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भारत में नया श्रम संहिता (New Labour Codes) : एक ऐतिहासिक सुधार
डिजिटल डेस्क
भारत में नया श्रम संहिता (New Labour Codes) एक ऐतिहासिक सुधार है, जिसने देश के श्रम कानूनों को आधुनिक, सरल और श्रमिक-अनुकूल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। केंद्र सरकार ने 21 नवंबर 2025 से चार श्रम संहिताओं को प्रभावी कर दिया है, जो पुराने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों की जगह ले रही हैं। मार्च 2026 में ये संहिताएं प्रभावी हैं, लेकिन पूर्ण क्रियान्वयन (विस्तृत नियमों सहित) 1 अप्रैल 2026 से अपेक्षित है, जब अधिकांश प्रावधान देशव्यापी रूप से लागू होंगे।
पुराने श्रम कानूनों का पृष्ठभूमि ( Backgorund)
भारत के श्रम कानूनों की शुरुआत ब्रिटिश काल से हुई थी। पहला प्रमुख कानून फैक्टरियां एक्ट, 1881 था, जिसमें कार्य घंटों और बच्चों के काम पर कुछ सीमाएं लगाई गईं। आजादी के बाद 1920-1950 के दशक में कई कानून बने, जैसे:
- ट्रेड यूनियंस एक्ट, 1926
- पेमेंट ऑफ वेजेस एक्ट, 1936
- इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947
- फैक्टरियां एक्ट, 1948
- मिनिमम वेजेस एक्ट, 1948
- एम्प्लॉयीज़ प्रॉविडेंट फंड एक्ट, 1952
- मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1961
- पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972
और कई अन्य। कुल मिलाकर केंद्र स्तर पर 44 से अधिक और राज्य स्तर पर 100 से ज्यादा श्रम कानून थे, लेकिन नई संहिताओं ने मुख्य रूप से 29 केंद्रीय कानूनों को समेकित किया। ये कानून अलग-अलग विषयों पर बने थे — वेतन, औद्योगिक विवाद, सामाजिक सुरक्षा, कार्यस्थल सुरक्षा आदि — लेकिन समय के साथ वे पुराने, जटिल, बिखरे हुए और परस्पर असंगत हो गए।
पुराने कानूनों की प्रमुख समस्याएं
- जटिलता और बहुतायत — कई कानूनों में अलग-अलग परिभाषाएं (जैसे 'कर्मचारी', 'वेतन' आदि), जिससे अनुपालन मुश्किल।
- उच्च अनुपालन बोझ — नियोक्ताओं को दर्जनों रजिस्ट्रेशन, अलग-अलग रिटर्न फाइल करने पड़ते थे।
- खराब प्रवर्तन — कानूनों का क्रियान्वयन कमजोर, विशेषकर असंगठित क्षेत्र में।
- आधुनिक अर्थव्यवस्था से मेल न खाना — गिग वर्कर्स, प्लेटफॉर्म वर्कर्स, आईटी सेक्टर आदि नए रोजगार रूपों के लिए कोई प्रावधान नहीं।
- उद्योगों के लिए बाधा — कठोर छंटनी नियम (जैसे 100 कर्मचारियों से अधिक वाली कंपनियों को सरकार की अनुमति जरूरी) निवेश और रोजगार सृजन में रुकावट।
- श्रमिकों की अपर्याप्त सुरक्षा — असंगठित क्षेत्र के करोड़ों श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता था।
इन समस्याओं के कारण भारत के श्रम बाजार में सुधार की मांग दशकों से थी। दूसरी राष्ट्रीय श्रम आयोग (2002) ने भी संहिताकरण की सिफारिश की थी, लेकिन क्रियान्वयन में देरी हुई।
चार मुख्य श्रम संहिताएं (जिनमें पुराने कानून समाहित)
- मजदूरी संहिता, 2019 — 4 पुराने कानूनों (पेमेंट ऑफ वेजेस एक्ट 1936, मिनिमम वेजेस एक्ट 1948, बोनस एक्ट 1965, इक्वल रेम्यूनरेशन एक्ट 1976) को मिलाकर।
- औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 — 3 प्रमुख कानून (ट्रेड यूनियंस एक्ट 1926, इंडस्ट्रियल एम्प्लॉयमेंट स्टैंडिंग ऑर्डर्स एक्ट 1946, इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट 1947)।
- सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 — 9 कानून (जैसे ESI 1948, EPF 1952, ग्रेच्युटी 1972, अनऑर्गनाइज्ड वर्कर्स एक्ट 2008 आदि)।
- व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियां संहिता, 2020 — फैक्टरियां एक्ट 1948, माइंस एक्ट 1952, प्लांटेशन्स एक्ट आदि कई कानून।
प्रमुख बदलाव और प्रावधान
- न्यूनतम वेतन की गारंटी — सभी श्रमिकों (संगठित और असंगठित क्षेत्र) के लिए सार्वभौमिक न्यूनतम वेतन। लैंगिक भेदभाव प्रतिबंधित, ओवरटाइम पर दोगुना वेतन।
- वेतन संरचना में बदलाव (50% नियम) — कुल वेतन में बेसिक + डियरनेस अलाउंस कम से कम 50% होना चाहिए, जिससे PF, ग्रेच्युटी आदि लाभ बढ़ेंगे।
- ग्रेच्युटी में सुधार — फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों को भी 1 साल की सेवा के बाद ग्रेच्युटी का अधिकार।
- पूर्ण और अंतिम निपटान — इस्तीफा या समाप्ति पर 2 कार्य दिवसों के अंदर सभी बकाया का भुगतान अनिवार्य।
- गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स — सामाजिक सुरक्षा (PF, ESI, स्वास्थ्य बीमा) का लाभ।
- छंटनी में आसानी — 300 कर्मचारियों तक वाली कंपनियों को बिना पूर्व अनुमति छंटनी की छूट।
- एक ही रजिस्ट्रेशन और रिटर्न — अनुपालन आसान, डिजिटल सिस्टम।
क्रियान्वयन की स्थिति (मार्च 2026)
21 नवंबर 2025 से संहिताएं प्रभावी हैं। दिसंबर 2025 में ड्राफ्ट नियम जारी हुए, जनवरी-फरवरी 2026 तक सुझाव मंगवाए गए। अप्रैल 2026 से पूर्ण रूप से लागू होने की संभावना है, जिसमें केंद्रीय और राज्य नियम अंतिम रूप से लागू होंगे। कुछ राज्य अभी नियम अंतिम रूप दे रहे हैं।
लाभ और चुनौतियां
लाभ:
- श्रमिकों को मजबूत सुरक्षा, विशेषकर असंगठित और गिग वर्कर्स को।
- कंपनियों के लिए अनुपालन आसान, एकल लाइसेंस।
- निवेश बढ़ाने और 'आत्मनिर्भर भारत' में योगदान।
चुनौतियां:
- कुछ ट्रेड यूनियनों का विरोध (उद्योगपति-अनुकूल मानते हैं)।
- सैलरी स्ट्रक्चर बदलने में अतिरिक्त खर्च।
- राज्यों में अलग-अलग क्रियान्वयन से शुरुआती भ्रम।
निष्कर्ष में, नए श्रम संहिता भारत के श्रम बाजार को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और न्यायपूर्ण बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यह करोड़ों श्रमिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने का वादा करता है, साथ ही उद्योगों को नई गति देता है। सरकार और नियोक्ताओं को मिलकर इसका सही क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा ताकि 'सबका साथ, सबका विकास' का लक्ष्य हासिल हो सके।
Article By
CA Rajeev Kumar
B.com(H) , FCA, L.L.B
Business Setup and Startup Consultant
15 year experience in Business set up
Founder of taxsanjivani.com
Con : 9650989444/ Rajeev@fcarajeev.com
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