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रूस से तेल आयात घटने पर ट्रम्प का दावा: बोले—मोदी ने मेरी नाराज़गी समझी, इसलिए फैसला बदला
अंतराष्ट्रीय न्यूज
अमेरिकी राष्ट्रपति ने टैरिफ और व्यापार का जिक्र किया, भारत-अमेरिका ऊर्जा और व्यापार संबंधों में नया मोड़
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल के आयात में कमी लाने को लेकर बड़ा बयान दिया है। ट्रम्प ने कहा कि यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें “खुश करने” के उद्देश्य से लिया, क्योंकि वे भारत के रूसी तेल आयात को लेकर असंतुष्ट थे। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ और व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है।
रविवार देर रात पत्रकारों से बातचीत में ट्रम्प ने कहा कि भारत जानता था कि अमेरिका इस मुद्दे पर नाराज़ है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्ते मजबूत हैं, लेकिन टैरिफ जैसे कदम हमेशा एक विकल्प बने रहते हैं।
यूक्रेन युद्ध और तेल राजनीति
यूक्रेन युद्ध के बाद भारत रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने वाले देशों में सबसे आगे रहा। पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका, ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि रूसी तेल की खरीद अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध को आर्थिक समर्थन देती है। इसी आधार पर ट्रम्प प्रशासन ने भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया था, जिससे कुल टैरिफ बोझ 50 प्रतिशत तक पहुंच गया।
आयात में गिरावट के संकेत
हालिया अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, भारत ने चार साल बाद पहली बार रूस से कच्चे तेल की खरीद में उल्लेखनीय कटौती की है। नवंबर की तुलना में दिसंबर में आयात में तेज गिरावट दर्ज की गई और आने वाले महीनों में इसके और कम होने की संभावना जताई जा रही है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद रूसी तेल कंपनियों से आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिसका असर भारतीय रिफाइनरियों पर भी पड़ा।
कीमत और रणनीति में बदलाव
यूक्रेन युद्ध की शुरुआत में रूस ने भारी छूट पर तेल बेचा था, जिससे भारत को आर्थिक लाभ मिला। हालांकि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होने और रूसी छूट घटने के बाद यह सौदा पहले जितना फायदेमंद नहीं रहा। इसके साथ ही शिपिंग, बीमा और भुगतान से जुड़ी जटिलताओं ने भी भारत को वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया।
अब भारत सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका जैसे देशों से तेल खरीद बढ़ा रहा है, जिन्हें अधिक स्थिर और भरोसेमंद माना जाता है।
टैरिफ और कूटनीतिक प्रयास
अमेरिकी सांसदों के अनुसार, भारतीय पक्ष ने हाल के हफ्तों में टैरिफ कम करने की अपील तेज की है। भारत चाहता है कि कुल टैरिफ बोझ घटे और रूसी तेल से जुड़ी अतिरिक्त पेनाल्टी हटाई जाए। दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार वार्ता को इस दिशा में अहम माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह कदम केवल अमेरिकी दबाव का परिणाम नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक ऊर्जा बाजार और व्यावसायिक गणनाओं से भी जुड़ा है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या इस फैसले से भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में ठोस राहत मिलती है या नहीं।
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल के आयात में कमी लाने को लेकर बड़ा बयान दिया है। ट्रम्प ने कहा कि यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें “खुश करने” के उद्देश्य से लिया, क्योंकि वे भारत के रूसी तेल आयात को लेकर असंतुष्ट थे। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ और व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है।
रविवार देर रात पत्रकारों से बातचीत में ट्रम्प ने कहा कि भारत जानता था कि अमेरिका इस मुद्दे पर नाराज़ है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्ते मजबूत हैं, लेकिन टैरिफ जैसे कदम हमेशा एक विकल्प बने रहते हैं।
यूक्रेन युद्ध और तेल राजनीति
यूक्रेन युद्ध के बाद भारत रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने वाले देशों में सबसे आगे रहा। पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका, ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि रूसी तेल की खरीद अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध को आर्थिक समर्थन देती है। इसी आधार पर ट्रम्प प्रशासन ने भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया था, जिससे कुल टैरिफ बोझ 50 प्रतिशत तक पहुंच गया।
आयात में गिरावट के संकेत
हालिया अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, भारत ने चार साल बाद पहली बार रूस से कच्चे तेल की खरीद में उल्लेखनीय कटौती की है। नवंबर की तुलना में दिसंबर में आयात में तेज गिरावट दर्ज की गई और आने वाले महीनों में इसके और कम होने की संभावना जताई जा रही है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद रूसी तेल कंपनियों से आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिसका असर भारतीय रिफाइनरियों पर भी पड़ा।
कीमत और रणनीति में बदलाव
यूक्रेन युद्ध की शुरुआत में रूस ने भारी छूट पर तेल बेचा था, जिससे भारत को आर्थिक लाभ मिला। हालांकि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होने और रूसी छूट घटने के बाद यह सौदा पहले जितना फायदेमंद नहीं रहा। इसके साथ ही शिपिंग, बीमा और भुगतान से जुड़ी जटिलताओं ने भी भारत को वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया।
अब भारत सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका जैसे देशों से तेल खरीद बढ़ा रहा है, जिन्हें अधिक स्थिर और भरोसेमंद माना जाता है।
टैरिफ और कूटनीतिक प्रयास
अमेरिकी सांसदों के अनुसार, भारतीय पक्ष ने हाल के हफ्तों में टैरिफ कम करने की अपील तेज की है। भारत चाहता है कि कुल टैरिफ बोझ घटे और रूसी तेल से जुड़ी अतिरिक्त पेनाल्टी हटाई जाए। दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार वार्ता को इस दिशा में अहम माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह कदम केवल अमेरिकी दबाव का परिणाम नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक ऊर्जा बाजार और व्यावसायिक गणनाओं से भी जुड़ा है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या इस फैसले से भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में ठोस राहत मिलती है या नहीं।
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