डॉ अवनीश राही का त्रि-आयामी गीत–महाग्रंथ “मैं भूख हूँ” Golden Book of World Records में दर्ज

Digital Desk

हिन्दी साहित्य शीघ्र ही एक ऐसे गीत–महाग्रंथ का साक्षी बनने जा रहा है, जो केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि मनुष्यत्व, करुणा और सामाजिक चेतना का एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ है। प्रख्यात कवि गीतकार, साहित्यकार, शिक्षाविद और विचारक डॉ॰ अवनीश राही की बहुप्रतीक्षित कृति

"मैं भूख हूँ : एक युग-काव्य संहिता"

(रोटी से राष्ट्र तक की वेदना)

11 जुलाई को उनके जन्मदिवस के अवसर पर औपचारिक रूप से लोकार्पित होने जा रही है। लगभग 450 पृष्ठों में विस्तृत यह गीत–ग्रंथ समकालीन हिन्दी साहित्य में एक नए सांस्कृतिक और तकनीकी अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है, क्योंकि यह केवल पठनीय नहीं, बल्कि श्रवणीय और दर्शनीय स्वरूप में भी विकसित किया गया है।

जब कविता पृष्ठों से बाहर आ गई…

युग–काव्य–संहिता : मैं भूख हूँ” की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अभिनव साहित्यिक अवधारणा है। इस गीत–महाग्रंथ की प्रत्येक रचना के अंत में एक विशेष QR Code दिया गया है, जिसे स्कैन करते ही पाठक उस रचना को स्वयं कवि–कंठ में सुन और दृश्यात्मक रूप में अनुभव कर सकेगा। इस प्रकार यह कृति पारंपरिक पठन से आगे बढ़कर शब्द, स्वर और दृश्य के अद्वितीय समागम में रूपांतरित हो जाती है। यही नवाचारपूर्ण साहित्यिक संरचना इसे समकालीन हिन्दी साहित्य की अन्य कृतियों से विशिष्ट बनाती है। इसी अभिनव प्रस्तुति के कारण युग–काव्य–संहिता : मैं भूख हूँ” को Golden Book of World Records में दर्ज किया जा चुका है। इस बहुप्रतीक्षित गीत–ग्रंथ को हबहॉक्स नुवॉइस प्रकाशन प्रकाशित कर रहा है, जबकि इसका वैश्विक वितरण Penguin Random House कर रहा है। साहित्य–जगत में इसे हिन्दी के एक ऐसे प्रयोगधर्मी गीत–महाग्रंथ के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ कविता केवल पढ़ी नहीं जाती — बल्कि सुनी, देखी और भीतर अनुभव की जाती है।

भूख : रोटी से आगे मनुष्यत्व की खोज

डॉ॰ अवनीश राही की कविता में “भूख” केवल पेट की व्यथा नहीं है। वह न्याय की भूख है। सम्मान की भूख है। समता की भूख है। और सबसे बढ़कर — मनुष्यत्व को बचाए रखने की भूख है। यह गीत–ग्रंथ भूख को करुणा के निष्क्रिय प्रतीक की तरह प्रस्तुत नहीं करता; यह उसे प्रश्न, प्रतिरोध और सामाजिक पुनर्जागरण की युग–संवादिनी के रूप में स्थापित करता है। इस गीत–महाग्रंथ की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक यह है कि इसकी केंद्रीय नायिका — “भूख” — किसी स्थिर प्रतीक की तरह उपस्थित नहीं होती। वह प्रत्येक पृष्ठ पर नया रूप धारण करती है। कहीं वह माँ की आँखों में उतरती करुणा है, कहीं किसान की मिट्टी से उठता धैर्य, कहीं श्रमिक के पसीने की चमक, और कहीं सैनिक के रक्त का राष्ट्र–संकल्प। वह केवल रोटी की तलाश नहीं करती —वह मनुष्यत्व, सम्मान, न्याय और समता का अर्थ खोजती है। इसी कारण यह कृति केवल साहित्य नहीं, बल्कि मनुष्यत्व की पुनर्स्थापना का सांस्कृतिक दस्तावेज़ प्रतीत होती है।

31 अक्टूबर 1984 : विभीषिका की राख से जन्मा कवि

डॉ॰ राही की संवेदनात्मक यात्रा का प्रारम्भ उस दौर से जुड़ा है जब राष्ट्र स्वयं एक गहरे आघात से गुजर रहा था। 31 अक्टूबर 1984 — प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भय, शोक और अस्थिरता से भरा हुआ था। उसी विभीषिका के बीच एक बालक ने पहली बार शब्दों को करुणा में बदलते देखा। वही बालक आगे चलकर डॉ॰ अवनीश राही बना, जिसकी कविता आज वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय है। उनकी रचनाओं में पीड़ा केवल वर्णित नहीं होती —वह मनुष्य के भीतर उतरकर प्रश्न बन जाती है।

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महाकाव्य, समता और सामाजिक स्वाभिमान की यात्रा

चार दशकों से अधिक की साहित्य–साधना में डॉ॰ राही ने गीत, महाकाव्य, काव्य–संहिताएँ, सांस्कृतिक ग्रंथ और श्रव्य–दृश्य प्रस्तुतियों के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान निर्मित की है। उनके सह-लेखित कालजयी ग्रंथ भीम चरित मानस”, “बुद्ध ज्ञान महासागर” और “कांशीराम चरित मानस” भारतीय सामाजिक समता और स्वाभिमान की महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों में गिने जाते हैं। इन ग्रंथों का लोकार्पण राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की गरिमामय उपस्थिति में संपन्न हुआ था। साहित्य, संगीत और दृश्य–माध्यमों में उनके दीर्घ सृजनात्मक योगदान की स्वीकृति स्वरूप वे The Film & Screen Writers Association, Mumbai तथा IPRS, Mumbai के आजीवन सदस्य हैं।

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जब कविता जन–गान बन गई

डॉ॰ राही की रचनात्मक यात्रा केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रही। उनके सैकड़ों गीत देश की विभिन्न प्रतिष्ठित संगीत कंपनियों द्वारा ऑडियो, वीडियो, सीडी तथा डीवीडी स्वरूपों में जारी हो चुके हैं। उनके गीतों को भारतीय फिल्म–जगत के प्रतिष्ठित स्वर–साधकों — कुमार सानू, उदित नारायण, अलका याज्ञनिक, अनुराधा पौडवाल, अनूप जलोटा और रविन्द्र जैन — ने अपनी आवाज़ दी, जिससे उनकी कविता जन–गान का रूप ले सकी। उनकी म्यूज़िकल प्रस्तुतियाँ, फिल्में और काव्य–आधारित परियोजनाएँ साहित्य को मंच, संगीत और दृश्य–अनुभव से जोड़ने का कार्य करती रही हैं।

विश्व–पटल पर हिन्दी का अभिनव साहित्यिक प्रयोग

युग–काव्य–संहिता : मैं भूख हूँ” को भविष्य में एक भव्य cinematic audiobook और श्रव्य–महाग्रंथ के रूप में भी विकसित किए जाने की योजना है, जहाँ प्रत्येक अध्याय ध्वनि, संगीत और सूत्रधार–स्वर के माध्यम से जीवित अनुभव में रूपांतरित होगा। यदि यह प्रयोग अपने पूर्ण स्वरूप में सामने आता है, तो यह हिन्दी साहित्य में audiobook संस्कृति को एक बिल्कुल नया आयाम दे सकता है। यह सम्भवतः हिन्दी साहित्य का पहला ऐसा गीत–महाग्रंथ है, जहाँ कविता केवल पृष्ठों पर नहीं रहती —वह स्वर, दृश्य और अनुभूति में परिवर्तित हो जाती है।

सम्मान, साधना और युग–स्वीकृति

साहित्य और सामाजिक सरोकारों के क्षेत्र में डॉ॰ राही को राष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों और मानद अलंकरणों से विभूषित किया गया है, जिनमें “भारत विभूषण सम्मान” तथा मानद “विद्यावाचस्पति” उपाधि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ये सम्मान केवल उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि उस सतत साहित्य–साधना की स्वीकृतियाँ हैं जिसने शब्दों को संवेदना और कविता को सामाजिक सरोकार का स्वर बनाया।

अंतिम उद्घोष : जहाँ कविता पुनः मनुष्यत्व का स्वर बन जाती है

युग–काव्य–संहिता : मैं भूख हूँ” केवल एक गीत–ग्रंथ नहीं, बल्कि उस समय की सांस्कृतिक पुकार है जहाँ साहित्य पुनः मनुष्य के भीतर लौटना चाहता है।  यह काल–कृति कविता को पृष्ठों की सीमाओं से मुक्त कर स्वर, दृश्य और अनुभूति के विराट आयाम में रूपांतरित करती है। शायद इसी कारण यह गीत–महाग्रंथ आज केवल साहित्यिक चर्चा का विषय नहीं, बल्कि समकालीन हिन्दी साहित्य मेंएक नए युग की आहट के रूप में देखा जा रहा है।

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11 May 2026 By दैनिक जागरण

डॉ अवनीश राही का त्रि-आयामी गीत–महाग्रंथ “मैं भूख हूँ” Golden Book of World Records में दर्ज

Digital Desk

"मैं भूख हूँ : एक युग-काव्य संहिता"

(रोटी से राष्ट्र तक की वेदना)

11 जुलाई को उनके जन्मदिवस के अवसर पर औपचारिक रूप से लोकार्पित होने जा रही है। लगभग 450 पृष्ठों में विस्तृत यह गीत–ग्रंथ समकालीन हिन्दी साहित्य में एक नए सांस्कृतिक और तकनीकी अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है, क्योंकि यह केवल पठनीय नहीं, बल्कि श्रवणीय और दर्शनीय स्वरूप में भी विकसित किया गया है।

जब कविता पृष्ठों से बाहर आ गई…

युग–काव्य–संहिता : मैं भूख हूँ” की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अभिनव साहित्यिक अवधारणा है। इस गीत–महाग्रंथ की प्रत्येक रचना के अंत में एक विशेष QR Code दिया गया है, जिसे स्कैन करते ही पाठक उस रचना को स्वयं कवि–कंठ में सुन और दृश्यात्मक रूप में अनुभव कर सकेगा। इस प्रकार यह कृति पारंपरिक पठन से आगे बढ़कर शब्द, स्वर और दृश्य के अद्वितीय समागम में रूपांतरित हो जाती है। यही नवाचारपूर्ण साहित्यिक संरचना इसे समकालीन हिन्दी साहित्य की अन्य कृतियों से विशिष्ट बनाती है। इसी अभिनव प्रस्तुति के कारण युग–काव्य–संहिता : मैं भूख हूँ” को Golden Book of World Records में दर्ज किया जा चुका है। इस बहुप्रतीक्षित गीत–ग्रंथ को हबहॉक्स नुवॉइस प्रकाशन प्रकाशित कर रहा है, जबकि इसका वैश्विक वितरण Penguin Random House कर रहा है। साहित्य–जगत में इसे हिन्दी के एक ऐसे प्रयोगधर्मी गीत–महाग्रंथ के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ कविता केवल पढ़ी नहीं जाती — बल्कि सुनी, देखी और भीतर अनुभव की जाती है।

भूख : रोटी से आगे मनुष्यत्व की खोज

डॉ॰ अवनीश राही की कविता में “भूख” केवल पेट की व्यथा नहीं है। वह न्याय की भूख है। सम्मान की भूख है। समता की भूख है। और सबसे बढ़कर — मनुष्यत्व को बचाए रखने की भूख है। यह गीत–ग्रंथ भूख को करुणा के निष्क्रिय प्रतीक की तरह प्रस्तुत नहीं करता; यह उसे प्रश्न, प्रतिरोध और सामाजिक पुनर्जागरण की युग–संवादिनी के रूप में स्थापित करता है। इस गीत–महाग्रंथ की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक यह है कि इसकी केंद्रीय नायिका — “भूख” — किसी स्थिर प्रतीक की तरह उपस्थित नहीं होती। वह प्रत्येक पृष्ठ पर नया रूप धारण करती है। कहीं वह माँ की आँखों में उतरती करुणा है, कहीं किसान की मिट्टी से उठता धैर्य, कहीं श्रमिक के पसीने की चमक, और कहीं सैनिक के रक्त का राष्ट्र–संकल्प। वह केवल रोटी की तलाश नहीं करती —वह मनुष्यत्व, सम्मान, न्याय और समता का अर्थ खोजती है। इसी कारण यह कृति केवल साहित्य नहीं, बल्कि मनुष्यत्व की पुनर्स्थापना का सांस्कृतिक दस्तावेज़ प्रतीत होती है।

31 अक्टूबर 1984 : विभीषिका की राख से जन्मा कवि

डॉ॰ राही की संवेदनात्मक यात्रा का प्रारम्भ उस दौर से जुड़ा है जब राष्ट्र स्वयं एक गहरे आघात से गुजर रहा था। 31 अक्टूबर 1984 — प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भय, शोक और अस्थिरता से भरा हुआ था। उसी विभीषिका के बीच एक बालक ने पहली बार शब्दों को करुणा में बदलते देखा। वही बालक आगे चलकर डॉ॰ अवनीश राही बना, जिसकी कविता आज वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय है। उनकी रचनाओं में पीड़ा केवल वर्णित नहीं होती —वह मनुष्य के भीतर उतरकर प्रश्न बन जाती है।

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महाकाव्य, समता और सामाजिक स्वाभिमान की यात्रा

चार दशकों से अधिक की साहित्य–साधना में डॉ॰ राही ने गीत, महाकाव्य, काव्य–संहिताएँ, सांस्कृतिक ग्रंथ और श्रव्य–दृश्य प्रस्तुतियों के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान निर्मित की है। उनके सह-लेखित कालजयी ग्रंथ भीम चरित मानस”, “बुद्ध ज्ञान महासागर” और “कांशीराम चरित मानस” भारतीय सामाजिक समता और स्वाभिमान की महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों में गिने जाते हैं। इन ग्रंथों का लोकार्पण राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की गरिमामय उपस्थिति में संपन्न हुआ था। साहित्य, संगीत और दृश्य–माध्यमों में उनके दीर्घ सृजनात्मक योगदान की स्वीकृति स्वरूप वे The Film & Screen Writers Association, Mumbai तथा IPRS, Mumbai के आजीवन सदस्य हैं।

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जब कविता जन–गान बन गई

डॉ॰ राही की रचनात्मक यात्रा केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रही। उनके सैकड़ों गीत देश की विभिन्न प्रतिष्ठित संगीत कंपनियों द्वारा ऑडियो, वीडियो, सीडी तथा डीवीडी स्वरूपों में जारी हो चुके हैं। उनके गीतों को भारतीय फिल्म–जगत के प्रतिष्ठित स्वर–साधकों — कुमार सानू, उदित नारायण, अलका याज्ञनिक, अनुराधा पौडवाल, अनूप जलोटा और रविन्द्र जैन — ने अपनी आवाज़ दी, जिससे उनकी कविता जन–गान का रूप ले सकी। उनकी म्यूज़िकल प्रस्तुतियाँ, फिल्में और काव्य–आधारित परियोजनाएँ साहित्य को मंच, संगीत और दृश्य–अनुभव से जोड़ने का कार्य करती रही हैं।

विश्व–पटल पर हिन्दी का अभिनव साहित्यिक प्रयोग

युग–काव्य–संहिता : मैं भूख हूँ” को भविष्य में एक भव्य cinematic audiobook और श्रव्य–महाग्रंथ के रूप में भी विकसित किए जाने की योजना है, जहाँ प्रत्येक अध्याय ध्वनि, संगीत और सूत्रधार–स्वर के माध्यम से जीवित अनुभव में रूपांतरित होगा। यदि यह प्रयोग अपने पूर्ण स्वरूप में सामने आता है, तो यह हिन्दी साहित्य में audiobook संस्कृति को एक बिल्कुल नया आयाम दे सकता है। यह सम्भवतः हिन्दी साहित्य का पहला ऐसा गीत–महाग्रंथ है, जहाँ कविता केवल पृष्ठों पर नहीं रहती —वह स्वर, दृश्य और अनुभूति में परिवर्तित हो जाती है।

सम्मान, साधना और युग–स्वीकृति

साहित्य और सामाजिक सरोकारों के क्षेत्र में डॉ॰ राही को राष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों और मानद अलंकरणों से विभूषित किया गया है, जिनमें “भारत विभूषण सम्मान” तथा मानद “विद्यावाचस्पति” उपाधि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ये सम्मान केवल उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि उस सतत साहित्य–साधना की स्वीकृतियाँ हैं जिसने शब्दों को संवेदना और कविता को सामाजिक सरोकार का स्वर बनाया।

अंतिम उद्घोष : जहाँ कविता पुनः मनुष्यत्व का स्वर बन जाती है

युग–काव्य–संहिता : मैं भूख हूँ” केवल एक गीत–ग्रंथ नहीं, बल्कि उस समय की सांस्कृतिक पुकार है जहाँ साहित्य पुनः मनुष्य के भीतर लौटना चाहता है।  यह काल–कृति कविता को पृष्ठों की सीमाओं से मुक्त कर स्वर, दृश्य और अनुभूति के विराट आयाम में रूपांतरित करती है। शायद इसी कारण यह गीत–महाग्रंथ आज केवल साहित्यिक चर्चा का विषय नहीं, बल्कि समकालीन हिन्दी साहित्य मेंएक नए युग की आहट के रूप में देखा जा रहा है।

https://www.dainikjagranmpcg.com/dr-avnish-rahis-three-dimensional-song-the-epic-%E2%80%9Ci-am-hungry%E2%80%9D-recorded/article-53147

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