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बुद्ध की विरासत की स्वदेश वापसी पर प्रधानमंत्री का संदेश—यह आस्था की पुन प्रतिष्ठा है
नेशनल न्यूज
दिल्ली में पवित्र पिपरहवा अवशेषों की प्रदर्शनी का शुभारंभ, पीएम बोले—यह केवल ऐतिहासिक वस्तुएं नहीं, भारत की चेतना हैं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भगवान बुद्ध से जुड़े पवित्र पिपरहवा अवशेषों की भारत वापसी को देश की सांस्कृतिक स्मृति और आध्यात्मिक पहचान के लिए एक निर्णायक क्षण बताया। राजधानी में आयोजित विशेष प्रदर्शनी के उद्घाटन अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा कि ये अवशेष भारत के लिए केवल पुरातात्विक धरोहर नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, दर्शन और जीवन-दृष्टि से जुड़े हुए हैं।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि जिनके पास ये अवशेष लंबे समय तक रहे, उनके लिए यह ऐतिहासिक संग्रह भर थे, लेकिन भारत के लिए इनका अर्थ कहीं अधिक गहरा है। उन्होंने कहा कि यह फर्क ही बताता है कि विरासत को देखने का नजरिया कैसे सभ्यता और संस्कृति को परिभाषित करता है।
पिपरहवा अवशेष भगवान बुद्ध से संबंधित वे पवित्र अवशेष हैं, जिनमें अस्थि-धातु और उनसे जुड़ी प्राचीन वस्तुएं शामिल हैं। इन्हें अब दिल्ली के राय पिथौरा सांस्कृतिक परिसर में प्रदर्शित किया गया है, जहां आम नागरिक, बौद्ध भिक्षु और शोधकर्ता इनके दर्शन कर सकते हैं।
ये अवशेष उत्तर प्रदेश के पिपरहवा क्षेत्र में खुदाई के दौरान प्राप्त हुए थे, जिसे प्राचीन कपिलवस्तु से जोड़ा जाता है। औपनिवेशिक काल में ये धरोहर भारत से बाहर चली गई थी। प्रधानमंत्री ने कहा कि उस दौर में भारतीय विरासत को उसकी आत्मा से अलग कर दिया गया, लेकिन अब यह वापसी एक ऐतिहासिक भूल के सुधार जैसी है।
प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि जब ये अवशेष अलग-अलग देशों में प्रदर्शित किए गए, तो वहां लाखों लोगों ने श्रद्धा के साथ इनके दर्शन किए। उन्होंने कहा कि यह अनुभव दर्शाता है कि भगवान बुद्ध किसी एक देश या परंपरा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरी मानवता की साझा विरासत हैं।
प्रधानमंत्री का दृष्टिकोण
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि अपने विचार, करुणा और अध्यात्म से विश्व से जुड़ता है। उन्होंने बताया कि जहां-जहां बौद्ध परंपरा जीवित है, वहां भारत के प्रति एक स्वाभाविक सम्मान और आत्मीयता दिखाई देती है। यह प्रदर्शनी उसी सांस्कृतिक सेतु का विस्तार है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि विरासत की रक्षा केवल संग्रहालयों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे नई पीढ़ी तक जीवंत रूप में पहुंचाना भी उतना ही आवश्यक है।
प्रधानमंत्री ने अवशेषों की स्वदेश वापसी में सहयोग देने वाले निजी और संस्थागत प्रयासों की सराहना की और कहा कि जब सरकार और समाज एक साझा उद्देश्य के लिए साथ आते हैं, तो असंभव भी संभव हो जाता है।
यह प्रदर्शनी भारत की बौद्ध विरासत को वैश्विक स्तर पर समझने और स्वीकार करने का अवसर प्रदान करेगी। सरकार का मानना है कि इससे सांस्कृतिक पर्यटन, शोध और अंतरराष्ट्रीय संवाद को भी नई दिशा मिलेगी।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भगवान बुद्ध से जुड़े पवित्र पिपरहवा अवशेषों की भारत वापसी को देश की सांस्कृतिक स्मृति और आध्यात्मिक पहचान के लिए एक निर्णायक क्षण बताया। राजधानी में आयोजित विशेष प्रदर्शनी के उद्घाटन अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा कि ये अवशेष भारत के लिए केवल पुरातात्विक धरोहर नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, दर्शन और जीवन-दृष्टि से जुड़े हुए हैं।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि जिनके पास ये अवशेष लंबे समय तक रहे, उनके लिए यह ऐतिहासिक संग्रह भर थे, लेकिन भारत के लिए इनका अर्थ कहीं अधिक गहरा है। उन्होंने कहा कि यह फर्क ही बताता है कि विरासत को देखने का नजरिया कैसे सभ्यता और संस्कृति को परिभाषित करता है।
पिपरहवा अवशेष भगवान बुद्ध से संबंधित वे पवित्र अवशेष हैं, जिनमें अस्थि-धातु और उनसे जुड़ी प्राचीन वस्तुएं शामिल हैं। इन्हें अब दिल्ली के राय पिथौरा सांस्कृतिक परिसर में प्रदर्शित किया गया है, जहां आम नागरिक, बौद्ध भिक्षु और शोधकर्ता इनके दर्शन कर सकते हैं।
ये अवशेष उत्तर प्रदेश के पिपरहवा क्षेत्र में खुदाई के दौरान प्राप्त हुए थे, जिसे प्राचीन कपिलवस्तु से जोड़ा जाता है। औपनिवेशिक काल में ये धरोहर भारत से बाहर चली गई थी। प्रधानमंत्री ने कहा कि उस दौर में भारतीय विरासत को उसकी आत्मा से अलग कर दिया गया, लेकिन अब यह वापसी एक ऐतिहासिक भूल के सुधार जैसी है।
प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि जब ये अवशेष अलग-अलग देशों में प्रदर्शित किए गए, तो वहां लाखों लोगों ने श्रद्धा के साथ इनके दर्शन किए। उन्होंने कहा कि यह अनुभव दर्शाता है कि भगवान बुद्ध किसी एक देश या परंपरा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरी मानवता की साझा विरासत हैं।
प्रधानमंत्री का दृष्टिकोण
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि अपने विचार, करुणा और अध्यात्म से विश्व से जुड़ता है। उन्होंने बताया कि जहां-जहां बौद्ध परंपरा जीवित है, वहां भारत के प्रति एक स्वाभाविक सम्मान और आत्मीयता दिखाई देती है। यह प्रदर्शनी उसी सांस्कृतिक सेतु का विस्तार है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि विरासत की रक्षा केवल संग्रहालयों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे नई पीढ़ी तक जीवंत रूप में पहुंचाना भी उतना ही आवश्यक है।
प्रधानमंत्री ने अवशेषों की स्वदेश वापसी में सहयोग देने वाले निजी और संस्थागत प्रयासों की सराहना की और कहा कि जब सरकार और समाज एक साझा उद्देश्य के लिए साथ आते हैं, तो असंभव भी संभव हो जाता है।
यह प्रदर्शनी भारत की बौद्ध विरासत को वैश्विक स्तर पर समझने और स्वीकार करने का अवसर प्रदान करेगी। सरकार का मानना है कि इससे सांस्कृतिक पर्यटन, शोध और अंतरराष्ट्रीय संवाद को भी नई दिशा मिलेगी।
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