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यूपी में ड्राइविंग लाइसेंस टेंडर पर मचा बवाल, पारदर्शिता और डेटा सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल
Jagran Desk
उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग की ड्राइविंग लाइसेंस निर्माण से जुड़ी नई निविदा अब विवादों के घेरे में है। शुरुआत से ही इस टेंडर को लेकर पारदर्शिता, पात्रता और डेटा सुरक्षा पर सवाल उठ रहे थे, और अब एक प्रमुख कंपनी के पीछे हटने से इस विवाद ने और गहराई ले ली है।
सूत्रों के अनुसार, निविदा में भाग लेने वाली एक बड़ी कंपनी ने निर्धारित दरों को “अव्यावहारिक और घाटे वाला” बताते हुए निविदा से नाम वापस ले लिया है। कंपनी का कहना है कि इन शर्तों पर काम करना संभव नहीं है, जिससे पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर संदेह खड़ा हो गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब एक सक्षम कंपनी दरों को अनुपयोगी बताकर पीछे हट जाती है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बाकी दो कंपनियाँ इन शर्तों पर कैसे काम करेंगी? क्या इसके पीछे कोई अनुचित लाभ या भ्रष्टाचार की संभावना तो नहीं?
पिछले वर्षों में राज्य सरकार ने ड्राइविंग लाइसेंस निर्माण के लिए उन्हीं कंपनियों को चुना जिनके पास अपने उत्पादन संयंत्र (manufacturing units) थे, ताकि डेटा सुरक्षा और सिस्टम की जवाबदेही बनी रहे। लेकिन इस बार चयनित कंपनियों के पास न तो अपना निर्माण संयंत्र है और न ही स्थापित डेटा सुरक्षा संरचना। इसका मतलब है कि वे लाइसेंस निर्माण का कार्य आउटसोर्स करेंगी — जो नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकता है।
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि इस व्यवस्था में डेटा लीक और प्राइवेट एजेंसियों द्वारा दुरुपयोग का खतरा बढ़ जाता है। यदि इन कंपनियों को सीधे आरटीओ कार्यालयों में कार्य करने की अनुमति दी जाती है, तो यह प्रणाली पुराने दलाल तंत्र और रिश्वतखोरी की वापसी का मार्ग खोल सकती है — वह प्रणाली जिसे खत्म करने के लिए ही स्मार्ट कार्ड सिस्टम शुरू किया गया था।
फिलहाल सरकार की ओर से इस पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है। नागरिकों और विशेषज्ञों दोनों ने इस मुद्दे पर जांच और पुनर्विचार की मांग की है। मामला अब केवल निविदा प्रक्रिया का नहीं, बल्कि जनता के भरोसे और डेटा सुरक्षा का भी बन चुका है।
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विशेषज्ञों का कहना है कि जब एक सक्षम कंपनी दरों को अनुपयोगी बताकर पीछे हट जाती है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बाकी दो कंपनियाँ इन शर्तों पर कैसे काम करेंगी? क्या इसके पीछे कोई अनुचित लाभ या भ्रष्टाचार की संभावना तो नहीं?
पिछले वर्षों में राज्य सरकार ने ड्राइविंग लाइसेंस निर्माण के लिए उन्हीं कंपनियों को चुना जिनके पास अपने उत्पादन संयंत्र (manufacturing units) थे, ताकि डेटा सुरक्षा और सिस्टम की जवाबदेही बनी रहे। लेकिन इस बार चयनित कंपनियों के पास न तो अपना निर्माण संयंत्र है और न ही स्थापित डेटा सुरक्षा संरचना। इसका मतलब है कि वे लाइसेंस निर्माण का कार्य आउटसोर्स करेंगी — जो नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकता है।
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि इस व्यवस्था में डेटा लीक और प्राइवेट एजेंसियों द्वारा दुरुपयोग का खतरा बढ़ जाता है। यदि इन कंपनियों को सीधे आरटीओ कार्यालयों में कार्य करने की अनुमति दी जाती है, तो यह प्रणाली पुराने दलाल तंत्र और रिश्वतखोरी की वापसी का मार्ग खोल सकती है — वह प्रणाली जिसे खत्म करने के लिए ही स्मार्ट कार्ड सिस्टम शुरू किया गया था।
फिलहाल सरकार की ओर से इस पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है। नागरिकों और विशेषज्ञों दोनों ने इस मुद्दे पर जांच और पुनर्विचार की मांग की है। मामला अब केवल निविदा प्रक्रिया का नहीं, बल्कि जनता के भरोसे और डेटा सुरक्षा का भी बन चुका है।
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