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आधुनिक विश्व व्यवस्था की अग्निपरीक्षा: ईरान-इज़राइल संघर्ष और वैश्विक संतुलन – मानसी द्विवेदी
Opinion
मध्य पूर्व एक बार फिर विश्व राजनीति के केंद्र में है, और इस बार कारण है ईरान और इज़राइल के बीच गहराता टकराव। यह महज दो देशों का सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि एक वैचारिक, सामरिक और कूटनीतिक टकराव है, जिसकी लहरें पूरे वैश्विक परिदृश्य को प्रभावित कर सकती हैं।
पुराना वैर, नया आयाम
ईरान और इज़राइल की दुश्मनी कोई नई नहीं है, लेकिन हालिया मिसाइल हमलों और ड्रोन हमलों ने इसे अभूतपूर्व स्तर पर पहुँचा दिया है। ईरान का 'ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस', जिसमें 2025 में एक साथ 100 से अधिक मिसाइलें इज़राइल पर दागी गईं, और जवाब में इज़राइल की आक्रामक सैन्य प्रतिक्रिया ने एक नए, प्रत्यक्ष युद्धकालीन युग की शुरुआत कर दी है।
यह संघर्ष उस वैचारिक गहराई से उपजा है, जिसकी जड़ें 1979 की इस्लामी क्रांति में हैं। उस समय ईरान ने इज़राइल को "शैतान की संतान" और "जायोनी शासन" कह कर उसके अस्तित्व को ही नकार दिया था। इसके बाद ईरान ने हिजबुल्ला, हमास और पलेस्टीन इस्लामिक जिहाद जैसे संगठनों को समर्थन देना शुरू किया, जो इज़राइल के खिलाफ हिंसक संघर्षरत हैं।
वैश्विक शक्ति समीकरणों पर प्रभाव
ईरान-इज़राइल संघर्ष आज केवल पश्चिम एशिया की चिंता नहीं, बल्कि संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की स्थिरता पर प्रश्नचिन्ह बन चुका है। इससे जुड़ी चिंताएं हैं:
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ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा: होरमुज़ जलडमरूमध्य, जिससे विश्व का 20% तेल गुजरता है, यदि युद्ध की चपेट में आता है, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित होगी।
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अर्थव्यवस्था पर दबाव: तेल की कीमतों में वृद्धि से भारत जैसे देशों में महंगाई, राजकोषीय घाटा और व्यापार असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
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प्रवासी संकट: पश्चिम एशिया में रह रहे 90 लाख से अधिक भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा और संभावित निकासी एक बड़ा मानवीय संकट बन सकता है।
भारत के लिए रणनीतिक संतुलन की चुनौती
भारत के लिए यह संघर्ष एक बहुस्तरीय परीक्षा है। एक ओर वह इज़राइल का रणनीतिक रक्षा सहयोगी है, जिससे साइबर सुरक्षा, कृषि और रक्षा तकनीक जैसे क्षेत्रों में घनिष्ठ साझेदारी है। दूसरी ओर, ईरान के साथ उसके ऐतिहासिक संबंध, चाबहार बंदरगाह परियोजना और ऊर्जा निर्भरता से गहरे जुड़े हैं।
भारत को ऐसे समय में नपे-तुले और बहुपक्षीय कूटनीतिक संतुलन का प्रदर्शन करना होगा। न तो किसी एक पक्ष का खुला समर्थन कर सकता है, न ही निष्क्रिय रह सकता है। यही वह क्षण है जब भारत शांति पहल में मध्यस्थता कर वैश्विक मंच पर जिम्मेदार शक्ति के रूप में उभर सकता है।
क्या विश्व तैयार है एक और महासंग्राम के लिए?
संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, अरब लीग और अमेरिका जैसे अंतरराष्ट्रीय शक्ति केंद्रों को अब केवल बयानबाजी नहीं, ठोस पहल करनी होगी। कट्टरपंथ की राजनीति और सैन्य वर्चस्व के सपनों को यदि आज नहीं रोका गया, तो यह संघर्ष सीमित क्षेत्रीय टकराव से निकलकर वैश्विक युद्ध की ओर बढ़ सकता है।
ईरान को अपनी सामरिक नीति की पुनर्समीक्षा करनी होगी, जबकि इज़राइल को यह समझना होगा कि शांति केवल सैन्य शक्ति से नहीं, न्यायपूर्ण समाधान से आती है — खासकर फिलिस्तीन के प्रश्न पर।
ईरान और इज़राइल के बीच का यह संघर्ष अब केवल एक द्विपक्षीय मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन की अग्निपरीक्षा है। भारत जैसे देशों के लिए यह क्षण है जब उन्हें अपनी कूटनीतिक परिपक्वता, रणनीतिक सोच और वैश्विक नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन करना होगा।
यदि दुनिया आज भी चुप रही, तो कल शायद शांति एक और सपना बनकर रह जाए।
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आधुनिक विश्व व्यवस्था की अग्निपरीक्षा: ईरान-इज़राइल संघर्ष और वैश्विक संतुलन – मानसी द्विवेदी
Opinion
पुराना वैर, नया आयाम
ईरान और इज़राइल की दुश्मनी कोई नई नहीं है, लेकिन हालिया मिसाइल हमलों और ड्रोन हमलों ने इसे अभूतपूर्व स्तर पर पहुँचा दिया है। ईरान का 'ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस', जिसमें 2025 में एक साथ 100 से अधिक मिसाइलें इज़राइल पर दागी गईं, और जवाब में इज़राइल की आक्रामक सैन्य प्रतिक्रिया ने एक नए, प्रत्यक्ष युद्धकालीन युग की शुरुआत कर दी है।
यह संघर्ष उस वैचारिक गहराई से उपजा है, जिसकी जड़ें 1979 की इस्लामी क्रांति में हैं। उस समय ईरान ने इज़राइल को "शैतान की संतान" और "जायोनी शासन" कह कर उसके अस्तित्व को ही नकार दिया था। इसके बाद ईरान ने हिजबुल्ला, हमास और पलेस्टीन इस्लामिक जिहाद जैसे संगठनों को समर्थन देना शुरू किया, जो इज़राइल के खिलाफ हिंसक संघर्षरत हैं।
वैश्विक शक्ति समीकरणों पर प्रभाव
ईरान-इज़राइल संघर्ष आज केवल पश्चिम एशिया की चिंता नहीं, बल्कि संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की स्थिरता पर प्रश्नचिन्ह बन चुका है। इससे जुड़ी चिंताएं हैं:
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ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा: होरमुज़ जलडमरूमध्य, जिससे विश्व का 20% तेल गुजरता है, यदि युद्ध की चपेट में आता है, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित होगी।
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अर्थव्यवस्था पर दबाव: तेल की कीमतों में वृद्धि से भारत जैसे देशों में महंगाई, राजकोषीय घाटा और व्यापार असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
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प्रवासी संकट: पश्चिम एशिया में रह रहे 90 लाख से अधिक भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा और संभावित निकासी एक बड़ा मानवीय संकट बन सकता है।
भारत के लिए रणनीतिक संतुलन की चुनौती
भारत के लिए यह संघर्ष एक बहुस्तरीय परीक्षा है। एक ओर वह इज़राइल का रणनीतिक रक्षा सहयोगी है, जिससे साइबर सुरक्षा, कृषि और रक्षा तकनीक जैसे क्षेत्रों में घनिष्ठ साझेदारी है। दूसरी ओर, ईरान के साथ उसके ऐतिहासिक संबंध, चाबहार बंदरगाह परियोजना और ऊर्जा निर्भरता से गहरे जुड़े हैं।
भारत को ऐसे समय में नपे-तुले और बहुपक्षीय कूटनीतिक संतुलन का प्रदर्शन करना होगा। न तो किसी एक पक्ष का खुला समर्थन कर सकता है, न ही निष्क्रिय रह सकता है। यही वह क्षण है जब भारत शांति पहल में मध्यस्थता कर वैश्विक मंच पर जिम्मेदार शक्ति के रूप में उभर सकता है।
क्या विश्व तैयार है एक और महासंग्राम के लिए?
संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, अरब लीग और अमेरिका जैसे अंतरराष्ट्रीय शक्ति केंद्रों को अब केवल बयानबाजी नहीं, ठोस पहल करनी होगी। कट्टरपंथ की राजनीति और सैन्य वर्चस्व के सपनों को यदि आज नहीं रोका गया, तो यह संघर्ष सीमित क्षेत्रीय टकराव से निकलकर वैश्विक युद्ध की ओर बढ़ सकता है।
ईरान को अपनी सामरिक नीति की पुनर्समीक्षा करनी होगी, जबकि इज़राइल को यह समझना होगा कि शांति केवल सैन्य शक्ति से नहीं, न्यायपूर्ण समाधान से आती है — खासकर फिलिस्तीन के प्रश्न पर।
ईरान और इज़राइल के बीच का यह संघर्ष अब केवल एक द्विपक्षीय मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन की अग्निपरीक्षा है। भारत जैसे देशों के लिए यह क्षण है जब उन्हें अपनी कूटनीतिक परिपक्वता, रणनीतिक सोच और वैश्विक नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन करना होगा।
यदि दुनिया आज भी चुप रही, तो कल शायद शांति एक और सपना बनकर रह जाए।
