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90 करोड़ से बना अत्याधुनिक बांस घाट श्मशान, संचालन ईशा फाउंडेशन को सौंपा
Digital Desk
पटना के बांस घाट श्मशान में आधुनिक सुविधाओं के साथ अंतिम संस्कार की व्यवस्था, सरकार ने संचालन ईशा फाउंडेशन को दिया, शुल्क और लीज को लेकर भी चर्चा तेज।
पटना के गंगा तट स्थित बांस घाट श्मशान घाट को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस कर नया स्वरूप दिया गया है। करीब 90 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस परियोजना को अब संचालन के लिए ईशा फाउंडेशन को सौंप दिया गया है। सरकार की ओर से यह जिम्मेदारी बिना किसी शुल्क के दी गई है। हालांकि यहां अंतिम संस्कार की सेवा निशुल्क नहीं होगी। उपलब्ध व्यवस्थाओं के अनुसार अंतिम संस्कार कराने वाले लोगों को 3500 से 5000 रुपये तक का खर्च वहन करना पड़ सकता है। वहीं शहर के अन्य सरकारी श्मशान घाटों पर पारंपरिक व्यवस्था के तहत काफी कम शुल्क लिया जाता है। इसी वजह से इस परियोजना और इसकी संचालन व्यवस्था को लेकर विभिन्न स्तरों पर चर्चा शुरू हो गई है। करीब 4.5 एकड़ क्षेत्र में फैले इस आधुनिक श्मशान घाट का निर्माण पटना स्मार्ट सिटी लिमिटेड की ओर से कराया गया है। पहले यहां का श्मशान परिसर काफी छोटा था, लेकिन अब इसे विस्तार देकर आधुनिक सुविधाओं से जोड़ा गया है। परिसर में एक समय में 18 शवों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था की गई है। इसके लिए इलेक्ट्रिक शवदाह गृह, आधुनिक वुड क्रीमेशन ओवन और पारंपरिक चिता स्थल तीनों प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं, ताकि लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं और आवश्यकता के अनुसार विकल्प चुन सकें। श्मशान परिसर में चार आधुनिक इलेक्ट्रिक ओवन लगाए गए हैं, जिनमें कम समय में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। इसके अलावा छह विशेष वुड क्रीमेशन ओवन भी तैयार किए गए हैं, जिनमें पारंपरिक चिता की तुलना में कम लकड़ी का उपयोग होता है और प्रदूषण भी कम फैलता है। वहीं आठ पारंपरिक चिता स्थलों की भी व्यवस्था रखी गई है, जहां धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार किया जा सकेगा।
सुविधाओं को देखते हुए यहां आने वाले लोगों के लिए दो वातानुकूलित प्रतीक्षालय भी बनाए गए हैं। शवों को सुरक्षित रखने के लिए आधुनिक मोर्चरी रूम तैयार किया गया है, जिसमें फ्रीजर की व्यवस्था उपलब्ध है। परिसर के भीतर अंतिम संस्कार में उपयोग होने वाली सभी आवश्यक सामग्री के लिए अलग दुकानें बनाई गई हैं। यहां कफन, पूजन सामग्री, लकड़ी, घी, कपूर, अगरबत्ती और अन्य जरूरी सामान एक ही स्थान पर उपलब्ध रहेगा, जिससे परिजनों को अलग-अलग स्थानों पर भटकना नहीं पड़ेगा। इस परियोजना का एक प्रमुख आकर्षण मोक्ष द्वार और बैकुंठ द्वार हैं। लगभग 42 फीट ऊंचे इन दोनों प्रवेश और निकास द्वारों पर कांस्य से निर्मित ओम का प्रतीक स्थापित किया गया है। परिसर के भीतर दो कृत्रिम जलाशय भी बनाए गए हैं, जहां अस्थि विसर्जन और स्नान की व्यवस्था की गई है। इन तालाबों में पाइपलाइन के माध्यम से गंगा का जल पहुंचाया जाता है ताकि सीधे नदी में भीड़ और प्रदूषण दोनों को कम किया जा सके। दोनों जलाशयों के बीच भगवान शिव की भव्य प्रतिमा भी स्थापित की गई है, जो पूरे परिसर को आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान करती है। श्मशान की दीवारों पर जीवन, मृत्यु और मानव जीवन के विभिन्न चरणों को दर्शाती कलात्मक पेंटिंग बनाई गई हैं। राजा हरिश्चंद्र की कथा सहित कई धार्मिक और प्रेरणादायक चित्रों को भी उकेरा गया है। प्रशासन का कहना है कि इन चित्रों का उद्देश्य शोकाकुल परिवारों को जीवन के दर्शन और मानवीय मूल्यों का संदेश देना है। परिसर में हजारों पौधे लगाए गए हैं और हरियाली विकसित की गई है ताकि वातावरण शांत और स्वच्छ बना रहे।
आधुनिक तकनीक को ध्यान में रखते हुए यहां ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाएगी। लोग वेबसाइट या व्हाट्सएप चैटबॉट के माध्यम से अंतिम संस्कार के लिए स्लॉट बुक कर सकेंगे। इसके साथ ही मुक्ति रथ की बुकिंग और मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए आवेदन जैसी सुविधाएं भी एकीकृत की जा रही हैं। इससे अंतिम समय में परिजनों को होने वाली परेशानियों को कम करने का प्रयास किया गया है इसी बीच राज्य सरकार ने पटना के दीघा क्षेत्र में बिहार का पहला एलपीजी आधारित शवदाह गृह विकसित करने की योजना भी शुरू कर दी है। इस परियोजना का संचालन भी ईशा फाउंडेशन के सहयोग से किया जाएगा। इसके लिए लगभग 2.11 एकड़ जमीन 33 वर्ष की लीज पर नाममात्र एक रुपये में उपलब्ध कराई गई है। यहां एलपीजी आधारित आधुनिक फर्नेस लगाए जाएंगे, जिनमें पारंपरिक धार्मिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए अंतिम संस्कार कराया जाएगा। इसके अलावा मुंगेर जिले के तारापुर क्षेत्र में भी ईशा फाउंडेशन को करीब 15.01 एकड़ जमीन 99 वर्ष की लीज पर एक रुपये के प्रतीकात्मक शुल्क पर देने का प्रस्ताव सामने आया है। सरकार के अनुसार इस भूमि पर सांस्कृतिक, धार्मिक और पर्यटन गतिविधियों से जुड़ा परिसर विकसित किया जाएगा। हालांकि इस फैसले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक पक्ष इसे आधुनिक सुविधाओं के विस्तार के रूप में देख रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सरकारी भूमि और सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग को लेकर सवाल उठा रहा है। बिहार सरकार का कहना है कि राज्य में कुल 40 आधुनिक शवदाह गृह विकसित किए जा रहे हैं, जिनमें से कई का निर्माण पूरा हो चुका है और जल्द ही उन्हें आम लोगों के लिए शुरू किया जाएगा। सरकार का दावा है कि इन परियोजनाओं का उद्देश्य अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को अधिक सम्मानजनक, स्वच्छ, पर्यावरण अनुकूल और व्यवस्थित बनाना है।
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90 करोड़ से बना अत्याधुनिक बांस घाट श्मशान, संचालन ईशा फाउंडेशन को सौंपा
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पटना के गंगा तट स्थित बांस घाट श्मशान घाट को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस कर नया स्वरूप दिया गया है। करीब 90 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस परियोजना को अब संचालन के लिए ईशा फाउंडेशन को सौंप दिया गया है। सरकार की ओर से यह जिम्मेदारी बिना किसी शुल्क के दी गई है। हालांकि यहां अंतिम संस्कार की सेवा निशुल्क नहीं होगी। उपलब्ध व्यवस्थाओं के अनुसार अंतिम संस्कार कराने वाले लोगों को 3500 से 5000 रुपये तक का खर्च वहन करना पड़ सकता है। वहीं शहर के अन्य सरकारी श्मशान घाटों पर पारंपरिक व्यवस्था के तहत काफी कम शुल्क लिया जाता है। इसी वजह से इस परियोजना और इसकी संचालन व्यवस्था को लेकर विभिन्न स्तरों पर चर्चा शुरू हो गई है। करीब 4.5 एकड़ क्षेत्र में फैले इस आधुनिक श्मशान घाट का निर्माण पटना स्मार्ट सिटी लिमिटेड की ओर से कराया गया है। पहले यहां का श्मशान परिसर काफी छोटा था, लेकिन अब इसे विस्तार देकर आधुनिक सुविधाओं से जोड़ा गया है। परिसर में एक समय में 18 शवों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था की गई है। इसके लिए इलेक्ट्रिक शवदाह गृह, आधुनिक वुड क्रीमेशन ओवन और पारंपरिक चिता स्थल तीनों प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं, ताकि लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं और आवश्यकता के अनुसार विकल्प चुन सकें। श्मशान परिसर में चार आधुनिक इलेक्ट्रिक ओवन लगाए गए हैं, जिनमें कम समय में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। इसके अलावा छह विशेष वुड क्रीमेशन ओवन भी तैयार किए गए हैं, जिनमें पारंपरिक चिता की तुलना में कम लकड़ी का उपयोग होता है और प्रदूषण भी कम फैलता है। वहीं आठ पारंपरिक चिता स्थलों की भी व्यवस्था रखी गई है, जहां धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार किया जा सकेगा।
सुविधाओं को देखते हुए यहां आने वाले लोगों के लिए दो वातानुकूलित प्रतीक्षालय भी बनाए गए हैं। शवों को सुरक्षित रखने के लिए आधुनिक मोर्चरी रूम तैयार किया गया है, जिसमें फ्रीजर की व्यवस्था उपलब्ध है। परिसर के भीतर अंतिम संस्कार में उपयोग होने वाली सभी आवश्यक सामग्री के लिए अलग दुकानें बनाई गई हैं। यहां कफन, पूजन सामग्री, लकड़ी, घी, कपूर, अगरबत्ती और अन्य जरूरी सामान एक ही स्थान पर उपलब्ध रहेगा, जिससे परिजनों को अलग-अलग स्थानों पर भटकना नहीं पड़ेगा। इस परियोजना का एक प्रमुख आकर्षण मोक्ष द्वार और बैकुंठ द्वार हैं। लगभग 42 फीट ऊंचे इन दोनों प्रवेश और निकास द्वारों पर कांस्य से निर्मित ओम का प्रतीक स्थापित किया गया है। परिसर के भीतर दो कृत्रिम जलाशय भी बनाए गए हैं, जहां अस्थि विसर्जन और स्नान की व्यवस्था की गई है। इन तालाबों में पाइपलाइन के माध्यम से गंगा का जल पहुंचाया जाता है ताकि सीधे नदी में भीड़ और प्रदूषण दोनों को कम किया जा सके। दोनों जलाशयों के बीच भगवान शिव की भव्य प्रतिमा भी स्थापित की गई है, जो पूरे परिसर को आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान करती है। श्मशान की दीवारों पर जीवन, मृत्यु और मानव जीवन के विभिन्न चरणों को दर्शाती कलात्मक पेंटिंग बनाई गई हैं। राजा हरिश्चंद्र की कथा सहित कई धार्मिक और प्रेरणादायक चित्रों को भी उकेरा गया है। प्रशासन का कहना है कि इन चित्रों का उद्देश्य शोकाकुल परिवारों को जीवन के दर्शन और मानवीय मूल्यों का संदेश देना है। परिसर में हजारों पौधे लगाए गए हैं और हरियाली विकसित की गई है ताकि वातावरण शांत और स्वच्छ बना रहे।
आधुनिक तकनीक को ध्यान में रखते हुए यहां ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाएगी। लोग वेबसाइट या व्हाट्सएप चैटबॉट के माध्यम से अंतिम संस्कार के लिए स्लॉट बुक कर सकेंगे। इसके साथ ही मुक्ति रथ की बुकिंग और मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए आवेदन जैसी सुविधाएं भी एकीकृत की जा रही हैं। इससे अंतिम समय में परिजनों को होने वाली परेशानियों को कम करने का प्रयास किया गया है इसी बीच राज्य सरकार ने पटना के दीघा क्षेत्र में बिहार का पहला एलपीजी आधारित शवदाह गृह विकसित करने की योजना भी शुरू कर दी है। इस परियोजना का संचालन भी ईशा फाउंडेशन के सहयोग से किया जाएगा। इसके लिए लगभग 2.11 एकड़ जमीन 33 वर्ष की लीज पर नाममात्र एक रुपये में उपलब्ध कराई गई है। यहां एलपीजी आधारित आधुनिक फर्नेस लगाए जाएंगे, जिनमें पारंपरिक धार्मिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए अंतिम संस्कार कराया जाएगा। इसके अलावा मुंगेर जिले के तारापुर क्षेत्र में भी ईशा फाउंडेशन को करीब 15.01 एकड़ जमीन 99 वर्ष की लीज पर एक रुपये के प्रतीकात्मक शुल्क पर देने का प्रस्ताव सामने आया है। सरकार के अनुसार इस भूमि पर सांस्कृतिक, धार्मिक और पर्यटन गतिविधियों से जुड़ा परिसर विकसित किया जाएगा। हालांकि इस फैसले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक पक्ष इसे आधुनिक सुविधाओं के विस्तार के रूप में देख रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सरकारी भूमि और सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग को लेकर सवाल उठा रहा है। बिहार सरकार का कहना है कि राज्य में कुल 40 आधुनिक शवदाह गृह विकसित किए जा रहे हैं, जिनमें से कई का निर्माण पूरा हो चुका है और जल्द ही उन्हें आम लोगों के लिए शुरू किया जाएगा। सरकार का दावा है कि इन परियोजनाओं का उद्देश्य अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को अधिक सम्मानजनक, स्वच्छ, पर्यावरण अनुकूल और व्यवस्थित बनाना है।
