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अमेरिका-ईरान समझौते के संकेत तेज, होर्मुज जलडमरूमध्य पर बनी सहमति की चर्चा
Digital Desk
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा- समझौता पहले से ज्यादा करीब, वहीं इजराइल पर बातचीत पटरी से उतारने की कोशिश का आरोप
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रही तनातनी के बीच एक संभावित समझौते को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि दोनों देशों के बीच एक प्रस्तावित समझौता पहले की तुलना में कहीं अधिक करीब पहुंच गया है। हालांकि उन्होंने मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों से अपील की है कि अंतिम रूप दिए जाने से पहले समझौते की शर्तों को लेकर अटकलें लगाने से बचें। अराघची का कहना है कि जब भी किसी दस्तावेज पर अंतिम सहमति बनेगी, तब उसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाएगी। उनके बयान ने ऐसे समय में ध्यान खींचा है जब मध्य पूर्व पहले से ही युद्ध, समुद्री सुरक्षा और परमाणु कार्यक्रमों को लेकर बढ़ते तनाव का सामना कर रहा है।
ईरानी मीडिया में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच जिस प्रारूप समझौते पर चर्चा चल रही है, उसमें कई महत्वपूर्ण बिंदु शामिल हैं। इनमें होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन व्यवस्था, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और परमाणु कार्यक्रम को लेकर आगे की बातचीत का ढांचा शामिल बताया जा रहा है। हालांकि ईरान ने साफ किया है कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण छोड़ने को तैयार नहीं है। यह क्षेत्र दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसलिए इस जलमार्ग से जुड़ी किसी भी खबर का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों और वैश्विक राजनीति दोनों पर पड़ता है। अराघची ने अपने बयान में इजराइल पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ ताकतें अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को पटरी से उतारने की कोशिश कर रही हैं। उनका इशारा स्पष्ट रूप से इजराइल की ओर माना जा रहा है। ईरान लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि इजराइल क्षेत्रीय तनाव को बनाए रखना चाहता है और किसी भी ऐसे समझौते का विरोध करता है जिससे तेहरान और वाशिंगटन के संबंधों में सुधार हो सकता हो। दूसरी तरफ इजराइल का कहना है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम क्षेत्र और दुनिया की सुरक्षा के लिए खतरा है तथा उसे परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना जरूरी है।
इसी बीच इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी बयान दिया है कि वह और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के मुद्दे पर पूरी तरह एकमत हैं। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका की ओर से संभावित समझौते के संकेत दिए जा रहे हैं। इससे यह साफ हो गया है कि कूटनीतिक बातचीत के समानांतर सुरक्षा और रणनीतिक चिंताएं भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कोई समझौता होता भी है तो उसमें परमाणु गतिविधियों पर निगरानी और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े सख्त प्रावधान शामिल हो सकते हैं। इस पूरे घटनाक्रम के बीच समुद्री सुरक्षा का मुद्दा भी प्रमुख बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आरोप लगाया है कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से निकल रहे भारतीय जहाजों पर ड्रोन हमले किए हैं। उनके अनुसार ओमान तट के पास इस सप्ताह तीन जहाज हमले की चपेट में आए थे। इनमें से एक घटना में भारतीय चालक दल के तीन नाविकों की मौत हो गई। इस आरोप के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। हालांकि ईरान की ओर से इन आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े देशों की नजर अब इस पूरे मामले पर टिकी हुई है।
ईरान की सरकारी मीडिया ने दावा किया है कि प्रस्तावित समझौते के तहत अमेरिका और ईरान के बीच अगले 60 दिनों तक परमाणु समझौते को लेकर गहन बातचीत की जा सकती है। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि यह मसौदा केवल परमाणु मुद्दे तक सीमित नहीं है बल्कि क्षेत्रीय संघर्षों को कम करने और कई मोर्चों पर तनाव घटाने के लिए एक व्यापक ढांचा तैयार करने का प्रयास है। लेबनान सहित कई क्षेत्रों में चल रहे संघर्षों को भी इस बातचीत से जोड़कर देखा जा रहा है। यदि अमेरिका और ईरान किसी साझा समझ पर पहुंचते हैं तो इसका असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव पूरे मध्य पूर्व, वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर पड़ सकता है। वहीं यदि बातचीत किसी कारण से विफल होती है तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका भी बनी रहेगी। फिलहाल दोनों पक्ष सार्वजनिक रूप से सतर्क रुख अपनाए हुए हैं, लेकिन लगातार आ रहे बयानों से यह संकेत जरूर मिल रहा है कि पर्दे के पीछे महत्वपूर्ण स्तर की बातचीत जारी है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि प्रस्तावित समझौता वास्तव में अंतिम रूप ले पाता है या नहीं।
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अमेरिका-ईरान समझौते के संकेत तेज, होर्मुज जलडमरूमध्य पर बनी सहमति की चर्चा
Digital Desk
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रही तनातनी के बीच एक संभावित समझौते को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि दोनों देशों के बीच एक प्रस्तावित समझौता पहले की तुलना में कहीं अधिक करीब पहुंच गया है। हालांकि उन्होंने मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों से अपील की है कि अंतिम रूप दिए जाने से पहले समझौते की शर्तों को लेकर अटकलें लगाने से बचें। अराघची का कहना है कि जब भी किसी दस्तावेज पर अंतिम सहमति बनेगी, तब उसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाएगी। उनके बयान ने ऐसे समय में ध्यान खींचा है जब मध्य पूर्व पहले से ही युद्ध, समुद्री सुरक्षा और परमाणु कार्यक्रमों को लेकर बढ़ते तनाव का सामना कर रहा है।
ईरानी मीडिया में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच जिस प्रारूप समझौते पर चर्चा चल रही है, उसमें कई महत्वपूर्ण बिंदु शामिल हैं। इनमें होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन व्यवस्था, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और परमाणु कार्यक्रम को लेकर आगे की बातचीत का ढांचा शामिल बताया जा रहा है। हालांकि ईरान ने साफ किया है कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण छोड़ने को तैयार नहीं है। यह क्षेत्र दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसलिए इस जलमार्ग से जुड़ी किसी भी खबर का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों और वैश्विक राजनीति दोनों पर पड़ता है। अराघची ने अपने बयान में इजराइल पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ ताकतें अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को पटरी से उतारने की कोशिश कर रही हैं। उनका इशारा स्पष्ट रूप से इजराइल की ओर माना जा रहा है। ईरान लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि इजराइल क्षेत्रीय तनाव को बनाए रखना चाहता है और किसी भी ऐसे समझौते का विरोध करता है जिससे तेहरान और वाशिंगटन के संबंधों में सुधार हो सकता हो। दूसरी तरफ इजराइल का कहना है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम क्षेत्र और दुनिया की सुरक्षा के लिए खतरा है तथा उसे परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना जरूरी है।
इसी बीच इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी बयान दिया है कि वह और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के मुद्दे पर पूरी तरह एकमत हैं। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका की ओर से संभावित समझौते के संकेत दिए जा रहे हैं। इससे यह साफ हो गया है कि कूटनीतिक बातचीत के समानांतर सुरक्षा और रणनीतिक चिंताएं भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कोई समझौता होता भी है तो उसमें परमाणु गतिविधियों पर निगरानी और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े सख्त प्रावधान शामिल हो सकते हैं। इस पूरे घटनाक्रम के बीच समुद्री सुरक्षा का मुद्दा भी प्रमुख बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आरोप लगाया है कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से निकल रहे भारतीय जहाजों पर ड्रोन हमले किए हैं। उनके अनुसार ओमान तट के पास इस सप्ताह तीन जहाज हमले की चपेट में आए थे। इनमें से एक घटना में भारतीय चालक दल के तीन नाविकों की मौत हो गई। इस आरोप के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। हालांकि ईरान की ओर से इन आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े देशों की नजर अब इस पूरे मामले पर टिकी हुई है।
ईरान की सरकारी मीडिया ने दावा किया है कि प्रस्तावित समझौते के तहत अमेरिका और ईरान के बीच अगले 60 दिनों तक परमाणु समझौते को लेकर गहन बातचीत की जा सकती है। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि यह मसौदा केवल परमाणु मुद्दे तक सीमित नहीं है बल्कि क्षेत्रीय संघर्षों को कम करने और कई मोर्चों पर तनाव घटाने के लिए एक व्यापक ढांचा तैयार करने का प्रयास है। लेबनान सहित कई क्षेत्रों में चल रहे संघर्षों को भी इस बातचीत से जोड़कर देखा जा रहा है। यदि अमेरिका और ईरान किसी साझा समझ पर पहुंचते हैं तो इसका असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव पूरे मध्य पूर्व, वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर पड़ सकता है। वहीं यदि बातचीत किसी कारण से विफल होती है तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका भी बनी रहेगी। फिलहाल दोनों पक्ष सार्वजनिक रूप से सतर्क रुख अपनाए हुए हैं, लेकिन लगातार आ रहे बयानों से यह संकेत जरूर मिल रहा है कि पर्दे के पीछे महत्वपूर्ण स्तर की बातचीत जारी है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि प्रस्तावित समझौता वास्तव में अंतिम रूप ले पाता है या नहीं।
