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“बौद्ध धरोहर संरक्षण को राष्ट्रीय मिशन बनना चाहिए”: अमिताभ कांत
नई दिल्ली।
ग्रामीण बौद्ध धरोहर संरक्षण पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन देश–दुनिया के विद्वानों, पुरातत्व विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं ने भारत की बौद्ध विरासत को एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में संरक्षित किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। इंडियन ट्रस्ट फॉर रूरल हेरिटेज एंड डेवलपमेंट (ITRHD) द्वारा आयोजित यह सम्मेलन डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में संपन्न हुआ।
बौद्ध विरासत संरक्षण: भारत की नैतिक जिम्मेदारी
सम्मेलन के प्रमुख सत्र में नीति आयोग के पूर्व चेयरमैन डॉ. अमिताभ कांत ने बदलते वैश्विक परिदृश्य, संघर्ष और अनिश्चितता के बीच बौद्ध शिक्षाओं की वैश्विक प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि—
“भारत, बौद्ध सभ्यता का मूल केन्द्र होने के नाते, अपनी ग्रामीण और प्राचीन धरोहर के भौतिक–आध्यात्मिक दोनों आयामों के संरक्षण की नैतिक जिम्मेदारी निभाए। संरक्षण को राष्ट्रीय मिशन बनाया जाना चाहिए।”
उन्होंने यह भी कहा कि भारत को ऐसा बौद्ध पर्यटन मॉडल विकसित करना चाहिए, जो सिर्फ खपत या व्यावसायिकता पर आधारित न हो, बल्कि ज्ञान, शोध, चिंतन और समुदाय हित को प्राथमिकता दे।
दस्तावेज़ीकरण और क्षमता निर्माण की आवश्यकता
“बौद्ध वास्तुकला, संस्कृति और संरक्षण” पर आयोजित महत्वपूर्ण सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो. डॉ. अमरेश्वर गल्ला ने कहा कि भारत तब तक अपनी धरोहर सुरक्षित नहीं रख सकता, जब तक वह उसे वैज्ञानिक और ऐतिहासिक तरीके से समझ नहीं लेता।
उन्होंने बताया कि—
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देश में अब भी हजारों ग्रामीण बौद्ध स्थल बिना दस्तावेज़ीकरण के हैं।
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कई संस्थानों में कानूनी ज्ञान, संरक्षण क्षमता और प्रशिक्षण का अभाव है।
उन्होंने मानचित्रण, डिजिटल दस्तावेज़ीकरण और समुदाय-आधारित संरक्षण में तत्काल निवेश की आवश्यकता जताई, साथ ही विश्वविद्यालयों में अंतरराष्ट्रीय धरोहर कानून और भारत-केंद्रित अध्ययन को मजबूत करने की सलाह दी।
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“धरोहर संरक्षण के ऑस्कर” का प्रस्ताव
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के डॉ. प्रजापति त्रिवेदी ने संरक्षण-उन्मुख देशों—जैसे थाईलैंड, श्रीलंका, नेपाल आदि—से सीखने पर जोर दिया। उन्होंने अगले वर्ष सम्मेलन में
— “धरोहर संरक्षण के ऑस्कर”
के रूप में एक अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी आयोजित करने का प्रस्ताव रखा, जिसमें—
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मापनीय मानक
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जीवंत धरोहर की सुरक्षा
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संस्थागत ढांचे को मजबूत करने जैसे विषय शामिल होंगे।
नगर्जुनकोण्डा में राष्ट्रीय ग्रामीण धरोहर अकादमी
सम्मेलन के प्रमुख आकर्षणों में राष्ट्रीय ग्रामीण धरोहर संरक्षण एवं विकास प्रशिक्षण अकादमी पर हुई विस्तृत चर्चा शामिल रही।
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यह अकादमी आंध्र प्रदेश के नगर्जुनकोण्डा में पाँच एकड़ भूमि पर स्थापित की जाएगी।
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इसका उद्देश्य ग्रामीण बौद्ध धरोहर की सुरक्षा, कौशल विकास, आधुनिक अनुसंधान और समुदाय-आधारित संरक्षण मॉडल को बढ़ावा देना है।
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पहली बार, किसी राष्ट्रीय संस्थान का मुख्य लक्ष्य ग्रामीण समुदायों को धरोहर-आधारित आर्थिक अवसरों से जोड़ना होगा।
ITRHD का उद्देश्य: संरक्षण से विकास की ओर
ITRHD ने स्पष्ट किया कि ग्रामीण धरोहर संरक्षण केवल सांस्कृतिक दायित्व नहीं है, बल्कि—
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सतत विकास
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स्थानीय अर्थव्यवस्था
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समुदाय सशक्तिकरण
का महत्वपूर्ण मार्ग भी है।
भारत की ग्रामीण धरोहर में प्राचीन स्मारक, कृषि परंपराएं, शिल्प, जल संस्कृति, भाषाएं, प्रदर्शन कला, औषधीय ज्ञान आदि शामिल हैं, जिन्हें संरक्षित करना राष्ट्रीय हित से जुड़ा मुद्दा है।
आगे की राह
सम्मेलन के दूसरे दिन हुई चर्चाओं ने बौद्ध धरोहर संरक्षण और प्रस्तावित राष्ट्रीय अकादमी की दिशा को और स्पष्ट किया।
अंतिम दिन—
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सिफारिशों का संकलन,
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व्यावहारिक रणनीतियों की रूपरेखा
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और बौद्ध धरोहर संरक्षण में भारत की वैश्विक नेतृत्व क्षमता को मजबूत करने पर फोकस रहेगा।
