हिमालय : भारत की आत्मा, सभ्यता की शाश्वत धरोहर

डॉ रमेश पोखरियाल 'निशंक'

On

हिमालय को केवल देखा नहीं जा सकता, उसे अनुभव करना पड़ता है। उसकी हिमाच्छादित चोटियाँ प्रकृति की भव्यता भर नहीं, भारत की आत्मा पर अंकित वह शाश्वत आख्यान हैं, जिसमें हमारी सभ्यता, संस्कृति, अध्यात्म और जीवन-दर्शन सहस्राब्दियों से प्रवाहित हैं। उसकी नीरवता में ऋषियों की तपस्या की अनुगूँज है, उसकी घाटियों में लोकजीवन की सहज लय है और उसकी गोद से निकलने वाली नदियों में करोड़ों जीवनों की धड़कन।

9 सितंबर का हिमालय दिवस इसी विराट चेतना के पुनर्स्मरण का अवसर है। यह केवल पर्वतों के संरक्षण का दिवस नहीं, बल्कि उस प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का दिन है, जिसने हमें जल, वन, औषधियाँ, जैव-विविधता और जीवन का आधार दिया। हिमालय हमारे लिए भूगोल से कहीं अधिक है—वह हमारी सांस्कृतिक स्मृति, आध्यात्मिक आस्था और सभ्यतागत पहचान का जीवंत प्रतीक है।

उत्तराखंड तो हिमालय की गोद में बसा वह प्रदेश है, जहाँ हिमालय केवल दिखाई नहीं देता, जीवन के प्रत्येक स्पंदन में अनुभव होता है। यहाँ की नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, आस्था की अविरल धाराएँ हैं; देवदार और बुरांश के वन केवल हरियाली नहीं, लोकजीवन की साँस हैं; और यहाँ के गाँव केवल बस्तियाँ नहीं, पीढ़ियों से संचित संस्कृति और स्मृतियों के जीवंत केंद्र हैं। केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे तीर्थ हिमालय को प्रकृति और अध्यात्म के अद्वितीय संगम में रूपांतरित करते हैं।

जब मैं उत्तराखंड का मुख्यमंत्री था, तब हिमालयी जीवन को निकट से देखने और उसकी चुनौतियों को समझने का अवसर मिला। तभी यह अनुभूति और दृढ़ हुई कि हिमालय का विकास मैदानों के विकास की कसौटी पर नहीं किया जा सकता। हिमालय की अपनी भौगोलिक संरचना, पारिस्थितिकी, जलवायु और वहन क्षमता है। इसलिए यहाँ विकास की दृष्टि भी हिमालय की प्रकृति के अनुरूप होनी चाहिए। पहाड़ को उसकी प्रकृति से काटकर नहीं, उसकी प्रकृति को समझकर विकसित करना होगा।

Also Read:  AI और CGI से बदल रहा सिनेमा: क्या डिजिटल एक्टर्स और AI स्क्रिप्ट राइटर्स इंसानी रचनात्मकता पर भारी पड़ेंगे?

इसी विचार को व्यापक जनचेतना से जोड़ने की दिशा में मेरे कार्यकाल में प्रख्यात पर्यावरणविद् डॉ. अनिल प्रकाश जोशी के प्रयासों से 9 सितंबर को हिमालय दिवस के रूप में मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई। मूल भावना यही थी कि हिमालय को केवल संसाधनों के भंडार के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र और हमारी सामूहिक जीवनधारा के रूप में समझा जाए।

Also Read:  दोस्ती क्यों हो रही है कम? क्या एडल्ट लाइफ में रिश्तों की जगह प्रोफेशनल नेटवर्किंग ले रही है

आज वर्ष 2026 में यह चेतना पहले से कहीं अधिक आवश्यक है। जलवायु परिवर्तन, हिमनदों में परिवर्तन, अनियमित वर्षा, अतिवृष्टि, भूस्खलन और जैव-विविधता पर बढ़ता दबाव हिमालय की संवेदनशीलता को रेखांकित कर रहे हैं। उत्तराखंड में घटित अनेक प्राकृतिक घटनाएँ हमें बार-बार यह संदेश देती हैं कि प्रकृति की मर्यादाओं की उपेक्षा करके विकास की कोई भी यात्रा दीर्घकालिक नहीं हो सकती।

Also Read:  फिजिकल बुक्स या ई-रीडर्स: पढ़ने और समझने के लिए कौन सा तरीका बेहतर है?

हिमालय की गोद से निकलने वाली गंगा, यमुना और असंख्य जलधाराएँ उत्तराखंड से निकलकर दूर-दूर तक जीवन का संचार करती हैं। पहाड़ का कोई छोटा-सा जलस्रोत सूखता है तो उसका प्रभाव केवल एक गाँव तक सीमित नहीं रहता। किसी माँ के लिए वह पानी भरने की बढ़ती दूरी है, किसी किसान के लिए सूखती फसल है और किसी गाँव के लिए अपने भविष्य पर मंडराता प्रश्न है। हिमालय का संरक्षण इसलिए केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, मनुष्य की गरिमा और जीवन की सुरक्षा का प्रश्न भी है।

उत्तराखंड के पहाड़ी समाज ने सदियों से प्रकृति के साथ सहजीवन का संस्कार सँजोया है। उसके लोकगीतों में नदियाँ हैं, लोककथाओं में वन हैं और जीवन-पद्धति में जल, जंगल और जमीन के प्रति आत्मीयता है। इस पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़कर हम हिमालय के लिए अधिक संवेदनशील और टिकाऊ विकास का मार्ग बना सकते हैं। स्थानीय कृषि, औषधीय वनस्पतियाँ, प्राकृतिक उत्पाद, हस्तशिल्प, योग, आयुर्वेद और प्रकृति-आधारित पर्यटन उत्तराखंड के युवाओं के लिए आजीविका के नए अवसर बन सकते हैं।

हमें विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का विरोधी मानने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा। उत्तराखंड को सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और रोजगार चाहिए, लेकिन ऐसा विकास चाहिए जो पर्वत की वहन क्षमता और प्रकृति की मर्यादा का सम्मान करे। विकास का अंतिम उद्देश्य यह होना चाहिए कि पहाड़ का युवा अपनी मिट्टी छोड़ने के लिए विवश न हो और पहाड़ के गाँवों में जीवन की लौ निरंतर जलती रहे।

हिमालय हमें एक गहरा जीवन-दर्शन भी देता है। उसकी ऊँचाइयाँ विनम्रता सिखाती हैं, उसकी नदियाँ निरंतर प्रवाह का संदेश देती हैं और उसकी शिलाएँ धैर्य का पाठ पढ़ाती हैं। शायद इसीलिए हिमालय में साधना करने वाले ऋषियों ने प्रकृति में केवल सौंदर्य नहीं देखा, उसमें सत्य का साक्षात्कार किया।

आज हिमालय दिवस पर हमें स्वयं से एक प्रश्न पूछना होगा—हम आने वाली पीढ़ियों को कैसा हिमालय सौंपेंगे? ऐसा हिमालय जिसकी नदियाँ केवल स्मृतियों में रह जाएँ, जिसके जंगल केवल चित्रों में दिखाई दें और जिसके गाँव धीरे-धीरे मौन हो जाएँ? या ऐसा हिमालय, जहाँ नदियाँ अविरल हों, जंगल जीवंत हों, गाँव आबाद हों और मनुष्य तथा प्रकृति के बीच आत्मीयता का संबंध बना रहे?

मेरा विश्वास है कि उत्तराखंड यदि हिमालय को समझकर आगे बढ़ेगा, तो वह केवल अपने लिए नहीं, पूरे देश के लिए विकास और पर्यावरण के संतुलन का एक आदर्श प्रस्तुत कर सकता है। हमें हिमालय से केवल लेना नहीं, उसे लौटाना भी सीखना होगा।

इस हिमालय दिवस पर हमारा संकल्प केवल हिमालय को बचाने का न हो; हमारा संकल्प ऐसी विकास-दृष्टि का हो, जिसमें हिमालय स्वयं सुरक्षित विकास का मार्गदर्शक बने। क्योंकि हिमालय की रक्षा करना केवल पर्वतों की रक्षा नहीं है—यह हमारी नदियों, हमारे गाँवों, हमारी लोक-संस्कृति, हमारी आस्था और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा है।

हिमालय केवल उत्तराखंड के मस्तक का मुकुट नहीं, भारत की आत्मा का प्रहरी है। उसकी हिमधवल चोटियों की रक्षा में ही हमारी जीवनधारा की निर्मलता और हमारी सभ्यता की अविरलता सुरक्षित है।

दैनिक जागरण से जुड़ें:

देश-प्रदेश की ताज़ा ख़बरों को सबसे पहले पढ़ने के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल को फॉलो करें:

नवीनतम समाचार

पाकिस्तान क्रिकेट में अनुशासन विवाद, खिलाड़ियों के व्यवहार को लेकर PCB ने शुरू की जांच

इंग्लैंड दौरे के दौरान उठे सवालों के बाद बोर्ड की कार्रवाई, 7 खिलाड़ियों को हटाने और फोन जब्त करने की...
स्पोर्ट्स 
पाकिस्तान क्रिकेट में अनुशासन विवाद, खिलाड़ियों के व्यवहार को लेकर PCB ने शुरू की जांच

US ओपन में बड़ा उलटफेर, झेंग क्विनवेन ने स्वियातेक को हराकर क्वार्टर फाइनल में बनाई जगह

छह बार की ग्रैंड स्लैम विजेता का सफर खत्म, रायबाकिना ने ओसाका को हराया; गॉफ और आंद्रीवा भी अंतिम-8 में...
स्पोर्ट्स 
US ओपन में बड़ा उलटफेर, झेंग क्विनवेन ने स्वियातेक को हराकर क्वार्टर फाइनल में बनाई जगह

एज फ्रॉड मामले में रोहित यादव पर बैन, U-19 ऑस्ट्रेलिया सीरीज के लिए टीम में बदलाव

BCCI की कार्रवाई के बाद आर्यन सावसानी को वनडे और तन्मय बलोदा को मल्टी-डे टीम में मिली जगह
स्पोर्ट्स 
एज फ्रॉड मामले में रोहित यादव पर बैन, U-19 ऑस्ट्रेलिया सीरीज के लिए टीम में बदलाव

दलीप ट्रॉफी फाइनल में ईस्ट जोन का दबदबा, 708 रन के जवाब में साउथ जोन की हालत कमजोर

तीसरे दिन टी-ब्रेक तक साउथ जोन 176/5 पर, देवदत्त पडिक्कल की 62 रन की पारी ने संभाली पारी
स्पोर्ट्स 
दलीप ट्रॉफी फाइनल में ईस्ट जोन का दबदबा, 708 रन के जवाब में साउथ जोन की हालत कमजोर

बिजनेस