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भारत में प्रदूषण बना सबसे बड़ा खतरा: हर साल 17 लाख मौतें, 30 लाख करोड़ का आर्थिक नुकसान
नेशनल न्यूज
दावोस में हार्वर्ड प्रोफेसर गीता गोपीनाथ की चेतावनी—टैरिफ से कहीं बड़ा संकट, फिर भी नीति बहस से बाहर
दावोस:भारत में वायु प्रदूषण हर साल लगभग 17 लाख लोगों की जान ले रहा है, जो देश में होने वाली कुल मौतों का करीब 18 प्रतिशत है। यह गंभीर चेतावनी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और IMF की पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर गीता गोपीनाथ ने दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के दौरान भारतीय मीडिया से बातचीत में दी। उन्होंने कहा कि प्रदूषण भारत के लिए टैरिफ या व्यापारिक बाधाओं से कहीं बड़ा खतरा बन चुका है, लेकिन नीति-निर्माण में इसे वह प्राथमिकता नहीं मिल रही, जिसकी जरूरत है।
गीता गोपीनाथ ने वर्ल्ड बैंक और लैंसेट काउंटडाउन जैसी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि प्रदूषण का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की आर्थिक उत्पादकता, श्रम क्षमता और दीर्घकालिक विकास को सीधे नुकसान पहुंचा रहा है। लैंसेट काउंटडाउन की रिपोर्ट के अनुसार, केवल 2022 में वायु प्रदूषण से भारत को करीब ₹30 लाख करोड़ का आर्थिक नुकसान हुआ, जो GDP का लगभग 9.5 प्रतिशत है।
कामकाजी आबादी और विकास पर सीधा असर
गीता गोपीनाथ के मुताबिक, इतनी बड़ी संख्या में समय से पहले होने वाली मौतें परिवारों को तोड़ती हैं और कामकाजी आबादी को कम करती हैं। इससे स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ता है और अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ती है। उन्होंने कहा कि भारत जब खुद को एक वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग और निवेश हब के तौर पर पेश कर रहा है, तब प्रदूषण निवेशकों के लिए भी एक बड़ा नकारात्मक संकेत बनता जा रहा है।
विदेशी निवेशकों की चिंता
उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय निवेशक अब सिर्फ बाजार और टैक्स नीति नहीं देखते, बल्कि हवा की गुणवत्ता, रहने की स्थिति और स्वास्थ्य जोखिमों को भी गंभीरता से परखते हैं। खराब पर्यावरणीय हालात विदेशी निवेश को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है।
लैंसेट रिपोर्ट: बढ़ता खतरा
लैंसेट काउंटडाउन की रिपोर्ट बताती है कि भारत में PM2.5 जैसे सूक्ष्म प्रदूषक कणों के कारण होने वाली मौतों में पिछले एक दशक में तेज़ बढ़ोतरी हुई है। कोयला आधारित बिजली संयंत्र, वाहनों से निकलने वाला धुआं और औद्योगिक प्रदूषण इसके प्रमुख कारण हैं। ग्रामीण इलाकों में घरेलू ईंधन से होने वाला प्रदूषण भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
नीति स्तर पर तत्काल कार्रवाई की जरूरत
गीता गोपीनाथ ने कहा कि प्रदूषण से निपटना केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि पब्लिक हेल्थ और आर्थिक नीति का सवाल है। साफ हवा, टिकाऊ ट्रांसपोर्ट और स्वच्छ ऊर्जा को विकास योजनाओं के केंद्र में लाए बिना भारत अपनी पूरी आर्थिक क्षमता हासिल नहीं कर सकता।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा रुझान नहीं बदले गए, तो आने वाले वर्षों में प्रदूषण भारत की विकास कहानी पर सबसे बड़ा ब्रेक बन सकता है।
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भारत में प्रदूषण बना सबसे बड़ा खतरा: हर साल 17 लाख मौतें, 30 लाख करोड़ का आर्थिक नुकसान
नेशनल न्यूज
दावोस:भारत में वायु प्रदूषण हर साल लगभग 17 लाख लोगों की जान ले रहा है, जो देश में होने वाली कुल मौतों का करीब 18 प्रतिशत है। यह गंभीर चेतावनी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और IMF की पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर गीता गोपीनाथ ने दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के दौरान भारतीय मीडिया से बातचीत में दी। उन्होंने कहा कि प्रदूषण भारत के लिए टैरिफ या व्यापारिक बाधाओं से कहीं बड़ा खतरा बन चुका है, लेकिन नीति-निर्माण में इसे वह प्राथमिकता नहीं मिल रही, जिसकी जरूरत है।
गीता गोपीनाथ ने वर्ल्ड बैंक और लैंसेट काउंटडाउन जैसी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि प्रदूषण का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की आर्थिक उत्पादकता, श्रम क्षमता और दीर्घकालिक विकास को सीधे नुकसान पहुंचा रहा है। लैंसेट काउंटडाउन की रिपोर्ट के अनुसार, केवल 2022 में वायु प्रदूषण से भारत को करीब ₹30 लाख करोड़ का आर्थिक नुकसान हुआ, जो GDP का लगभग 9.5 प्रतिशत है।
कामकाजी आबादी और विकास पर सीधा असर
गीता गोपीनाथ के मुताबिक, इतनी बड़ी संख्या में समय से पहले होने वाली मौतें परिवारों को तोड़ती हैं और कामकाजी आबादी को कम करती हैं। इससे स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ता है और अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ती है। उन्होंने कहा कि भारत जब खुद को एक वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग और निवेश हब के तौर पर पेश कर रहा है, तब प्रदूषण निवेशकों के लिए भी एक बड़ा नकारात्मक संकेत बनता जा रहा है।
विदेशी निवेशकों की चिंता
उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय निवेशक अब सिर्फ बाजार और टैक्स नीति नहीं देखते, बल्कि हवा की गुणवत्ता, रहने की स्थिति और स्वास्थ्य जोखिमों को भी गंभीरता से परखते हैं। खराब पर्यावरणीय हालात विदेशी निवेश को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है।
लैंसेट रिपोर्ट: बढ़ता खतरा
लैंसेट काउंटडाउन की रिपोर्ट बताती है कि भारत में PM2.5 जैसे सूक्ष्म प्रदूषक कणों के कारण होने वाली मौतों में पिछले एक दशक में तेज़ बढ़ोतरी हुई है। कोयला आधारित बिजली संयंत्र, वाहनों से निकलने वाला धुआं और औद्योगिक प्रदूषण इसके प्रमुख कारण हैं। ग्रामीण इलाकों में घरेलू ईंधन से होने वाला प्रदूषण भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
नीति स्तर पर तत्काल कार्रवाई की जरूरत
गीता गोपीनाथ ने कहा कि प्रदूषण से निपटना केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि पब्लिक हेल्थ और आर्थिक नीति का सवाल है। साफ हवा, टिकाऊ ट्रांसपोर्ट और स्वच्छ ऊर्जा को विकास योजनाओं के केंद्र में लाए बिना भारत अपनी पूरी आर्थिक क्षमता हासिल नहीं कर सकता।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा रुझान नहीं बदले गए, तो आने वाले वर्षों में प्रदूषण भारत की विकास कहानी पर सबसे बड़ा ब्रेक बन सकता है।
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