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नेपाल ने चीन सीमा पर चेतावनी प्रणाली फिर बनाने की तैयारी तेज की
Digital Desk
ग्लेशियर बाढ़ में 1,100 से अधिक मौतों के बाद नेपाल चीन सीमा पर सेंसर, कैमरे और VSAT सैटेलाइट संचार से नई चेतावनी प्रणाली बना रहा है।
जानलेवा ग्लेशियर बाढ़ के बाद नेपाल ने चीन सीमा क्षेत्र में भूस्खलन और अचानक बाढ़ की निगरानी के लिए सेंसर, कैमरे और सैटेलाइट संचार से लैस नई अर्ली-वॉर्निंग प्रणाली स्थापित करने का काम शुरू किया है।
नेपाल ने चीन की सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्र में अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम को फिर से स्थापित करने की प्रक्रिया तेज कर दी है। 26 अगस्त को ग्लेशियर ढहने से आई विनाशकारी बाढ़ में नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र में 1,100 से अधिक लोगों की मौत हुई, जबकि हजारों लोग अब भी लापता हैं। आपदा के दौरान सीमा क्षेत्र में मौजूद निगरानी और जल-माप केंद्रों को भी भारी नुकसान पहुंचा।
रॉयटर्स के अनुसार, नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) की अगुवाई में रसुवा जिले के तिमुरे में नए उपकरण लगाए जा रहे हैं। इनमें भूकंपीय सेंसर, रिमोट कैमरे और VSAT आधारित सैटेलाइट संचार प्रणाली शामिल हैं। इसका उद्देश्य ऐसी स्थिति में भी खतरे की निगरानी जारी रखना है, जब बाढ़ बिजली, मोबाइल नेटवर्क या स्थानीय बुनियादी ढांचे को नष्ट कर दे।
पुरानी चेतावनी प्रणाली हुई नाकाम
26 अगस्त की आपदा ने नेपाल की मौजूदा आपदा निगरानी व्यवस्था की कमजोरियां उजागर कर दीं। सीमा के आसपास कम से कम चार हाइड्रोलॉजिकल गेजिंग स्टेशन बाढ़ के मलबे और तेज पानी की चपेट में आकर नष्ट हो गए। इससे वास्तविक समय में नदी और जलस्तर की जानकारी मिलना मुश्किल हो गया।
पुरानी व्यवस्था मुख्य रूप से नदी के जलस्तर में होने वाले बदलावों पर नजर रखती थी। लेकिन ग्लेशियर और चट्टानों के अचानक ढहने से पैदा हुई विशाल मलबा-बाढ़ के लिए इतनी तेज प्रतिक्रिया व्यवस्था पर्याप्त नहीं थी।
रॉयटर्स के मुताबिक, बाढ़ ने सीमा चौकी को सुबह करीब 8:32 बजे प्रभावित किया, जबकि सार्वजनिक चेतावनी लगभग 9:13 बजे जारी हुई। इतने बड़े और तेज घटनाक्रम में यह अंतर स्थानीय आबादी के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता था।
सेंसर और कैमरे लगाए जाएंगे
नई व्यवस्था में भूकंपीय सेंसर जमीन के भीतर होने वाली हलचल और संभावित भूस्खलन से जुड़े संकेतों की पहचान करने में मदद करेंगे। वहीं, रिमोट कैमरे संवेदनशील इलाकों की दृश्य निगरानी करेंगे।
फिलहाल तिमुरे में एक स्थान पर सेंसर, कैमरे और संचार उपकरण लगाने की तैयारी है। इसके बाद अन्य संवेदनशील स्थानों पर भी नेटवर्क का विस्तार किया जा सकता है। अधिकारियों ने हेलीकॉप्टर से इलाके का सर्वेक्षण कर उपकरण लगाने के लिए उपयुक्त स्थानों की पहचान भी की है।
नेपाल ने अभी इस पूरी योजना की औपचारिक सार्वजनिक घोषणा नहीं की है। रॉयटर्स से बातचीत करने वाले सरकारी अधिकारियों ने पहचान उजागर न करने की शर्त पर इसकी जानकारी दी।
VSAT से बना रहेगा संपर्क
नई प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा Very Small Aperture Terminal यानी VSAT सैटेलाइट संचार नेटवर्क होगा।
इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि मोबाइल नेटवर्क या स्थानीय संचार व्यवस्था बंद होने के बावजूद निगरानी केंद्र अपना डेटा भेज सकें। हिमालयी आपदा के दौरान जब बाढ़ ने स्थानीय बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया, तब ऐसी स्वतंत्र संचार व्यवस्था की जरूरत साफ तौर पर सामने आई।
यदि सेंसर संभावित भूस्खलन या अचानक बाढ़ के संकेत समय पर भेज पाते हैं, तो प्रशासन को प्रभावित नदी घाटियों और बस्तियों को चेतावनी देने के लिए कुछ अतिरिक्त मिनट मिल सकते हैं।
हिमालयी इलाका अब भी अस्थिर
आपदा के बाद क्षेत्र में तत्काल खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ग्लेशियर के ढहने के बाद बने दो बैरियर झीलों का पानी निकल चुका है, जिससे उन झीलों से जुड़ा तत्काल जोखिम कम हुआ है। लेकिन पहाड़ी भूभाग अभी भी अस्थिर बताया जा रहा है।
नेपाल के अधिकारियों को आशंका है कि बड़े ग्लेशियर हादसे के बाद भू-दृश्य में बदलाव आगे भी भूस्खलन को जन्म दे सकता है। ऐसे किसी घटनाक्रम से नदियों में अचानक मलबा और पानी पहुंच सकता है तथा नीचे बसे इलाकों को खतरा हो सकता है।
विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस तरह की घटना में चेतावनी का समय बहुत कम हो सकता है। इसलिए कुछ मिनट पहले मिलने वाला संकेत भी जान बचाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
चीन से डेटा साझा करना अहम
आपदा ने नेपाल और चीन के बीच सीमापार आपदा सूचना साझा करने की जरूरत को भी फिर सामने ला दिया है। हिमालय के ऊंचाई वाले इलाकों में ग्लेशियर, झीलों और जलधाराओं से जुड़े बदलाव सीमा के दोनों ओर रहने वाली आबादी को प्रभावित कर सकते हैं।
नेपाल पहले भी चीन से ग्लेशियरों की गतिविधियों और जलस्तर से जुड़ा अधिक विस्तृत तथा वास्तविक समय का डेटा साझा करने का आग्रह कर चुका था। आपदा के बाद चीन ने प्रभावित क्षेत्रों की सैटेलाइट तस्वीरें, हाइड्रोलॉजिकल डेटा और ऊपरी हिस्सों में बनी बैरियर झीलों से जुड़ी चेतावनी संबंधी जानकारी नेपाल के साथ साझा किए जाने की बात कही है।
अब नेपाल दोनों देशों के बीच इस तरह के डेटा और चेतावनी तंत्र को और तेज करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है।
नेपाल ने पुनर्निर्माण तेज किया
26 अगस्त की ग्लेशियर-जनित बाढ़ के बाद नेपाल में राहत और खोज अभियान जारी हैं। 2 सितंबर की रिपोर्टों के अनुसार, नेपाल में मृतकों की संख्या 1,100 से अधिक हो चुकी थी और हजारों लोग अब भी लापता थे। बाद की रिपोर्टों में कुल मृतक संख्या और बढ़ने की जानकारी सामने आई है।
नई अर्ली-वॉर्निंग प्रणाली प्राकृतिक आपदाओं को रोक नहीं सकती, लेकिन सेंसर, कैमरे, सैटेलाइट संचार और बेहतर सीमापार डेटा साझेदारी के जरिए प्रतिक्रिया का समय बढ़ाया जा सकता है।
नेपाल के लिए अब चुनौती केवल नष्ट हुए निगरानी केंद्रों को दोबारा खड़ा करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जो ग्लेशियर टूटने, भूस्खलन और अचानक आने वाली मलबा-बाढ़ जैसे बेहद तेज घटनाक्रमों का पहले पता लगा सके। इस आपदा ने यह भी स्पष्ट किया है कि हिमालयी क्षेत्र में प्रभावी आपदा प्रबंधन के लिए नेपाल और चीन के बीच तेज और भरोसेमंद सूचना साझेदारी कितनी महत्वपूर्ण है।
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