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सुप्रीम कोर्ट सख्त, हाईकोर्ट को 3 महीने में फैसला सुनाने के निर्देश
नेशनल डेस्क
जमानत मामलों में देरी पर नाराजगी, सुप्रीम कोर्ट बोला- आदेश उसी दिन या अगले दिन जारी करें
देशभर की अदालतों में लंबित मामलों और फैसलों में हो रही देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अहम निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी भी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसे अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए। अगर तय समय में फैसला नहीं आता है तो संबंधित हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को उस मामले की जानकारी चीफ जस्टिस के सामने रखनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर जमानत याचिकाओं में देरी पर चिंता जताई और कहा कि ऐसे मामलों में आदेश उसी दिन या अगले दिन सुनाया जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने यह टिप्पणी झारखंड से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की। मामले में आरोप लगाया गया था कि हाईकोर्ट में 2022 से फैसला सुरक्षित रखा गया है, लेकिन अब तक फैसला सुनाया नहीं गया। याचिकाकर्ताओं ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया था। उनका कहना था कि समय पर न्याय मिलना भी मौलिक अधिकार का हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान कुल 12 अहम दिशानिर्देश जारी किए। कोर्ट ने कहा कि जमानत, अग्रिम जमानत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में हाईकोर्ट को विशेष तेजी दिखानी चाहिए। अदालत ने कहा कि जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आदेश उसी दिन सुनाया और वेबसाइट पर अपलोड किया जाना चाहिए। यदि किसी कारणवश आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले दिन जारी करना अनिवार्य होगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत या सजा पर रोक से जुड़े आदेश की जानकारी तुरंत जेल प्रशासन तक पहुंचाई जाए ताकि आरोपी को उसी दिन या अगले दिन रिहा किया जा सके। हालांकि यह शर्त रहेगी कि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित न हो और उसने जमानत की शर्तों का उल्लंघन न किया हो। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि फैसलों में अनावश्यक देरी कई बार लोगों की स्वतंत्रता और न्याय प्रक्रिया दोनों को प्रभावित करती है।
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने अपने अनुभव भी साझा किए। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट जज के रूप में अपने 15 साल के कार्यकाल में उन्होंने कभी भी किसी मामले में फैसला लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा। उन्होंने कहा कि न्याय में देरी लोगों का भरोसा कमजोर करती है और इसे सामान्य प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। अदालत ने साफ कहा कि न्याय की कीमत पर देरी स्वीकार नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए भी कई निर्देश दिए हैं। अब हर महीने हाईकोर्ट की वेबसाइट से एक ऑटोमैटिक ई-मेल संबंधित चीफ जस्टिस को भेजा जाएगा, जिसमें उन मामलों की जानकारी होगी जिनमें फैसला सुरक्षित रखा गया है। इसकी कॉपी संबंधित बेंच को भी भेजी जाएगी। यदि फैसले का ऑपरेटिव हिस्सा सुनाए जाने के 15 दिन बाद तक विस्तृत आदेश अपलोड नहीं होता है, तो रजिस्ट्रार जनरल को इसकी जानकारी चीफ जस्टिस को देनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के तीन महीने बाद भी आदेश जारी नहीं होता है, तो संबंधित पक्षकार अदालत में आवेदन देकर फैसला सुनाने की मांग कर सकता है। ऐसे आवेदन पर दो दिन के भीतर सुनवाई करना जरूरी होगा। वहीं यदि तीन महीने और अतिरिक्त एक महीने यानी कुल चार महीने तक फैसला नहीं आता है, तो पक्षकार चीफ जस्टिस से मामले को दूसरी बेंच को सौंपने की मांग कर सकता है।
फैसलों की कॉपी और वेबसाइट पर जानकारी अपडेट करने को लेकर भी कोर्ट ने सख्त निर्देश दिए हैं। अब हर फैसले की सर्टिफाइड कॉपी में यह साफ लिखा जाएगा कि फैसला कब सुरक्षित रखा गया, कब सुनाया गया और वेबसाइट पर कब अपलोड हुआ। हाईकोर्ट की वेबसाइट पर भी यह जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अलावा फैसला अपलोड होते ही पक्षकारों और वकीलों को ई-मेल के जरिए सूचना भेजी जाएगी।
यह पूरा मामला झारखंड हाईकोर्ट में लंबित एक आपराधिक अपील से जुड़ा था। अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़े चार दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि उनकी अपील वर्षों से लंबित है और फैसला सुरक्षित रखे जाने के बावजूद सुनाया नहीं गया। इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की न्यायिक व्यवस्था पर व्यापक टिप्पणी करते हुए ये दिशानिर्देश जारी किए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि संविधान का अनुच्छेद 142 उसे विशेष अधिकार देता है, जिसके तहत अदालत पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए विशेष आदेश जारी कर सकती है। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता बेहद जरूरी है। देश में अदालतों में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट में ही इस समय 92 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं। वहीं देशभर की अदालतों में कुल लंबित मामलों का आंकड़ा करोड़ों में पहुंच चुका है।
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सुप्रीम कोर्ट सख्त, हाईकोर्ट को 3 महीने में फैसला सुनाने के निर्देश
नेशनल डेस्क
देशभर की अदालतों में लंबित मामलों और फैसलों में हो रही देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अहम निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी भी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसे अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए। अगर तय समय में फैसला नहीं आता है तो संबंधित हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को उस मामले की जानकारी चीफ जस्टिस के सामने रखनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर जमानत याचिकाओं में देरी पर चिंता जताई और कहा कि ऐसे मामलों में आदेश उसी दिन या अगले दिन सुनाया जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने यह टिप्पणी झारखंड से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की। मामले में आरोप लगाया गया था कि हाईकोर्ट में 2022 से फैसला सुरक्षित रखा गया है, लेकिन अब तक फैसला सुनाया नहीं गया। याचिकाकर्ताओं ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया था। उनका कहना था कि समय पर न्याय मिलना भी मौलिक अधिकार का हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान कुल 12 अहम दिशानिर्देश जारी किए। कोर्ट ने कहा कि जमानत, अग्रिम जमानत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में हाईकोर्ट को विशेष तेजी दिखानी चाहिए। अदालत ने कहा कि जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आदेश उसी दिन सुनाया और वेबसाइट पर अपलोड किया जाना चाहिए। यदि किसी कारणवश आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले दिन जारी करना अनिवार्य होगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत या सजा पर रोक से जुड़े आदेश की जानकारी तुरंत जेल प्रशासन तक पहुंचाई जाए ताकि आरोपी को उसी दिन या अगले दिन रिहा किया जा सके। हालांकि यह शर्त रहेगी कि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित न हो और उसने जमानत की शर्तों का उल्लंघन न किया हो। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि फैसलों में अनावश्यक देरी कई बार लोगों की स्वतंत्रता और न्याय प्रक्रिया दोनों को प्रभावित करती है।
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने अपने अनुभव भी साझा किए। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट जज के रूप में अपने 15 साल के कार्यकाल में उन्होंने कभी भी किसी मामले में फैसला लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा। उन्होंने कहा कि न्याय में देरी लोगों का भरोसा कमजोर करती है और इसे सामान्य प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। अदालत ने साफ कहा कि न्याय की कीमत पर देरी स्वीकार नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए भी कई निर्देश दिए हैं। अब हर महीने हाईकोर्ट की वेबसाइट से एक ऑटोमैटिक ई-मेल संबंधित चीफ जस्टिस को भेजा जाएगा, जिसमें उन मामलों की जानकारी होगी जिनमें फैसला सुरक्षित रखा गया है। इसकी कॉपी संबंधित बेंच को भी भेजी जाएगी। यदि फैसले का ऑपरेटिव हिस्सा सुनाए जाने के 15 दिन बाद तक विस्तृत आदेश अपलोड नहीं होता है, तो रजिस्ट्रार जनरल को इसकी जानकारी चीफ जस्टिस को देनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के तीन महीने बाद भी आदेश जारी नहीं होता है, तो संबंधित पक्षकार अदालत में आवेदन देकर फैसला सुनाने की मांग कर सकता है। ऐसे आवेदन पर दो दिन के भीतर सुनवाई करना जरूरी होगा। वहीं यदि तीन महीने और अतिरिक्त एक महीने यानी कुल चार महीने तक फैसला नहीं आता है, तो पक्षकार चीफ जस्टिस से मामले को दूसरी बेंच को सौंपने की मांग कर सकता है।
फैसलों की कॉपी और वेबसाइट पर जानकारी अपडेट करने को लेकर भी कोर्ट ने सख्त निर्देश दिए हैं। अब हर फैसले की सर्टिफाइड कॉपी में यह साफ लिखा जाएगा कि फैसला कब सुरक्षित रखा गया, कब सुनाया गया और वेबसाइट पर कब अपलोड हुआ। हाईकोर्ट की वेबसाइट पर भी यह जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अलावा फैसला अपलोड होते ही पक्षकारों और वकीलों को ई-मेल के जरिए सूचना भेजी जाएगी।
यह पूरा मामला झारखंड हाईकोर्ट में लंबित एक आपराधिक अपील से जुड़ा था। अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़े चार दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि उनकी अपील वर्षों से लंबित है और फैसला सुरक्षित रखे जाने के बावजूद सुनाया नहीं गया। इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की न्यायिक व्यवस्था पर व्यापक टिप्पणी करते हुए ये दिशानिर्देश जारी किए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि संविधान का अनुच्छेद 142 उसे विशेष अधिकार देता है, जिसके तहत अदालत पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए विशेष आदेश जारी कर सकती है। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता बेहद जरूरी है। देश में अदालतों में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट में ही इस समय 92 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं। वहीं देशभर की अदालतों में कुल लंबित मामलों का आंकड़ा करोड़ों में पहुंच चुका है।
