्तावित हैं। अप्रैल और जून के बाद यह तीसरी बैठक है। वर्ष की अगली बैठकों में महंगाई, आर्थिक वृद्धि और वैश्विक परिस्थितियों के आधार पर आगे की रणनीति तय की जाएगी। यदि महंगाई लगातार ऊंचे स्तर पर बनी रहती है तो आने वाले महीनों में ब्याज दरों में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

भारतीय अर्थव्यवस्था संतुलित स्थिति में दिखाई दे रही है। औद्योगिक गतिविधियां धीरे-धीरे मजबूत हो रही हैं, लेकिन खाद्य महंगाई और मौसम संबंधी चुनौतियां चिंता का विषय बनी हुई हैं। मानसून की स्थिति और कृषि उत्पादन का असर भी आने वाले महीनों में महंगाई पर पड़ सकता है। यही वजह है कि RBI फिलहाल स्थिति का आकलन करते हुए कोई बड़ा कदम उठाने से बच सकता है।

इक्विरस सिक्योरिटीज के रिसर्च हेड मौलिक पटेल सहित कई बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि दिसंबर की मौद्रिक नीति समीक्षा में परिस्थितियों के अनुसार 25 बेसिस पॉइंट तक की बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है। उनका कहना है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि और मौसम से जुड़ी अनिश्चितताओं का असर खुदरा और थोक महंगाई पर दिखाई दे रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही तो वर्ष के अंत तक RBI को सख्त रुख अपनाना पड़ सकता है।

रेपो रेट को महंगाई नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी मौद्रिक उपकरण माना जाता है। जब बाजार में महंगाई बढ़ती है तो RBI रेपो रेट बढ़ाकर बैंकों के लिए कर्ज महंगा कर देता है। इसके बाद बैंक भी ग्राहकों के लिए लोन की ब्याज दरें बढ़ा देते हैं, जिससे बाजार में धन का प्रवाह कम होता है और मांग घटने के साथ महंगाई पर नियंत्रण पाने में मदद मिलती है।

इसके विपरीत जब अर्थव्यवस्था धीमी पड़ती है या निवेश और मांग बढ़ाने की जरूरत होती है, तब रिजर्व बैंक रेपो रेट में कटौती करता है। इससे बैंकों को सस्ता कर्ज मिलता है और वे ग्राहकों को कम ब्याज दर पर लोन उपलब्ध कराते हैं। इससे निवेश, खर्च और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलती है।

पिछले वर्षों में RBI ने आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार कई बार ब्याज दरों में बदलाव किया है। वर्ष 2025 के दौरान केंद्रीय बैंक ने चार अलग-अलग चरणों में कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती की थी, जिससे कारोबार और उपभोक्ताओं को राहत मिली थी। हालांकि अब बढ़ती महंगाई और वैश्विक आर्थिक दबावों के कारण केंद्रीय बैंक अधिक सतर्क नजर आ रहा है।

https://www.dainikjagranmpcg.com/business/rbi-mpc-meeting-2026-will-the-interest-rate-change-today/article-60743

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