महिला आरक्षण संशोधन बिल लोकसभा में पेश: विपक्ष का हंगामा, अखिलेश-शाह में तीखी बहस, मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण पर गरमाई राजनीति

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तीन संविधान संशोधन बिलों पर संसद में जोरदार बहस, सीट बढ़ोतरी और परिसीमन प्रस्ताव पर राज्यों की हिस्सेदारी को लेकर बढ़ा विवाद

लोकसभा में गुरुवार को महिला आरक्षण से जुड़े तीन संविधान संशोधन बिल पेश किए जाने के साथ ही सदन में तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिली। सरकार ने जहां इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया, वहीं विपक्ष ने इसके संवैधानिक और संघीय ढांचे पर असर को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया।

केंद्रीय सरकार की ओर से पेश किए गए इन विधेयकों में लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने, परिसीमन प्रक्रिया को नए आधार पर तय करने और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का प्रस्ताव शामिल है। इसमें लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की योजना है। सरकार का कहना है कि यह बदलाव 1971 की जनगणना आधारित व्यवस्था को अद्यतन करने के लिए जरूरी है।

बहस के दौरान समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के विरोध में नहीं है, लेकिन प्रक्रिया और संरचना पर आपत्ति है। उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाते हुए सरकार से स्पष्टता मांगी। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने जवाब देते हुए कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण संवैधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं है और राजनीतिक दलों को अपनी पार्टी टिकट वितरण में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।

कांग्रेस, डीएमके और अन्य विपक्षी दलों ने भी बिल का विरोध किया। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि सरकार संविधान के मूल ढांचे से छेड़छाड़ कर रही है। डीएमके सांसद टीआर बालू ने इन विधेयकों को “सैंडविच बिल” बताते हुए कहा कि ये आपस में जुड़े हुए हैं और संघीय संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने परिसीमन प्रस्ताव का विरोध करते हुए बिल की प्रतियां तक जला दीं।

वहीं एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इसे संघवाद के खिलाफ बताया और कहा कि यह केवल महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं है, बल्कि राज्यों के अधिकारों से जुड़ा प्रश्न भी है।

सरकारी पक्ष की ओर से कहा गया कि महिला आरक्षण देश की आधी आबादी को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में ऐतिहासिक सुधार है। भाजपा सांसद रवि किशन ने कहा कि यह कदम हर भारतीय महिला के सपनों को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।

संसद में हुई वोटिंग में विधेयकों के पुनर्स्थापन के पक्ष में 207 वोट पड़े, जबकि 126 सांसदों ने विरोध किया। यह स्पष्ट करता है कि इस प्रस्ताव पर राजनीतिक सहमति अभी भी पूरी तरह नहीं बन पाई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि परिसीमन और सीट बढ़ोतरी जैसे मुद्दे आने वाले समय में केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक तनाव को और बढ़ा सकते हैं। हालांकि सरकार का दावा है कि यह कदम लंबे समय से लंबित महिला आरक्षण कानून को वास्तविक रूप देने के लिए आवश्यक है।

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16 Apr 2026 By Nitin Trivedi

महिला आरक्षण संशोधन बिल लोकसभा में पेश: विपक्ष का हंगामा, अखिलेश-शाह में तीखी बहस, मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण पर गरमाई राजनीति

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लोकसभा में गुरुवार को महिला आरक्षण से जुड़े तीन संविधान संशोधन बिल पेश किए जाने के साथ ही सदन में तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिली। सरकार ने जहां इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया, वहीं विपक्ष ने इसके संवैधानिक और संघीय ढांचे पर असर को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया।

केंद्रीय सरकार की ओर से पेश किए गए इन विधेयकों में लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने, परिसीमन प्रक्रिया को नए आधार पर तय करने और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का प्रस्ताव शामिल है। इसमें लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की योजना है। सरकार का कहना है कि यह बदलाव 1971 की जनगणना आधारित व्यवस्था को अद्यतन करने के लिए जरूरी है।

बहस के दौरान समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के विरोध में नहीं है, लेकिन प्रक्रिया और संरचना पर आपत्ति है। उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाते हुए सरकार से स्पष्टता मांगी। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने जवाब देते हुए कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण संवैधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं है और राजनीतिक दलों को अपनी पार्टी टिकट वितरण में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।

कांग्रेस, डीएमके और अन्य विपक्षी दलों ने भी बिल का विरोध किया। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि सरकार संविधान के मूल ढांचे से छेड़छाड़ कर रही है। डीएमके सांसद टीआर बालू ने इन विधेयकों को “सैंडविच बिल” बताते हुए कहा कि ये आपस में जुड़े हुए हैं और संघीय संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने परिसीमन प्रस्ताव का विरोध करते हुए बिल की प्रतियां तक जला दीं।

वहीं एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इसे संघवाद के खिलाफ बताया और कहा कि यह केवल महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं है, बल्कि राज्यों के अधिकारों से जुड़ा प्रश्न भी है।

सरकारी पक्ष की ओर से कहा गया कि महिला आरक्षण देश की आधी आबादी को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में ऐतिहासिक सुधार है। भाजपा सांसद रवि किशन ने कहा कि यह कदम हर भारतीय महिला के सपनों को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।

संसद में हुई वोटिंग में विधेयकों के पुनर्स्थापन के पक्ष में 207 वोट पड़े, जबकि 126 सांसदों ने विरोध किया। यह स्पष्ट करता है कि इस प्रस्ताव पर राजनीतिक सहमति अभी भी पूरी तरह नहीं बन पाई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि परिसीमन और सीट बढ़ोतरी जैसे मुद्दे आने वाले समय में केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक तनाव को और बढ़ा सकते हैं। हालांकि सरकार का दावा है कि यह कदम लंबे समय से लंबित महिला आरक्षण कानून को वास्तविक रूप देने के लिए आवश्यक है।

https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/draftwomens-reservation-amendment-bill-introduced-in-lok-sabha-oppositions-ruckus/article-51328

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