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कैसे बनेंगे हमारे शहर बुजुर्गों के लायक ?
opinion
वृद्धावस्था: अक्सर खराब स्वास्थ्य के साथ देखभाल की जिम्मेदारी से भी जूझती नजर आती हैं बुजुर्ग महिलाएं
प्रो. एलन पी. उगरगोल
एसोसिएट प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस, पब्लिक पॉलिसी, आइआइएम बेंगलूरु
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भारत एक साथ शहरीकरण और वृद्धावस्था की ओर तेजी से बढ़ रहा है। समय, स्थान और परिवेश के अनुसार जनसांख्यिकी और सामाजिक-आर्थिक कारक जनसंख्या के ढांचे को बदलने का कारण बन रहे हैं। अनुमान है कि 2036 तक भारत की 40 प्रतिशत आबादी शहरों में निवास कर रही होगी। वहीं, बुजुर्गों की आबादी 2050 तक दोगुनी होकर कुल आबादी का लगभग 20 प्रतिशत हो जाएगी। 2011 की जनगणना के अनुसार वृद्ध महिलाओं की संख्या 7.10 करोड़ और वृद्ध पुरुषों की संख्या 6.70 करोड़ थी। 2050 तक वृद्ध महिलाओं की संख्या वृद्ध पुरुषों से एक करोड़ 84 लाख अधिक हो जाने का अनुमान है। महिलाएं आमतौर पर अपने पतियों से अधिक समय तक जीवित रहती हैं। इसका कारण चाहे जीवन प्रत्याशा में वृद्धि हो या फिर पति-पत्नी के बीच उम्र का अंतर। पुरुष सौभाग्यशाली होते हैं कि उन्हें बुढ़ापे में जीवनसाथी का साथ मिलता है, वहीं पत्नियों और विधवाओं को खुद ही अपना ख्याल रखना पड़ता है। उन्हें अपने बेटों पर निर्भर रहना पड़ता है, बुढ़ापे में भी काम करना पड़ता है या वे सरकारी मदद पर निर्भर होती हैं। दुर्भाग्य से महिलाओं के जीवन का यह हिस्सा अक्सर खराब स्वास्थ्य, बुढ़ापे की शारीरिक लाचारी, देखभाल का बोझ, निरक्षरता, गरीबी, बढ़ती आर्थिक निर्भरता, सामाजिक दूरी, बुजुर्गों से दुव्र्यवहार और लैंगिक भेदभाव के साथ बीतता है।
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भारत एक साथ शहरीकरण और वृद्धावस्था की ओर तेजी से बढ़ रहा है। समय, स्थान और परिवेश के अनुसार जनसांख्यिकी और सामाजिक-आर्थिक कारक जनसंख्या के ढांचे को बदलने का कारण बन रहे हैं। अनुमान है कि 2036 तक भारत की 40 प्रतिशत आबादी शहरों में निवास कर रही होगी। वहीं, बुजुर्गों की आबादी 2050 तक दोगुनी होकर कुल आबादी का लगभग 20 प्रतिशत हो जाएगी। 2011 की जनगणना के अनुसार वृद्ध महिलाओं की संख्या 7.10 करोड़ और वृद्ध पुरुषों की संख्या 6.70 करोड़ थी। 2050 तक वृद्ध महिलाओं की संख्या वृद्ध पुरुषों से एक करोड़ 84 लाख अधिक हो जाने का अनुमान है। महिलाएं आमतौर पर अपने पतियों से अधिक समय तक जीवित रहती हैं। इसका कारण चाहे जीवन प्रत्याशा में वृद्धि हो या फिर पति-पत्नी के बीच उम्र का अंतर। पुरुष सौभाग्यशाली होते हैं कि उन्हें बुढ़ापे में जीवनसाथी का साथ मिलता है, वहीं पत्नियों और विधवाओं को खुद ही अपना ख्याल रखना पड़ता है। उन्हें अपने बेटों पर निर्भर रहना पड़ता है, बुढ़ापे में भी काम करना पड़ता है या वे सरकारी मदद पर निर्भर होती हैं। दुर्भाग्य से महिलाओं के जीवन का यह हिस्सा अक्सर खराब स्वास्थ्य, बुढ़ापे की शारीरिक लाचारी, देखभाल का बोझ, निरक्षरता, गरीबी, बढ़ती आर्थिक निर्भरता, सामाजिक दूरी, बुजुर्गों से दुव्र्यवहार और लैंगिक भेदभाव के साथ बीतता है।
