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सोमनाथ आक्रमण के 1000 वर्ष: पीएम मोदी बोले—सोमनाथ विध्वंस की नहीं, भारतीय स्वाभिमान की जीवित गाथा
नेशनल न्यूज
प्रधानमंत्री ने ब्लॉग में कहा—मिटाने की सोच रखने वाले इतिहास में खो गए, आस्था और संस्कृति आज भी अडिग
सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण के एक हजार वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को एक विस्तृत लेख के माध्यम से इसे भारत की सभ्यतागत चेतना और आत्मसम्मान का प्रतीक बताया। प्रधानमंत्री ने कहा कि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की आस्था, संघर्ष और पुनर्जागरण की निरंतर यात्रा का प्रमाण है।
प्रधानमंत्री का यह लेख ऐसे समय सामने आया है, जब जनवरी 1026 में हुए पहले आक्रमण के एक सहस्राब्दी वर्ष पूरे हो रहे हैं। उन्होंने इस अवसर को “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व” के रूप में रेखांकित किया।
क्या कहा प्रधानमंत्री ने
पीएम मोदी ने लिखा कि सोमनाथ का इतिहास विनाश की कहानी नहीं, बल्कि हर बार टूटकर फिर खड़े होने की भारतीय परंपरा का उदाहरण है। उन्होंने कहा कि जो शक्तियां आस्था और संस्कृति को मिटाने आईं, वे समय के साथ समाप्त हो गईं, लेकिन सोमनाथ आज भी अडिग खड़ा है।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि सोमनाथ का नाम भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले आता है और यह मंदिर सदियों से आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना का केंद्र रहा है।
जनवरी 1026 में गजनी के शासक महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण कर उसे ध्वस्त किया था। इसके बाद अलग-अलग कालखंडों में कुल 17 बार इस मंदिर पर हमले हुए। बावजूद इसके, हर युग में समाज ने इसे फिर से खड़ा किया। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 11 मई 1951 को पूर्ण हुआ।
पुनर्निर्माण और राष्ट्रीय भूमिका
प्रधानमंत्री ने लेख में सरदार वल्लभभाई पटेल, के.एम. मुंशी और डॉ. राजेंद्र प्रसाद की भूमिका का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि आज़ादी के बाद मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प सरदार पटेल ने लिया था, जिसे 1951 में साकार किया गया।
प्रधानमंत्री ने यह भी उल्लेख किया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस आयोजन को लेकर आशंकित थे, लेकिन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसमें भाग लेकर एक ऐतिहासिक संदेश दिया।
सभ्यता और वर्तमान संदर्भ
पीएम मोदी ने कहा कि सोमनाथ यह संदेश देता है कि सभ्यताएं हथियारों से नहीं, आस्था और चेतना से जीवित रहती हैं। उन्होंने इसे आज के भारत के लिए प्रेरणा बताते हुए कहा कि यदि देश अपनी जड़ों से जुड़ा रहे, तो वह भविष्य को भी मजबूती से गढ़ सकता है।
प्रधानमंत्री ने लेख के अंत में विकसित भारत के संकल्प से सोमनाथ की भावना को जोड़ा और कहा कि भारत की सांस्कृतिक विरासत वैश्विक कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
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सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण के एक हजार वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को एक विस्तृत लेख के माध्यम से इसे भारत की सभ्यतागत चेतना और आत्मसम्मान का प्रतीक बताया। प्रधानमंत्री ने कहा कि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की आस्था, संघर्ष और पुनर्जागरण की निरंतर यात्रा का प्रमाण है।
प्रधानमंत्री का यह लेख ऐसे समय सामने आया है, जब जनवरी 1026 में हुए पहले आक्रमण के एक सहस्राब्दी वर्ष पूरे हो रहे हैं। उन्होंने इस अवसर को “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व” के रूप में रेखांकित किया।
क्या कहा प्रधानमंत्री ने
पीएम मोदी ने लिखा कि सोमनाथ का इतिहास विनाश की कहानी नहीं, बल्कि हर बार टूटकर फिर खड़े होने की भारतीय परंपरा का उदाहरण है। उन्होंने कहा कि जो शक्तियां आस्था और संस्कृति को मिटाने आईं, वे समय के साथ समाप्त हो गईं, लेकिन सोमनाथ आज भी अडिग खड़ा है।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि सोमनाथ का नाम भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले आता है और यह मंदिर सदियों से आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना का केंद्र रहा है।
जनवरी 1026 में गजनी के शासक महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण कर उसे ध्वस्त किया था। इसके बाद अलग-अलग कालखंडों में कुल 17 बार इस मंदिर पर हमले हुए। बावजूद इसके, हर युग में समाज ने इसे फिर से खड़ा किया। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 11 मई 1951 को पूर्ण हुआ।
पुनर्निर्माण और राष्ट्रीय भूमिका
प्रधानमंत्री ने लेख में सरदार वल्लभभाई पटेल, के.एम. मुंशी और डॉ. राजेंद्र प्रसाद की भूमिका का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि आज़ादी के बाद मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प सरदार पटेल ने लिया था, जिसे 1951 में साकार किया गया।
प्रधानमंत्री ने यह भी उल्लेख किया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस आयोजन को लेकर आशंकित थे, लेकिन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसमें भाग लेकर एक ऐतिहासिक संदेश दिया।
सभ्यता और वर्तमान संदर्भ
पीएम मोदी ने कहा कि सोमनाथ यह संदेश देता है कि सभ्यताएं हथियारों से नहीं, आस्था और चेतना से जीवित रहती हैं। उन्होंने इसे आज के भारत के लिए प्रेरणा बताते हुए कहा कि यदि देश अपनी जड़ों से जुड़ा रहे, तो वह भविष्य को भी मजबूती से गढ़ सकता है।
प्रधानमंत्री ने लेख के अंत में विकसित भारत के संकल्प से सोमनाथ की भावना को जोड़ा और कहा कि भारत की सांस्कृतिक विरासत वैश्विक कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
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