हिंदी : हमारी भाषा, हमारी पहचान – हिंदी दिवस पर विशेष लेख

opinion डॉ. पूजा सक्सेना

आज 14 सितंबर 2025 को पूरे भारतवर्ष में ही नहीं, बल्कि विदेशों में बसे भारतीय और हिंदी प्रेमी भी हिंदी दिवस बड़े हर्षोल्लास के साथ मना रहे हैं।

देश-विदेश में हिंदी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने हेतु विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम, गोष्ठियाँ, सेमिनार और वर्कशॉप आयोजित की जा रही हैं। हिंदी दिवस का यह पर्व न केवल भाषा के महत्व को उजागर करता है, बल्कि इसे वैश्विक स्तर पर स्थापित करने का एक प्रेरक कदम भी है।

हम सभी जानते हैं कि भारत की संविधान सभा ने 14 सितम्बर 1949 को हिंदी को संघ की राजभाषा का दर्जा दिया था। तब से प्रत्येक वर्ष यह दिन हिंदी प्रेमियों के लिए विशेष उत्सव का रूप ले चुका है। इस अवसर का उद्देश्य केवल हिंदी का महत्त्व समझाना नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में इसे एक प्रभावशाली भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना है।

डॉ. पूजा सक्सेना, छत्रपति संभाजीनगर से, कहती हैं –
"रस बन के बरस जाए हिंदी भाषा तो भीनी है।"

हिंदी दिवस का उद्देश्य स्पष्ट है –
 हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना
 हिंदी के प्रति अनुराग और सम्मान बढ़ाना
 समाज में हिंदी के उपयोग को प्रोत्साहित करना
 हिंदी को डिजिटल व तकनीकी क्षेत्र में भी सशक्त बनाना

हालांकि संविधान लागू हुए अब 78 वर्ष हो चुके हैं, फिर भी हिंदी को सरकारी कामकाज में व्यापक स्थान नहीं मिल पाया है। निजी क्षेत्र और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में हिंदी का उपयोग अभी सीमित है, परंतु अमेरिका, रूस, जापान, मॉरीशस जैसे देशों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। कई विश्वविद्यालय इसे अपनी पढ़ाई का अनिवार्य हिस्सा बना चुके हैं।

आजकल सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हिंदी की लोकप्रियता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। यह दर्शाता है कि हिंदी केवल एक मातृभाषा नहीं, बल्कि संवाद की माध्यम बनती जा रही है।

हिंदी के प्रति इस समर्पण भाव को व्यक्त करते हुए प्रसिद्ध कवि डॉ. ओम शांति जी की यह पंक्तियाँ याद आती हैं—

"हिंदी भाषा को कबीरों ने प्राणों से अपने सींचा,
तुलसी ने लोकाचार की माधुरी से सींचा।
भाषा न अमीरों की, भाषा न गरीबों की,
जो सबके साथ बिनती, हिंदी भाषा तो बस भीनी है।"

आज का समय यही सिखाता है कि हिंदी को केवल हिंदी दिवस तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपनी रोज़मर्रा की जीवनशैली में अपनाएँ। हिंदी हमारी अस्मिता है, हमारी विरासत है और इसी में हमारी सांस्कृतिक पहचान निहित है।

चलिए, इस हिंदी दिवस पर हम संकल्प लें कि हिंदी को जीवन की भाषा बनाएंगे।

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14 Sep 2025 By दैनिक जागरण

हिंदी : हमारी भाषा, हमारी पहचान – हिंदी दिवस पर विशेष लेख

opinion डॉ. पूजा सक्सेना

देश-विदेश में हिंदी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने हेतु विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम, गोष्ठियाँ, सेमिनार और वर्कशॉप आयोजित की जा रही हैं। हिंदी दिवस का यह पर्व न केवल भाषा के महत्व को उजागर करता है, बल्कि इसे वैश्विक स्तर पर स्थापित करने का एक प्रेरक कदम भी है।

हम सभी जानते हैं कि भारत की संविधान सभा ने 14 सितम्बर 1949 को हिंदी को संघ की राजभाषा का दर्जा दिया था। तब से प्रत्येक वर्ष यह दिन हिंदी प्रेमियों के लिए विशेष उत्सव का रूप ले चुका है। इस अवसर का उद्देश्य केवल हिंदी का महत्त्व समझाना नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में इसे एक प्रभावशाली भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना है।

डॉ. पूजा सक्सेना, छत्रपति संभाजीनगर से, कहती हैं –
"रस बन के बरस जाए हिंदी भाषा तो भीनी है।"

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 हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना
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 समाज में हिंदी के उपयोग को प्रोत्साहित करना
 हिंदी को डिजिटल व तकनीकी क्षेत्र में भी सशक्त बनाना

हालांकि संविधान लागू हुए अब 78 वर्ष हो चुके हैं, फिर भी हिंदी को सरकारी कामकाज में व्यापक स्थान नहीं मिल पाया है। निजी क्षेत्र और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में हिंदी का उपयोग अभी सीमित है, परंतु अमेरिका, रूस, जापान, मॉरीशस जैसे देशों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। कई विश्वविद्यालय इसे अपनी पढ़ाई का अनिवार्य हिस्सा बना चुके हैं।

आजकल सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हिंदी की लोकप्रियता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। यह दर्शाता है कि हिंदी केवल एक मातृभाषा नहीं, बल्कि संवाद की माध्यम बनती जा रही है।

हिंदी के प्रति इस समर्पण भाव को व्यक्त करते हुए प्रसिद्ध कवि डॉ. ओम शांति जी की यह पंक्तियाँ याद आती हैं—

"हिंदी भाषा को कबीरों ने प्राणों से अपने सींचा,
तुलसी ने लोकाचार की माधुरी से सींचा।
भाषा न अमीरों की, भाषा न गरीबों की,
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आज का समय यही सिखाता है कि हिंदी को केवल हिंदी दिवस तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपनी रोज़मर्रा की जीवनशैली में अपनाएँ। हिंदी हमारी अस्मिता है, हमारी विरासत है और इसी में हमारी सांस्कृतिक पहचान निहित है।

चलिए, इस हिंदी दिवस पर हम संकल्प लें कि हिंदी को जीवन की भाषा बनाएंगे।

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