अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस: MP में भ्रष्टाचार के जाल में उलझा एक पत्रकार, सिस्टम से लड़ाई की कहानी

DEVENDRA PATEL

9 दिसंबर, अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस। दुनिया भर में आज ईमानदारी और पारदर्शिता के बड़े-बड़े मंच सजाए जा रहे होंगे। भाषणों में भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने की बातें होंगी, संस्थाएं शपथ दिलाएंगी और नेताओं के बयान सुर्खियां बनेंगे। लेकिन मेरे लिए यह दिन एक अनकही टीस की तरह लौट आता है—एक ऐसी चोट, जो पिछले दो वर्षों से मेरे जीवन में रोज़ नए घाव खोलती रहती है। मैं यह कहानी अपनी सहानुभूति के लिए नहीं, बल्कि इसलिए लिख रहा हूँ कि अगर एक पत्रकार—जो व्यवस्था के कामकाज को समझता है—इस तरह पिस सकता है, तो एक सामान्य नागरिक की हालत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

आज अंतर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस पर, एक पत्रकार होने के नाते मैं अपनी व्यक्तिगत पीड़ा साझा कर रहा हूँ—वह पीड़ा जो सिर्फ़ मेरी नहीं, बल्कि उस सिस्टम के खोखलेपन की सच्चाई भी है, जिसे सुधारने की जिम्मेदारी खुद शासन-प्रशासन की है।

मैं देवेन्द्र पटेल, भोपाल में निवास करता हूँ और वर्षों से पत्रकारिता कर रहा हूँ। मध्यप्रदेश का नरसिंहपुर जिला—विशेषकर तहसील तेंदूखेड़ा और ग्राम काचरकोनामेरा पैतृक संबंध है। हमारा परिवार गांव में डंडा वाले” परिवार के नाम से पहचाना जाता है। एक सामान्य, मेहनतकश किसान परिवार। एक किसान परिवार से आते हुए, जमीन और उससे जुड़े दस्तावेज़ हमारे लिए सिर्फ़ कागज़ नहीं, पीढ़ियों का आधार होते हैं। पर इसी आधार को सही कराने में मैं पिछले दो साल से भ्रष्ट तंत्र के चुंगल में फंसा हुआ हूँ।

जमीन खरीदी, लेकिन भ्रष्टाचार ने सारा सिस्टम गिरवी रख दिया

मेरे मामा का गांव है बिलथारी। सड़क से लगी एक जमीन बिक रही थी। उन्होंने अपनी अंदर की जमीन बेची और कुछ रकम जोड़कर वह जमीन खरीद ली। उसी दौरान मुझे पता चला कि इस जमीन से लगी एक और जमीन (खसरा नंबर 382/1, रकबा 0.250 हेक्टेयर गांव बिलथारी तहसील तेंदूखेड़ा, नरसिंहपुर जिला) भी बिक्री पर है। विचार हुआ कि सड़क किनारे की जमीन पहले ही परिवार में आ चुकी है—तो इसकी अंदर वाली जमीन भी ले ली जाए। फरवरी 2024 में मैंने यह जमीन खरीद ली।

सब प्रक्रिया सही, साफ-सुथरी।
लेकिन यहीं से मेरा सामना उस तंत्र से हुआ, जो ईमानदार को तोड़ने के लिए ही बना लगता है। नामांतरण के लिए मैं तात्कालीन पटवारी नंदकुमार कौरव के संपर्क में आया। उन्होंने खुलकर कहा कि “पैसे दे दो, सब ठीक कर दूंगा।”

मैं ठहरा पत्रकार—वह भी मीडिया विश्वविद्यालय से पढ़ा हुआ। मैंने रिश्वत देने से साफ मना किया और जबलपुर लोकायुक्त में शिकायत दर्ज की। जांच हुई, और पटवारी रंगे हाथों रिश्वत लेते गिरफ्तार किया गया।

मुझे लगा न्याय मिल गया। अब जमीन का नामांतरण स्वतः हो जाएगा।

लेकिन यहीं से शुरू हुआ मेरे जीवन का सबसे कड़वा अनुभव

 

नामांतरण के नाम पर दो साल की प्रताड़ना

1. तहसीलदार नीरज तखरिया —पहला आदेश और एक झूठी रिपोर्ट

उन्होंने नामांतरण आदेश जारी कर दिया।
पर एक नए पटवारी ने गलत रिपोर्ट लगा दी कि मेरी जमीन “सड़क पर” आ रही है।
जांच में बाद में यह रिपोर्ट पूरी तरह झूठ साबित हुई।

2. एसडीएम संगमित्रा गौतम—फाइल अटक गई

निरीक्षण हुआ।
आरआई पंकज मेषराम और दो पटवारियों ने जांच कर लिखित में बताया—
2016 में सड़क निर्माण के दौरान लिपिकीय त्रुटि से खसरा गलत दर्ज हो गया था।
सब स्पष्ट होने के बावजूद फाइल एसडीएम ऑफिस में रुकी रही…
फिर वे अवकाश पर चली गईं और फाइल तहसीलदार को लौट गई।


अधिकारियों का फेरबदल और फाइल की मौत

तहसीलदार रोहित राजपूत

छह महीने “दिखवाता हूँ” कहकर निकाल दिए।

मंत्री प्रह्लाद पटेल जी की दखल

मैंने पीड़ा बताई।
वे चौंके।
उन्होंने तुरंत आदेश दिया—
“24 घंटे में सुधार कर नामांतरण करो।”

मुझे तेंदूखेड़ा बुलाया गया।
मेरे चार शपथ पत्र लिए गए।
पर कुछ ही दिनों बाद…
चारों शपथपत्र फाइल से ‘गायब’ हो गए।

नए तहसीलदार निर्मल पटले

उन्होंने माना—
“गलती विभाग से हुई है।”
पर निचले स्तर के कर्मचारी काम रोकते रहे।

पटवारी राजकुमार धाकड़ ने तो साफ कह दिया—
“मैं आपका काम नहीं करूँगा, मेरा दोस्त रिश्वत लेते पकड़ा गया था।”
यानि गलती मेरी यह थी कि मैंने भ्रष्टाचार उजागर किया।

नई एसडीएम—पूजा सोनी

फाइल उनके टेबल पर धूल खा रही है।
कई बार अनुरोध किया—पर फाइल कलेक्टर के पास नहीं भेजी गई।

जब क्षेत्रीय विधायक से मुलाकात हुई… लेकिन मिला सिर्फ़ “मुलायम आश्वासन”

जमीन के नामांतरण की लड़ाई दो साल से लड़ते-लड़ते, मैं उम्मीद लेकर एक दिन क्षेत्रीय विधायक विश्वनाथ सिंह ‘मुलायम भैया’ से मिलने पहुंचा। उस समय भोपाल में विधानसभा सत्र चल रहा था और वे विधायक गेस्ट हाउस में ठहरे हुए थे।

मैं उनसे मिला, पूरी तथ्यों से भरी फाइल उनके सामने खोली—

  • विभागीय त्रुटि
  • गलत खसरा दर्ज
  • रिश्वतखोर पटवारी की गिरफ्तारी
  • दो साल से फाइल का भटकना
  • शपथ पत्रों का गायब होना
  • जांच में मेरी जमीन का साफ़ सिद्ध होना

मैंने सोचा था, मेरी पीड़ा सुनकर क्षेत्रीय विधायक मेरी तरफ़ खड़े होंगे। लेकिन जवाब मिला…

आप भोपाल से 200 किलोमीटर दूर मेरे क्षेत्र में आइए, जनसुनवाई में आवेदन दीजिए, वहाँ देखेंगे।”

मेरे लिए यह जवाब किसी तमाचे से कम नहीं था।
मैं मन ही मन सोच रहा था—

दादा, अगर राजधानी में, अपने सामने मेरी पीड़ा नहीं समझ पाए, तो आपकी जनसुनवाई की भीड़ में आप मुझे कितना समय देंगे? कितना न्याय देंगे?”

विधायक जी की बातों में बड़ी मुलायमियत थी, लेकिन मेरे दर्द को समझने की कठोर इच्छा कहीं नहीं थी।

MULAA
विश्वनाथ सिंह, (मुलायम भैया), विधायक , तेंदूखेड़ा विधान सभा

लेकिन एक उम्मीद… जनसेवक—प्रह्लाद पटेल जी

अगर इस संघर्ष में किसी ने मेरी पीड़ा को वास्तव में समझा है, तो वह हैं माननीय मंत्री प्रहलाद पटेल जी जब पहली बार मैंने उन्हें मामले से अवगत कराया, उन्होंने बिना देर किए तहसीलदार को फोन पर ही निर्देश दिए

“24 घंटे में सुधार कर नामांतरण करें।”

हालांकि सिस्टम की जड़ें इतनी सख्त और जमी हुई निकलीं कि मंत्री जी के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद तहसीलदारों ने या तो टाल दिया… या उलझा दिया… या फाइल को जानबूझकर रोकते रहे।

लेकिन एक बात तय है—
माननीय प्रहलाद पटेल जी ने इस मुद्दे को गंभीरता से समझा। उन्होंने कम से कम संवेदनशीलता दिखाई।

कुछ दिन पहले जब मैं उनसे दोबारा मिला, तो यह मुलाकात “चाय पर चर्चा” जैसी सहज थी, लेकिन भीतर ठहरा दर्द वही पुराना था। मैंने फिर उन्हें पूरी स्थिति बताई। उन्होंने उसी समय एसडीएम महोदया से चर्चा भी की। अब मेरे मन में थोड़ा विश्वास जागा है—

DEVENDRA PATEL
मंत्री प्रह्लाद पटेल जी को तहसील तेंदूखेड़ा, नरसिंहपुर के अधिकारियों की कार्यशैली से अवगत कराया गया

 

सबसे बड़ा सवाल: वही जमीन सामने वाले का नामांतरण तुरंत कैसे हो गया?

मेरी जमीन के ठीक सामने स्थित जमीन का नामांतरण बिना किसी जांच-पड़ताल के तुरंत कर दिया गया।
रकबा भी वही।
सड़क भी वही।
नक्शा भी वही।

तो फिर सिर्फ मेरा मामला ही क्यों अटकाया गया? क्या इसलिए... कि एक पत्रकार ने रिश्वतखोर पटवारी को रंगे हाथों पकड़ा था?

दो साल बाद—मेरी फाइल अभी भी धूल में दबी हुई है

तहसील से एसडीएम,
एसडीएम से कलेक्टर,
कलेक्टर से फिर तहसील…

फाइल बस घूमती रही। PMO में शिकायत (PMOPG/E/2025/0160719) किए एक महीना हो चुका है— फाइल अब भी वहीं अटकी पड़ी है।


सरकार से सवाल—क्या ईमानदारी की कीमत इतनी भारी है?

अगर एक पत्रकार को दो साल तक इस तरह प्रताड़ित किया जा सकता है—किसान, मजदूर, बुजुर्ग, महिला, आदिवासी… उनकी क्या हालत होती होगी?Cभ्रष्टाचार अब सिर्फ घूस देना नहीं, बल्कि ईमानदार नागरिकों को सज़ा देने वाली प्रक्रिया बन गया है। अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस पर यही सच्चाई सबसे कड़वी है।


अंत में… एक उम्मीद

एमपी के बारे में अक्सर कहा जाता है— "एमपी अजब है, सबसे गजब है" लेकिन मैं आज भी विश्वास करता हूँ—
एक दिन यह बदलेगा।और हम गर्व से कह पाएंगे—
“एमपी बेहतर है… और सबसे बेहतर है।”

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09 Dec 2025 By दैनिक जागरण

अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस: MP में भ्रष्टाचार के जाल में उलझा एक पत्रकार, सिस्टम से लड़ाई की कहानी

DEVENDRA PATEL

आज अंतर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस पर, एक पत्रकार होने के नाते मैं अपनी व्यक्तिगत पीड़ा साझा कर रहा हूँ—वह पीड़ा जो सिर्फ़ मेरी नहीं, बल्कि उस सिस्टम के खोखलेपन की सच्चाई भी है, जिसे सुधारने की जिम्मेदारी खुद शासन-प्रशासन की है।

मैं देवेन्द्र पटेल, भोपाल में निवास करता हूँ और वर्षों से पत्रकारिता कर रहा हूँ। मध्यप्रदेश का नरसिंहपुर जिला—विशेषकर तहसील तेंदूखेड़ा और ग्राम काचरकोनामेरा पैतृक संबंध है। हमारा परिवार गांव में डंडा वाले” परिवार के नाम से पहचाना जाता है। एक सामान्य, मेहनतकश किसान परिवार। एक किसान परिवार से आते हुए, जमीन और उससे जुड़े दस्तावेज़ हमारे लिए सिर्फ़ कागज़ नहीं, पीढ़ियों का आधार होते हैं। पर इसी आधार को सही कराने में मैं पिछले दो साल से भ्रष्ट तंत्र के चुंगल में फंसा हुआ हूँ।

जमीन खरीदी, लेकिन भ्रष्टाचार ने सारा सिस्टम गिरवी रख दिया

मेरे मामा का गांव है बिलथारी। सड़क से लगी एक जमीन बिक रही थी। उन्होंने अपनी अंदर की जमीन बेची और कुछ रकम जोड़कर वह जमीन खरीद ली। उसी दौरान मुझे पता चला कि इस जमीन से लगी एक और जमीन (खसरा नंबर 382/1, रकबा 0.250 हेक्टेयर गांव बिलथारी तहसील तेंदूखेड़ा, नरसिंहपुर जिला) भी बिक्री पर है। विचार हुआ कि सड़क किनारे की जमीन पहले ही परिवार में आ चुकी है—तो इसकी अंदर वाली जमीन भी ले ली जाए। फरवरी 2024 में मैंने यह जमीन खरीद ली।

सब प्रक्रिया सही, साफ-सुथरी।
लेकिन यहीं से मेरा सामना उस तंत्र से हुआ, जो ईमानदार को तोड़ने के लिए ही बना लगता है। नामांतरण के लिए मैं तात्कालीन पटवारी नंदकुमार कौरव के संपर्क में आया। उन्होंने खुलकर कहा कि “पैसे दे दो, सब ठीक कर दूंगा।”

मैं ठहरा पत्रकार—वह भी मीडिया विश्वविद्यालय से पढ़ा हुआ। मैंने रिश्वत देने से साफ मना किया और जबलपुर लोकायुक्त में शिकायत दर्ज की। जांच हुई, और पटवारी रंगे हाथों रिश्वत लेते गिरफ्तार किया गया।

मुझे लगा न्याय मिल गया। अब जमीन का नामांतरण स्वतः हो जाएगा।

लेकिन यहीं से शुरू हुआ मेरे जीवन का सबसे कड़वा अनुभव

 

नामांतरण के नाम पर दो साल की प्रताड़ना

1. तहसीलदार नीरज तखरिया —पहला आदेश और एक झूठी रिपोर्ट

उन्होंने नामांतरण आदेश जारी कर दिया।
पर एक नए पटवारी ने गलत रिपोर्ट लगा दी कि मेरी जमीन “सड़क पर” आ रही है।
जांच में बाद में यह रिपोर्ट पूरी तरह झूठ साबित हुई।

2. एसडीएम संगमित्रा गौतम—फाइल अटक गई

निरीक्षण हुआ।
आरआई पंकज मेषराम और दो पटवारियों ने जांच कर लिखित में बताया—
2016 में सड़क निर्माण के दौरान लिपिकीय त्रुटि से खसरा गलत दर्ज हो गया था।
सब स्पष्ट होने के बावजूद फाइल एसडीएम ऑफिस में रुकी रही…
फिर वे अवकाश पर चली गईं और फाइल तहसीलदार को लौट गई।


अधिकारियों का फेरबदल और फाइल की मौत

तहसीलदार रोहित राजपूत

छह महीने “दिखवाता हूँ” कहकर निकाल दिए।

मंत्री प्रह्लाद पटेल जी की दखल

मैंने पीड़ा बताई।
वे चौंके।
उन्होंने तुरंत आदेश दिया—
“24 घंटे में सुधार कर नामांतरण करो।”

मुझे तेंदूखेड़ा बुलाया गया।
मेरे चार शपथ पत्र लिए गए।
पर कुछ ही दिनों बाद…
चारों शपथपत्र फाइल से ‘गायब’ हो गए।

नए तहसीलदार निर्मल पटले

उन्होंने माना—
“गलती विभाग से हुई है।”
पर निचले स्तर के कर्मचारी काम रोकते रहे।

पटवारी राजकुमार धाकड़ ने तो साफ कह दिया—
“मैं आपका काम नहीं करूँगा, मेरा दोस्त रिश्वत लेते पकड़ा गया था।”
यानि गलती मेरी यह थी कि मैंने भ्रष्टाचार उजागर किया।

नई एसडीएम—पूजा सोनी

फाइल उनके टेबल पर धूल खा रही है।
कई बार अनुरोध किया—पर फाइल कलेक्टर के पास नहीं भेजी गई।

जब क्षेत्रीय विधायक से मुलाकात हुई… लेकिन मिला सिर्फ़ “मुलायम आश्वासन”

जमीन के नामांतरण की लड़ाई दो साल से लड़ते-लड़ते, मैं उम्मीद लेकर एक दिन क्षेत्रीय विधायक विश्वनाथ सिंह ‘मुलायम भैया’ से मिलने पहुंचा। उस समय भोपाल में विधानसभा सत्र चल रहा था और वे विधायक गेस्ट हाउस में ठहरे हुए थे।

मैं उनसे मिला, पूरी तथ्यों से भरी फाइल उनके सामने खोली—

  • विभागीय त्रुटि
  • गलत खसरा दर्ज
  • रिश्वतखोर पटवारी की गिरफ्तारी
  • दो साल से फाइल का भटकना
  • शपथ पत्रों का गायब होना
  • जांच में मेरी जमीन का साफ़ सिद्ध होना

मैंने सोचा था, मेरी पीड़ा सुनकर क्षेत्रीय विधायक मेरी तरफ़ खड़े होंगे। लेकिन जवाब मिला…

आप भोपाल से 200 किलोमीटर दूर मेरे क्षेत्र में आइए, जनसुनवाई में आवेदन दीजिए, वहाँ देखेंगे।”

मेरे लिए यह जवाब किसी तमाचे से कम नहीं था।
मैं मन ही मन सोच रहा था—

दादा, अगर राजधानी में, अपने सामने मेरी पीड़ा नहीं समझ पाए, तो आपकी जनसुनवाई की भीड़ में आप मुझे कितना समय देंगे? कितना न्याय देंगे?”

विधायक जी की बातों में बड़ी मुलायमियत थी, लेकिन मेरे दर्द को समझने की कठोर इच्छा कहीं नहीं थी।

MULAA
विश्वनाथ सिंह, (मुलायम भैया), विधायक , तेंदूखेड़ा विधान सभा

लेकिन एक उम्मीद… जनसेवक—प्रह्लाद पटेल जी

अगर इस संघर्ष में किसी ने मेरी पीड़ा को वास्तव में समझा है, तो वह हैं माननीय मंत्री प्रहलाद पटेल जी जब पहली बार मैंने उन्हें मामले से अवगत कराया, उन्होंने बिना देर किए तहसीलदार को फोन पर ही निर्देश दिए

“24 घंटे में सुधार कर नामांतरण करें।”

हालांकि सिस्टम की जड़ें इतनी सख्त और जमी हुई निकलीं कि मंत्री जी के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद तहसीलदारों ने या तो टाल दिया… या उलझा दिया… या फाइल को जानबूझकर रोकते रहे।

लेकिन एक बात तय है—
माननीय प्रहलाद पटेल जी ने इस मुद्दे को गंभीरता से समझा। उन्होंने कम से कम संवेदनशीलता दिखाई।

कुछ दिन पहले जब मैं उनसे दोबारा मिला, तो यह मुलाकात “चाय पर चर्चा” जैसी सहज थी, लेकिन भीतर ठहरा दर्द वही पुराना था। मैंने फिर उन्हें पूरी स्थिति बताई। उन्होंने उसी समय एसडीएम महोदया से चर्चा भी की। अब मेरे मन में थोड़ा विश्वास जागा है—

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सबसे बड़ा सवाल: वही जमीन सामने वाले का नामांतरण तुरंत कैसे हो गया?

मेरी जमीन के ठीक सामने स्थित जमीन का नामांतरण बिना किसी जांच-पड़ताल के तुरंत कर दिया गया।
रकबा भी वही।
सड़क भी वही।
नक्शा भी वही।

तो फिर सिर्फ मेरा मामला ही क्यों अटकाया गया? क्या इसलिए... कि एक पत्रकार ने रिश्वतखोर पटवारी को रंगे हाथों पकड़ा था?

दो साल बाद—मेरी फाइल अभी भी धूल में दबी हुई है

तहसील से एसडीएम,
एसडीएम से कलेक्टर,
कलेक्टर से फिर तहसील…

फाइल बस घूमती रही। PMO में शिकायत (PMOPG/E/2025/0160719) किए एक महीना हो चुका है— फाइल अब भी वहीं अटकी पड़ी है।


सरकार से सवाल—क्या ईमानदारी की कीमत इतनी भारी है?

अगर एक पत्रकार को दो साल तक इस तरह प्रताड़ित किया जा सकता है—किसान, मजदूर, बुजुर्ग, महिला, आदिवासी… उनकी क्या हालत होती होगी?Cभ्रष्टाचार अब सिर्फ घूस देना नहीं, बल्कि ईमानदार नागरिकों को सज़ा देने वाली प्रक्रिया बन गया है। अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस पर यही सच्चाई सबसे कड़वी है।


अंत में… एक उम्मीद

एमपी के बारे में अक्सर कहा जाता है— "एमपी अजब है, सबसे गजब है" लेकिन मैं आज भी विश्वास करता हूँ—
एक दिन यह बदलेगा।और हम गर्व से कह पाएंगे—
“एमपी बेहतर है… और सबसे बेहतर है।”

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