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Trump का H-1B शिकंजा अमेरिका की Innovation को पहुंचा सकता है नुकसान
Digital Desk
Trump प्रशासन की H-1B और वीजा नीतियों पर विशेषज्ञ स्टीफन येल-लोहर ने चिंता जताई। जानिए भारतीय छात्रों और पेशेवरों पर संभावित असर।
इमिग्रेशन विशेषज्ञ स्टीफन येल-लोहर ने चेताया कि H-1B वीजा पर सख्ती और व्यापक आव्रजन प्रतिबंध अमेरिका की वैश्विक प्रतिभा आकर्षित करने की क्षमता को कमजोर कर सकते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आव्रजन नीति अब केवल अवैध प्रवासियों तक सीमित नहीं रह गई है। इमिग्रेशन कानून विशेषज्ञ स्टीफन येल-लोहर के मुताबिक, प्रशासन की मौजूदा नीतियों का असर कानूनी प्रवासियों, अंतरराष्ट्रीय छात्रों और कुशल विदेशी कामगारों पर भी पड़ रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि H-1B वीजा कार्यक्रम पर बढ़ती सख्ती अमेरिकी कंपनियों की प्रतिभा हासिल करने की क्षमता और देश की तकनीकी प्रतिस्पर्धा को नुकसान पहुंचा सकती है।
कॉर्नेल लॉ स्कूल के सेवानिवृत्त प्रोफेसर येल-लोहर ने Firstpost को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि मौजूदा नीति आव्रजन व्यवस्था में व्यापक सुधार के बजाय कानूनी और अवैध, दोनों तरह के आव्रजन को सीमित करने की दिशा में बढ़ रही है।
Trump ने बढ़ाया Immigration Crackdown
येल-लोहर के अनुसार, ट्रंप के पहले कार्यकाल और मौजूदा प्रशासन की नीतियों में सबसे बड़ा अंतर उनके दायरे का है। पहले कार्यकाल में जोर मुख्य रूप से अवैध प्रवासन, सीमा सुरक्षा और निर्वासन पर था। इस बार कानूनी आव्रजन के रास्ते भी अधिक जांच और प्रतिबंधों के दायरे में आ गए हैं।
इस बदलाव का असर विदेशी कर्मचारियों, छात्रों, विश्वविद्यालयों और उन अमेरिकी कंपनियों पर पड़ सकता है जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिभाओं पर निर्भर हैं।
भारतीय पेशेवरों के लिए यह मुद्दा खास महत्व रखता है। भारत लंबे समय से H-1B वीजा के सबसे बड़े लाभार्थियों में शामिल रहा है और बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर तकनीक, इंजीनियरिंग और अन्य विशेषज्ञ क्षेत्रों में अमेरिकी कंपनियों के लिए काम करते हैं।
H-1B Rules पर बढ़ा दबाव
H-1B कार्यक्रम अमेरिकी कंपनियों को विशेष कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की अनुमति देता है। मौजूदा व्यवस्था के तहत हर साल 65,000 सामान्य H-1B वीजा उपलब्ध होते हैं, जबकि अमेरिकी संस्थानों से उन्नत डिग्री हासिल करने वाले विदेशी नागरिकों के लिए अतिरिक्त 20,000 वीजा निर्धारित हैं।
प्रशासन की ओर से H-1B कार्यक्रम पर कई सख्त कदम उठाए गए हैं या प्रस्तावित किए गए हैं। इनमें कुछ नए H-1B आवेदनों से जुड़ा 100,000 डॉलर का शुल्क सबसे विवादित प्रस्तावों में शामिल रहा है।
इन बदलावों ने अमेरिकी नियोक्ताओं और विदेशी पेशेवरों के बीच लागत और भविष्य की अनिश्चितता को लेकर चिंता बढ़ाई है। येल-लोहर का तर्क है कि ऐसे कदम कार्यक्रम में बुनियादी सुधार करने के बजाय उसके आकार और पहुंच को सीमित कर सकते हैं।
Legal Challenges की संभावना
येल-लोहर ने संकेत दिया कि प्रशासन की कुछ आव्रजन नीतियों को संघीय अदालतों में चुनौती मिल सकती है। अमेरिका में आव्रजन व्यवस्था कांग्रेस के कानूनों, राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियों और प्रशासनिक नियमों के जटिल ढांचे पर आधारित है।
यदि प्रशासनिक एजेंसियां मौजूदा कानून की सीमा से आगे जाकर नए प्रतिबंध लागू करती हैं, तो प्रभावित व्यक्ति, विश्वविद्यालय या कंपनियां अदालत का रुख कर सकती हैं।
ऐसे मामलों में अदालतों की भूमिका यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है कि कार्यपालिका आव्रजन नीति में कितनी दूर तक बदलाव कर सकती है।
Indian Students पर असर
H-1B विवाद का असर केवल विदेशी कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। अमेरिका में पढ़ाई करने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों को भी वीजा प्रक्रिया में अतिरिक्त जांच का सामना करना पड़ सकता है।
येल-लोहर के अनुसार, F-1 वीजा के लिए आवेदन करने वाले छात्रों को लंबी प्रक्रिया, अतिरिक्त पृष्ठभूमि जांच और सोशल मीडिया से जुड़ी जांच का सामना करना पड़ सकता है। इससे अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करने की योजना बनाने वाले विदेशी छात्रों के लिए अनिश्चितता बढ़ सकती है।
भारतीय छात्रों के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के सबसे बड़े स्रोत देशों में शामिल है।
CPT Rules ने बढ़ाई चिंता
अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए Curricular Practical Training (CPT) भी चिंता का एक क्षेत्र बन सकता है। CPT योग्य छात्रों को उनके शैक्षणिक कार्यक्रम से जुड़े व्यावहारिक कार्य का अनुभव हासिल करने की अनुमति देता है।
येल-लोहर ने कहा कि CPT की पात्रता को लेकर आव्रजन अधिकारियों का रुख अधिक सख्त हो रहा है। उनके मुताबिक, कुछ परिस्थितियों में प्रशिक्षण का छात्र के प्रमुख विषय का अनिवार्य हिस्सा होना जरूरी माना जा सकता है, जबकि पहले वैकल्पिक व्यावहारिक प्रशिक्षण की गुंजाइश अधिक थी।
इसका असर कंप्यूटर साइंस, इंजीनियरिंग और अन्य तकनीकी क्षेत्रों के छात्रों के इंटर्नशिप अवसरों पर पड़ सकता है।
US Innovation को खतरा
येल-लोहर की मुख्य चिंता आर्थिक प्रभाव को लेकर है। अमेरिका की तकनीकी कंपनियां, विश्वविद्यालय, अस्पताल और शोध संस्थान दशकों से दुनिया भर से कुशल कर्मचारियों और छात्रों को आकर्षित करते रहे हैं।
यदि वीजा नियम लगातार कठिन और अनिश्चित होते गए, तो कुछ प्रतिभाशाली पेशेवर और छात्र अमेरिका के बजाय कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया या अन्य देशों को प्राथमिकता दे सकते हैं।
इससे अमेरिकी संस्थानों के लिए वैश्विक प्रतिभा का उपलब्ध पूल छोटा हो सकता है। खासकर तकनीक और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में इसका दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।
America के लिए बड़ा सवाल
येल-लोहर के मुताबिक, कानूनी आव्रजन को सीमित करने की नीति अंततः अमेरिका के अपने आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचा सकती है। उनका तर्क है कि प्रशासन व्यापक आव्रजन सुधार लागू करने के बजाय पहले से मौजूद कानूनी रास्तों को संकुचित कर रहा है।
H-1B व्यवस्था में बदलाव का असर केवल वीजा धारकों तक सीमित नहीं रहेगा। अमेरिकी कंपनियों को भर्ती में मुश्किल हो सकती है और विश्वविद्यालयों को अंतरराष्ट्रीय छात्रों तथा शोधकर्ताओं को आकर्षित करने में प्रतिस्पर्धी नुकसान हो सकता है।
भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए भी यह बदलाव अमेरिका में पढ़ाई, रोजगार और दीर्घकालिक करियर की योजनाओं को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में आने वाले महीनों में H-1B नियमों, अदालतों में संभावित चुनौतियों और प्रशासन की आगे की आव्रजन नीति पर दुनिया की नजर रहेगी।
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