ओवैसी का हिमंता पर तीखा हमला: बोले– ‘दिमाग में ट्यूबलाइट’, संविधान की समझ नहीं; हिंदू राष्ट्र बयान से बढ़ा सियासी घमासान

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प्रधानमंत्री के धर्म को लेकर असम सीएम की टिप्पणी पर ओवैसी का पलटवार, कांग्रेस–BJP नेताओं की भी तीखी प्रतिक्रियाएं

प्रधानमंत्री के पद और धर्म को लेकर दिए गए बयान ने राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर तीखा हमला करते हुए कहा कि उन्हें भारतीय संविधान की मूल भावना को समझने की जरूरत है। ओवैसी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि प्रधानमंत्री पद किसी धर्म से बंधा नहीं है और ऐसा दावा संविधान के खिलाफ है।

दरअसल, विवाद की जड़ शनिवार को दिए गए दो अलग-अलग बयानों से जुड़ी है। ओवैसी ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था कि भविष्य में हिजाब पहनने वाली महिला भी भारत की प्रधानमंत्री बन सकती है। इसके जवाब में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि संवैधानिक रूप से कोई रोक नहीं है, लेकिन भारत एक हिंदू राष्ट्र है और प्रधानमंत्री हिंदू ही होगा। इसी बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का सिलसिला शुरू हुआ।

रविवार को ओवैसी ने हिमंत सरमा के बयान को असंवैधानिक बताते हुए कहा कि उन्होंने संविधान की शपथ ली है, फिर भी वे ऐसे बयान दे रहे हैं जिनका संविधान में कोई आधार नहीं है। ओवैसी ने कहा कि भारत का संविधान धर्म के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता और प्रधानमंत्री का चयन लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होता है, न कि धार्मिक पहचान से। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था की तुलना किसी अन्य देश से करना गलत है, क्योंकि यहां समानता और धर्मनिरपेक्षता मूल सिद्धांत हैं।

इस मुद्दे पर कांग्रेस ने भी असम के मुख्यमंत्री की टिप्पणी से दूरी बनाते हुए आलोचना की है। कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने कहा कि किसी भी संवैधानिक पद के लिए धर्म को शर्त बनाना संविधान की भावना के विपरीत है। उनके अनुसार, ऐसे बयान समाज में अनावश्यक विभाजन पैदा करते हैं।

वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने ओवैसी पर पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि वे जानबूझकर संवेदनशील मुद्दों को उठाकर राजनीतिक माहौल गरमाते हैं। भाजपा नेताओं ने कहा कि देश में हर नागरिक को बराबरी का अधिकार है, लेकिन ओवैसी के बयान भी समाज को बांटने वाले हैं। पार्टी प्रवक्ताओं ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री पद किसी धर्म से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जनादेश से तय होता है।

महाराष्ट्र सरकार के मंत्री नितेश राणे ने भी इस विवाद में प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस तरह के बयान देश की सामाजिक एकता को नुकसान पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों को जिम्मेदारी से बोलना चाहिए।

प्रधानमंत्री के धर्म को लेकर उठा यह विवाद अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा है। यह मुद्दा संविधान, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की मूल अवधारणाओं पर बहस का रूप ले चुका है। आने वाले दिनों में इस पर संसद से लेकर सार्वजनिक मंचों तक चर्चा और तेज होने की संभावना है।

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www.dainikjagranmpcg.com
11 Jan 2026 By Nitin Trivedi

ओवैसी का हिमंता पर तीखा हमला: बोले– ‘दिमाग में ट्यूबलाइट’, संविधान की समझ नहीं; हिंदू राष्ट्र बयान से बढ़ा सियासी घमासान

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प्रधानमंत्री के पद और धर्म को लेकर दिए गए बयान ने राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर तीखा हमला करते हुए कहा कि उन्हें भारतीय संविधान की मूल भावना को समझने की जरूरत है। ओवैसी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि प्रधानमंत्री पद किसी धर्म से बंधा नहीं है और ऐसा दावा संविधान के खिलाफ है।

दरअसल, विवाद की जड़ शनिवार को दिए गए दो अलग-अलग बयानों से जुड़ी है। ओवैसी ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था कि भविष्य में हिजाब पहनने वाली महिला भी भारत की प्रधानमंत्री बन सकती है। इसके जवाब में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि संवैधानिक रूप से कोई रोक नहीं है, लेकिन भारत एक हिंदू राष्ट्र है और प्रधानमंत्री हिंदू ही होगा। इसी बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का सिलसिला शुरू हुआ।

रविवार को ओवैसी ने हिमंत सरमा के बयान को असंवैधानिक बताते हुए कहा कि उन्होंने संविधान की शपथ ली है, फिर भी वे ऐसे बयान दे रहे हैं जिनका संविधान में कोई आधार नहीं है। ओवैसी ने कहा कि भारत का संविधान धर्म के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता और प्रधानमंत्री का चयन लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होता है, न कि धार्मिक पहचान से। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था की तुलना किसी अन्य देश से करना गलत है, क्योंकि यहां समानता और धर्मनिरपेक्षता मूल सिद्धांत हैं।

इस मुद्दे पर कांग्रेस ने भी असम के मुख्यमंत्री की टिप्पणी से दूरी बनाते हुए आलोचना की है। कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने कहा कि किसी भी संवैधानिक पद के लिए धर्म को शर्त बनाना संविधान की भावना के विपरीत है। उनके अनुसार, ऐसे बयान समाज में अनावश्यक विभाजन पैदा करते हैं।

वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने ओवैसी पर पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि वे जानबूझकर संवेदनशील मुद्दों को उठाकर राजनीतिक माहौल गरमाते हैं। भाजपा नेताओं ने कहा कि देश में हर नागरिक को बराबरी का अधिकार है, लेकिन ओवैसी के बयान भी समाज को बांटने वाले हैं। पार्टी प्रवक्ताओं ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री पद किसी धर्म से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जनादेश से तय होता है।

महाराष्ट्र सरकार के मंत्री नितेश राणे ने भी इस विवाद में प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस तरह के बयान देश की सामाजिक एकता को नुकसान पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों को जिम्मेदारी से बोलना चाहिए।

प्रधानमंत्री के धर्म को लेकर उठा यह विवाद अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा है। यह मुद्दा संविधान, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की मूल अवधारणाओं पर बहस का रूप ले चुका है। आने वाले दिनों में इस पर संसद से लेकर सार्वजनिक मंचों तक चर्चा और तेज होने की संभावना है।

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