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SIR बहस के साये में बंगाल का जनादेश
नई दिल्ली
हाल के वर्षों में शायद ही किसी चुनावी नतीजे ने उतनी राजनीतिक बहस और राष्ट्रीय आत्ममंथन को जन्म दिया हो, जितना पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत ने किया। लंबे समय तक बंगाल को भाजपा के लिए सबसे कठिन राजनीतिक जमीन माना जाता रहा। इसलिए यह जनादेश केवल सरकार बदलने भर की घटना नहीं थी, बल्कि राज्य की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत भी था।
चुनाव से पहले ही मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर माहौल गरम था। विपक्ष लगातार इस प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा था और इसे चुनावी निष्पक्षता से जोड़कर देख रहा था। नतीजों के बाद विपक्ष के कई नेताओं ने भाजपा की जीत को सीधे SIR से जोड़ने की कोशिश की और यह संदेश देने का प्रयास किया कि राजनीतिक लहर से ज्यादा प्रक्रियागत हस्तक्षेप ने जनादेश को प्रभावित किया।
लेकिन इन आरोपों के पीछे एक दूसरी राजनीतिक बेचैनी भी साफ दिखाई देती है — वह बेचैनी, जो भाजपा की उन इलाकों में बढ़ती स्वीकार्यता को लेकर है जिन्हें कभी उसके लिए वैचारिक रूप से असंभव माना जाता था। दरअसल, अगर पूरे विवाद को तथ्यों और व्यापक संदर्भ में देखा जाए, तो साफ होता है कि SIR कोई असाधारण या केवल बंगाल तक सीमित प्रक्रिया नहीं थी।
SIR कोई राजनीतिक प्रयोग नहीं, संवैधानिक प्रक्रिया थी
मतदाता सूची का पुनरीक्षण चुनाव आयोग की नियमित संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। इसका उद्देश्य डुप्लीकेट, मृत या अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाकर सूची को अद्यतन करना होता है। बिहार चुनावों के दौरान भी SIR को लेकर इसी तरह के सवाल उठे थे, लेकिन वहां भी अंततः भाजपा-नीत NDA सत्ता में लौटा।
यह दावा भी पूरी तरह टिकता नहीं दिखता कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया केवल विपक्ष शासित राज्यों को प्रभावित करने के लिए अपनाई गई थी। आंकड़े बताते हैं कि भाजपा शासित राज्यों में भी बड़े स्तर पर संशोधन हुए। गुजरात में मतदाता सूची में 13.39% की कमी दर्ज की गई, उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 13.23% रहा, जबकि पश्चिम बंगाल में यह 11.63% था। छत्तीसगढ़ में भी लगभग इसी स्तर का संशोधन हुआ।
अगर पूरी प्रक्रिया किसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा होती, तो भाजपा शासित राज्यों में इतने बड़े पैमाने पर संशोधन होना स्वाभाविक नहीं लगता। व्यापक तस्वीर यही बताती है कि यह एक राष्ट्रीय स्तर का प्रशासनिक अभ्यास था, जिसे सभी राज्यों में समान रूप से लागू किया गया।
चुनाव केवल गणित से नहीं जीते जाते
बंगाल के नतीजों को केवल वोटों के आंकड़ों और मतदाता सूची में हुए बदलाव तक सीमित कर देना भारतीय चुनावों की वास्तविक प्रकृति को नजरअंदाज करना होगा। भारत की फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली में वोट प्रतिशत का मामूली बदलाव भी सीटों में बड़ा उलटफेर कर सकता है।
बंगाल खुद इसका उदाहरण रहा है। 2006 से 2011 के बीच वाम मोर्चे का पतन भी धीरे-धीरे बनते राजनीतिक माहौल का परिणाम था। इस बार उत्तर बंगाल, जंगलमहल और प्रेसिडेंसी क्षेत्र में भाजपा का प्रदर्शन किसी एक मुद्दे का असर नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहे राजनीतिक विस्तार का संकेत था।
दिलचस्प बात यह है कि जिन सीटों पर सबसे ज्यादा मतदाता नाम हटाए गए, उनमें से बड़ी संख्या में सीटें तृणमूल कांग्रेस ने जीतीं। कई जगहों पर हटाए गए नाम जीत के अंतर से ज्यादा थे, फिर भी अलग-अलग सीटों पर भाजपा और TMC दोनों को जीत मिली। इससे यह धारणा कमजोर पड़ती है कि पूरी प्रक्रिया केवल एक पार्टी को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई गई थी।
संस्थाओं पर भरोसा परिणाम देखकर नहीं होना चाहिए
चुनावों के बाद भारतीय राजनीति में एक परिचित पैटर्न बार-बार देखने को मिलता है। जब भाजपा उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करती है, तब EVM, VVPAT, मतदाता सूची और अब SIR जैसे मुद्दों पर सवाल तेज हो जाते हैं। लेकिन जब विपक्ष कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश या तेलंगाना जैसे राज्यों में जीत दर्ज करता है, तब वही संस्थाएं अचानक स्वीकार्य लगने लगती हैं।
केरल में कांग्रेस-नीत UDF की वापसी भी इसी चुनावी व्यवस्था के तहत हुई, लेकिन वहां संस्थागत साजिश की वैसी बहस नहीं दिखी। यही विरोधाभास लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है। संस्थाओं की विश्वसनीयता का मूल्यांकन राजनीतिक सुविधा के आधार पर नहीं होना चाहिए।
यह भी महत्वपूर्ण है कि पश्चिम बंगाल में पूरी SIR प्रक्रिया न्यायिक निगरानी के तहत हुई। सुप्रीम कोर्ट और कलकत्ता हाई कोर्ट में कई याचिकाओं पर सुनवाई हुई और अंततः अदालतों ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया को जारी रखने की अनुमति दी।
बंगाल का जनादेश जमीन की हकीकत से भी जुड़ा था
बंगाल के नतीजों को केवल SIR के नजरिये से देखना राज्य में वर्षों से बढ़ रहे असंतोष को नजरअंदाज करना होगा। राजनीतिक हिंसा, चुनाव बाद प्रताड़ना, बेरोजगारी और शासन को लेकर थकान जैसी भावनाएं धीरे-धीरे लोगों के बीच मजबूत हो रही थीं।
संदेशखाली की घटनाओं और RG Kar मेडिकल कॉलेज रेप एवं हत्या मामले ने इस असंतोष को और गहरा कर दिया। खासकर महिलाओं और शहरी मतदाताओं के बीच यह धारणा मजबूत हुई कि जवाबदेही के सवाल पर राज्य सरकार का रवैया रक्षात्मक और संवेदनहीन रहा।
इसके अलावा अल्पसंख्यक तुष्टिकरण, राजनीतिक धमकी और विपक्षी कार्यकर्ताओं पर हमलों जैसे आरोपों ने पहले ही राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ा दिया था। ऐसे माहौल में भाजपा का उभार अचानक हुआ राजनीतिक चमत्कार नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहे सामाजिक और राजनीतिक बदलाव का परिणाम दिखा।
लोकतंत्र में आत्ममंथन जरूरी है, स्थायी संदेह नहीं
लोकतंत्र केवल तब तक विश्वसनीय नहीं माना जा सकता, जब तक परिणाम किसी राजनीतिक दल के पक्ष में आएं। हर हार को संस्थागत साजिश बताना अंततः लोकतांत्रिक संस्थाओं पर लोगों का भरोसा कमजोर करता है और राजनीतिक आत्ममंथन की गुंजाइश कम कर देता है।
बंगाल का जनादेश निश्चित रूप से कई स्थापित राजनीतिक धारणाओं को चुनौती देता है। लेकिन उसने भारतीय लोकतंत्र की एक पुरानी सच्चाई को फिर सामने रखा है — भारत का मतदाता अक्सर राजनीतिक दलों और विश्लेषकों की अपेक्षाओं से कहीं ज्यादा निर्णायक और अप्रत्याशित बदलाव लाने की क्षमता रखता है।
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SIR बहस के साये में बंगाल का जनादेश
नई दिल्ली
चुनाव से पहले ही मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर माहौल गरम था। विपक्ष लगातार इस प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा था और इसे चुनावी निष्पक्षता से जोड़कर देख रहा था। नतीजों के बाद विपक्ष के कई नेताओं ने भाजपा की जीत को सीधे SIR से जोड़ने की कोशिश की और यह संदेश देने का प्रयास किया कि राजनीतिक लहर से ज्यादा प्रक्रियागत हस्तक्षेप ने जनादेश को प्रभावित किया।
लेकिन इन आरोपों के पीछे एक दूसरी राजनीतिक बेचैनी भी साफ दिखाई देती है — वह बेचैनी, जो भाजपा की उन इलाकों में बढ़ती स्वीकार्यता को लेकर है जिन्हें कभी उसके लिए वैचारिक रूप से असंभव माना जाता था। दरअसल, अगर पूरे विवाद को तथ्यों और व्यापक संदर्भ में देखा जाए, तो साफ होता है कि SIR कोई असाधारण या केवल बंगाल तक सीमित प्रक्रिया नहीं थी।
SIR कोई राजनीतिक प्रयोग नहीं, संवैधानिक प्रक्रिया थी
मतदाता सूची का पुनरीक्षण चुनाव आयोग की नियमित संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। इसका उद्देश्य डुप्लीकेट, मृत या अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाकर सूची को अद्यतन करना होता है। बिहार चुनावों के दौरान भी SIR को लेकर इसी तरह के सवाल उठे थे, लेकिन वहां भी अंततः भाजपा-नीत NDA सत्ता में लौटा।
यह दावा भी पूरी तरह टिकता नहीं दिखता कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया केवल विपक्ष शासित राज्यों को प्रभावित करने के लिए अपनाई गई थी। आंकड़े बताते हैं कि भाजपा शासित राज्यों में भी बड़े स्तर पर संशोधन हुए। गुजरात में मतदाता सूची में 13.39% की कमी दर्ज की गई, उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 13.23% रहा, जबकि पश्चिम बंगाल में यह 11.63% था। छत्तीसगढ़ में भी लगभग इसी स्तर का संशोधन हुआ।
अगर पूरी प्रक्रिया किसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा होती, तो भाजपा शासित राज्यों में इतने बड़े पैमाने पर संशोधन होना स्वाभाविक नहीं लगता। व्यापक तस्वीर यही बताती है कि यह एक राष्ट्रीय स्तर का प्रशासनिक अभ्यास था, जिसे सभी राज्यों में समान रूप से लागू किया गया।
चुनाव केवल गणित से नहीं जीते जाते
बंगाल के नतीजों को केवल वोटों के आंकड़ों और मतदाता सूची में हुए बदलाव तक सीमित कर देना भारतीय चुनावों की वास्तविक प्रकृति को नजरअंदाज करना होगा। भारत की फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली में वोट प्रतिशत का मामूली बदलाव भी सीटों में बड़ा उलटफेर कर सकता है।
बंगाल खुद इसका उदाहरण रहा है। 2006 से 2011 के बीच वाम मोर्चे का पतन भी धीरे-धीरे बनते राजनीतिक माहौल का परिणाम था। इस बार उत्तर बंगाल, जंगलमहल और प्रेसिडेंसी क्षेत्र में भाजपा का प्रदर्शन किसी एक मुद्दे का असर नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहे राजनीतिक विस्तार का संकेत था।
दिलचस्प बात यह है कि जिन सीटों पर सबसे ज्यादा मतदाता नाम हटाए गए, उनमें से बड़ी संख्या में सीटें तृणमूल कांग्रेस ने जीतीं। कई जगहों पर हटाए गए नाम जीत के अंतर से ज्यादा थे, फिर भी अलग-अलग सीटों पर भाजपा और TMC दोनों को जीत मिली। इससे यह धारणा कमजोर पड़ती है कि पूरी प्रक्रिया केवल एक पार्टी को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई गई थी।
संस्थाओं पर भरोसा परिणाम देखकर नहीं होना चाहिए
चुनावों के बाद भारतीय राजनीति में एक परिचित पैटर्न बार-बार देखने को मिलता है। जब भाजपा उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करती है, तब EVM, VVPAT, मतदाता सूची और अब SIR जैसे मुद्दों पर सवाल तेज हो जाते हैं। लेकिन जब विपक्ष कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश या तेलंगाना जैसे राज्यों में जीत दर्ज करता है, तब वही संस्थाएं अचानक स्वीकार्य लगने लगती हैं।
केरल में कांग्रेस-नीत UDF की वापसी भी इसी चुनावी व्यवस्था के तहत हुई, लेकिन वहां संस्थागत साजिश की वैसी बहस नहीं दिखी। यही विरोधाभास लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है। संस्थाओं की विश्वसनीयता का मूल्यांकन राजनीतिक सुविधा के आधार पर नहीं होना चाहिए।
यह भी महत्वपूर्ण है कि पश्चिम बंगाल में पूरी SIR प्रक्रिया न्यायिक निगरानी के तहत हुई। सुप्रीम कोर्ट और कलकत्ता हाई कोर्ट में कई याचिकाओं पर सुनवाई हुई और अंततः अदालतों ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया को जारी रखने की अनुमति दी।
बंगाल का जनादेश जमीन की हकीकत से भी जुड़ा था
बंगाल के नतीजों को केवल SIR के नजरिये से देखना राज्य में वर्षों से बढ़ रहे असंतोष को नजरअंदाज करना होगा। राजनीतिक हिंसा, चुनाव बाद प्रताड़ना, बेरोजगारी और शासन को लेकर थकान जैसी भावनाएं धीरे-धीरे लोगों के बीच मजबूत हो रही थीं।
संदेशखाली की घटनाओं और RG Kar मेडिकल कॉलेज रेप एवं हत्या मामले ने इस असंतोष को और गहरा कर दिया। खासकर महिलाओं और शहरी मतदाताओं के बीच यह धारणा मजबूत हुई कि जवाबदेही के सवाल पर राज्य सरकार का रवैया रक्षात्मक और संवेदनहीन रहा।
इसके अलावा अल्पसंख्यक तुष्टिकरण, राजनीतिक धमकी और विपक्षी कार्यकर्ताओं पर हमलों जैसे आरोपों ने पहले ही राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ा दिया था। ऐसे माहौल में भाजपा का उभार अचानक हुआ राजनीतिक चमत्कार नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहे सामाजिक और राजनीतिक बदलाव का परिणाम दिखा।
लोकतंत्र में आत्ममंथन जरूरी है, स्थायी संदेह नहीं
लोकतंत्र केवल तब तक विश्वसनीय नहीं माना जा सकता, जब तक परिणाम किसी राजनीतिक दल के पक्ष में आएं। हर हार को संस्थागत साजिश बताना अंततः लोकतांत्रिक संस्थाओं पर लोगों का भरोसा कमजोर करता है और राजनीतिक आत्ममंथन की गुंजाइश कम कर देता है।
बंगाल का जनादेश निश्चित रूप से कई स्थापित राजनीतिक धारणाओं को चुनौती देता है। लेकिन उसने भारतीय लोकतंत्र की एक पुरानी सच्चाई को फिर सामने रखा है — भारत का मतदाता अक्सर राजनीतिक दलों और विश्लेषकों की अपेक्षाओं से कहीं ज्यादा निर्णायक और अप्रत्याशित बदलाव लाने की क्षमता रखता है।
