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पहाड़ी और तटीय इलाकों में नट फसलों से बढ़ सकती किसानों की आय
Col Nitin Sehgal, VSM (Veteran), CEO, Nuts and Dry Fruits Council (India)
बादाम, अखरोट और काजू जैसी उच्च मूल्य वाली फसलें भारत के पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों में किसानों के लिए नई आर्थिक संभावनाएं खोल रही हैं, विशेषज्ञों ने जताई बड़ी उम्मीदें
भारत के पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों ने लंबे समय तक पारंपरिक फसलों के सहारे किसानों की आजीविका को बनाए रखा है. लेकिन अब विशेषज्ञों का मानना है कि यही क्षेत्र आर्थिक रूप से अधिक लाभ देने वाली नट फसलों की खेती के लिए भी सबसे उपयुक्त हैं. बादाम, अखरोट और काजू जैसी फसलें किसानों की आय बढ़ाने का नया अवसर बनकर उभर रही हैं. खास बात यह है कि इन फसलों के लिए जिन जलवायु परिस्थितियों की जरूरत होती है, वे भारत के कई पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों में पहले से मौजूद हैं.
बादाम की खेती मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में होती है. वहीं अखरोट उत्पादन जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में केंद्रित है. दूसरी ओर काजू की खेती केरल, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे तटीय राज्यों में प्रमुख है. यह कोई संयोग नहीं है बल्कि इन क्षेत्रों की विशेष कृषि-जलवायु परिस्थितियां इन्हें इन फसलों के लिए स्वाभाविक रूप से उपयुक्त बनाती हैं. यही कारण है कि इन इलाकों में नट खेती के विस्तार की संभावनाएं सबसे अधिक मानी जा रही हैं.
कमाई में इतना बड़ा अंतर क्यों?
आय के मामले में अंतर बेहद बड़ा है. वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधित बादाम, अखरोट और काजू की खेती प्रति एकड़ कई लाख रुपये का शुद्ध लाभ दे सकती है. इसके मुकाबले गेहूं, धान और गन्ना जैसी पारंपरिक फसलें उसी जमीन पर इसका केवल एक छोटा हिस्सा ही वापस देती हैं. भारत अक्सर लगभग 50 रुपये प्रति किलोग्राम मूल्य वाली कृषि वस्तुओं का निर्यात करता है, जबकि 500 रुपये प्रति किलोग्राम या उससे अधिक मूल्य वाले उत्पादों का आयात करता है. यह दस गुना अंतर केवल व्यापार का मुद्दा नहीं है, बल्कि उत्पादन प्राथमिकताओं का भी सवाल है. इसका समाधान इस बात से शुरू होता है कि हम क्या उगाते हैं, कहां उगाते हैं और अपनी कृषि भूमि से अधिक मूल्य कैसे पैदा करते हैं.
छोटे किसानों के लिए मौका कहां है?
भारत के लगभग तीन-चौथाई किसान छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि है. ऐसे किसानों के लिए नट खेती एक दीर्घकालिक आय का स्रोत बन सकती है. मौसमी फसलों के विपरीत, एक बार विकसित हो चुका नट बागान कई दशकों तक उत्पादन देता है. इससे किसानों को हर साल दोबारा बुवाई और उत्पादन की अनिश्चितताओं का सामना कम करना पड़ता है. यह केवल बेहतर फसल का विकल्प नहीं बल्कि उसी जमीन पर बेहतर आर्थिक भविष्य की संभावना है.
सरकार का समर्थन कितना महत्वपूर्ण है?
केंद्र सरकार ने भी इस क्षेत्र की संभावनाओं को पहचानना शुरू कर दिया है. केंद्रीय बजट 2026-27 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सूखे मेवे और नट्स, जिसमें कोको भी शामिल है, के लिए 350 करोड़ रुपये का विशेष प्रावधान किया है. इसके अलावा बागानों के पुनर्जीवन और उच्च घनत्व वाली खेती को भी बढ़ावा देने की बात कही गई है. इससे पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों में उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
Grow in India पहल क्या बदल सकती है?
इसी पृष्ठभूमि में Nuts and Dry Fruits Council (India) की Grow in India पहल जरुरी मानी जा रही है. इसका उद्देश्य केवल खेती का क्षेत्र बढ़ाना नहीं बल्कि किसानों को उनकी भूमि का अधिकतम आर्थिक लाभ दिलाना है. बेहतर पौध सामग्री, किसान समूहों का निर्माण और खेत से बाजार तक मजबूत नेटवर्क तैयार करना इस पहल के प्रमुख लक्ष्य हैं. इससे किसानों को बेहतर कीमत और बाजार तक आसान पहुंच मिल सकती है.
आगे की राह क्या है?
जलवायु और भूमि की अनुकूलता हमारे पास है, नीतिगत इच्छाशक्ति भी मौजूद है। अब ज़रूरत है ऐसे प्रभावी तंत्र की, जो इस क्षमता को किसानों की बढ़ी हुई आय और देश की कृषि प्रगति में परिवर्तित कर सके।
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पहाड़ी और तटीय इलाकों में नट फसलों से बढ़ सकती किसानों की आय
Col Nitin Sehgal, VSM (Veteran), CEO, Nuts and Dry Fruits Council (India)
भारत के पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों ने लंबे समय तक पारंपरिक फसलों के सहारे किसानों की आजीविका को बनाए रखा है. लेकिन अब विशेषज्ञों का मानना है कि यही क्षेत्र आर्थिक रूप से अधिक लाभ देने वाली नट फसलों की खेती के लिए भी सबसे उपयुक्त हैं. बादाम, अखरोट और काजू जैसी फसलें किसानों की आय बढ़ाने का नया अवसर बनकर उभर रही हैं. खास बात यह है कि इन फसलों के लिए जिन जलवायु परिस्थितियों की जरूरत होती है, वे भारत के कई पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों में पहले से मौजूद हैं.
बादाम की खेती मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में होती है. वहीं अखरोट उत्पादन जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में केंद्रित है. दूसरी ओर काजू की खेती केरल, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे तटीय राज्यों में प्रमुख है. यह कोई संयोग नहीं है बल्कि इन क्षेत्रों की विशेष कृषि-जलवायु परिस्थितियां इन्हें इन फसलों के लिए स्वाभाविक रूप से उपयुक्त बनाती हैं. यही कारण है कि इन इलाकों में नट खेती के विस्तार की संभावनाएं सबसे अधिक मानी जा रही हैं.
कमाई में इतना बड़ा अंतर क्यों?
आय के मामले में अंतर बेहद बड़ा है. वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधित बादाम, अखरोट और काजू की खेती प्रति एकड़ कई लाख रुपये का शुद्ध लाभ दे सकती है. इसके मुकाबले गेहूं, धान और गन्ना जैसी पारंपरिक फसलें उसी जमीन पर इसका केवल एक छोटा हिस्सा ही वापस देती हैं. भारत अक्सर लगभग 50 रुपये प्रति किलोग्राम मूल्य वाली कृषि वस्तुओं का निर्यात करता है, जबकि 500 रुपये प्रति किलोग्राम या उससे अधिक मूल्य वाले उत्पादों का आयात करता है. यह दस गुना अंतर केवल व्यापार का मुद्दा नहीं है, बल्कि उत्पादन प्राथमिकताओं का भी सवाल है. इसका समाधान इस बात से शुरू होता है कि हम क्या उगाते हैं, कहां उगाते हैं और अपनी कृषि भूमि से अधिक मूल्य कैसे पैदा करते हैं.
छोटे किसानों के लिए मौका कहां है?
भारत के लगभग तीन-चौथाई किसान छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि है. ऐसे किसानों के लिए नट खेती एक दीर्घकालिक आय का स्रोत बन सकती है. मौसमी फसलों के विपरीत, एक बार विकसित हो चुका नट बागान कई दशकों तक उत्पादन देता है. इससे किसानों को हर साल दोबारा बुवाई और उत्पादन की अनिश्चितताओं का सामना कम करना पड़ता है. यह केवल बेहतर फसल का विकल्प नहीं बल्कि उसी जमीन पर बेहतर आर्थिक भविष्य की संभावना है.
सरकार का समर्थन कितना महत्वपूर्ण है?
केंद्र सरकार ने भी इस क्षेत्र की संभावनाओं को पहचानना शुरू कर दिया है. केंद्रीय बजट 2026-27 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सूखे मेवे और नट्स, जिसमें कोको भी शामिल है, के लिए 350 करोड़ रुपये का विशेष प्रावधान किया है. इसके अलावा बागानों के पुनर्जीवन और उच्च घनत्व वाली खेती को भी बढ़ावा देने की बात कही गई है. इससे पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों में उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
Grow in India पहल क्या बदल सकती है?
इसी पृष्ठभूमि में Nuts and Dry Fruits Council (India) की Grow in India पहल जरुरी मानी जा रही है. इसका उद्देश्य केवल खेती का क्षेत्र बढ़ाना नहीं बल्कि किसानों को उनकी भूमि का अधिकतम आर्थिक लाभ दिलाना है. बेहतर पौध सामग्री, किसान समूहों का निर्माण और खेत से बाजार तक मजबूत नेटवर्क तैयार करना इस पहल के प्रमुख लक्ष्य हैं. इससे किसानों को बेहतर कीमत और बाजार तक आसान पहुंच मिल सकती है.
आगे की राह क्या है?
जलवायु और भूमि की अनुकूलता हमारे पास है, नीतिगत इच्छाशक्ति भी मौजूद है। अब ज़रूरत है ऐसे प्रभावी तंत्र की, जो इस क्षमता को किसानों की बढ़ी हुई आय और देश की कृषि प्रगति में परिवर्तित कर सके।
