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केरल में ढहा लेफ्ट का आखिरी किला, आजादी के बाद पहली बार पूरे देश से वामपंथ का सूपड़ा साफ
नेशनल डेस्क
केरल विधानसभा चुनाव के रुझानों में कांग्रेस नेतृत्व वाला यूडीएफ बहुमत की ओर है। केरल में वामपंथ की सरकार गिरते ही पूरे देश से लेफ्ट का शासन समाप्त हो जाएगा।
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसा मोड़ आता दिख रहा है जिसने दशकों पुरानी राजनीतिक परंपराओं को झकझोर दिया है। केरल विधानसभा चुनाव की मतगणना के जो प्रारंभिक रुझान सामने आए हैं, वे वामपंथी खेमे के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं। राज्य की जनता ने इस बार सत्ता परिवर्तन की ओर कदम बढ़ाते हुए कांग्रेस समर्थित यूडीएफ को बड़ी बढ़त दिलाई है। शुरुआती आंकड़ों में यूडीएफ 90 से अधिक सीटों पर अपनी पकड़ बनाए हुए है, जबकि एलडीएफ का आंकड़ा 40 के आसपास सिमटता दिख रहा है। भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए भी कुछ सीटों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में सफल होता दिख रहा है।
इस चुनाव की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मुख्यमंत्री पिनराई विजयन खुद अपनी पारंपरिक सीट धर्मदम से पीछे चल रहे हैं। विजयन के अलावा उनके मंत्रिमंडल के लगभग एक दर्जन मंत्री अपनी-अपनी सीटों पर संघर्ष करते नजर आ रहे हैं। वीना जॉर्ज, एम बी राजेश और वी शिवनकुट्टी जैसे कद्दावर नेताओं का पिछड़ना यह संकेत देता है कि राज्य में वामपंथ के प्रति जनता का मोहभंग हुआ है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख सनी जोसेफ ने इन रुझानों को राज्य की जनता की आवाज बताया है और भरोसा जताया है कि उनकी गठबंधन सरकार 100 से अधिक सीटों के साथ शानदार वापसी करेगी।
केरल के ये रुझान केवल एक राज्य के चुनाव परिणाम नहीं हैं, बल्कि यह वामपंथी राजनीति के अस्तित्व से जुड़ी खबर है। आजादी के बाद से ही भारतीय राजनीति में लेफ्ट का अपना एक विशेष स्थान रहा है। हालांकि, वक्त के साथ इनका दायरा सिमटता गया। साल 2011 में पश्चिम बंगाल में 34 साल पुराने शासन का अंत हुआ और 2018 में त्रिपुरा भी इनके हाथ से निकल गया। केरल अब तक इनका एकमात्र मजबूत गढ़ बना हुआ था, लेकिन वर्तमान स्थिति बताती है कि अब वहां भी बदलाव की बयार बह चुकी है। यदि केरल से भी लेफ्ट की विदाई होती है, तो यह स्वतंत्र भारत में पहली बार होगा कि किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं होगी।
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केरल में ढहा लेफ्ट का आखिरी किला, आजादी के बाद पहली बार पूरे देश से वामपंथ का सूपड़ा साफ
नेशनल डेस्क
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसा मोड़ आता दिख रहा है जिसने दशकों पुरानी राजनीतिक परंपराओं को झकझोर दिया है। केरल विधानसभा चुनाव की मतगणना के जो प्रारंभिक रुझान सामने आए हैं, वे वामपंथी खेमे के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं। राज्य की जनता ने इस बार सत्ता परिवर्तन की ओर कदम बढ़ाते हुए कांग्रेस समर्थित यूडीएफ को बड़ी बढ़त दिलाई है। शुरुआती आंकड़ों में यूडीएफ 90 से अधिक सीटों पर अपनी पकड़ बनाए हुए है, जबकि एलडीएफ का आंकड़ा 40 के आसपास सिमटता दिख रहा है। भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए भी कुछ सीटों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में सफल होता दिख रहा है।
इस चुनाव की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मुख्यमंत्री पिनराई विजयन खुद अपनी पारंपरिक सीट धर्मदम से पीछे चल रहे हैं। विजयन के अलावा उनके मंत्रिमंडल के लगभग एक दर्जन मंत्री अपनी-अपनी सीटों पर संघर्ष करते नजर आ रहे हैं। वीना जॉर्ज, एम बी राजेश और वी शिवनकुट्टी जैसे कद्दावर नेताओं का पिछड़ना यह संकेत देता है कि राज्य में वामपंथ के प्रति जनता का मोहभंग हुआ है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख सनी जोसेफ ने इन रुझानों को राज्य की जनता की आवाज बताया है और भरोसा जताया है कि उनकी गठबंधन सरकार 100 से अधिक सीटों के साथ शानदार वापसी करेगी।
केरल के ये रुझान केवल एक राज्य के चुनाव परिणाम नहीं हैं, बल्कि यह वामपंथी राजनीति के अस्तित्व से जुड़ी खबर है। आजादी के बाद से ही भारतीय राजनीति में लेफ्ट का अपना एक विशेष स्थान रहा है। हालांकि, वक्त के साथ इनका दायरा सिमटता गया। साल 2011 में पश्चिम बंगाल में 34 साल पुराने शासन का अंत हुआ और 2018 में त्रिपुरा भी इनके हाथ से निकल गया। केरल अब तक इनका एकमात्र मजबूत गढ़ बना हुआ था, लेकिन वर्तमान स्थिति बताती है कि अब वहां भी बदलाव की बयार बह चुकी है। यदि केरल से भी लेफ्ट की विदाई होती है, तो यह स्वतंत्र भारत में पहली बार होगा कि किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं होगी।
