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Opinion: जनसंख्या से जुड़ी संघ की चिंता क्या सही है? समझिए ये डर कितना सही
Opinion
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने जनसंख्या घटने की चिंता जताते हुए हर दंपत्ति से तीन बच्चे पैदा करने का आग्रह किया है। विशेषज्ञों ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि भारत की जनसंख्या स्थिर है। भागवत का बयान सरकारी नीतियों और प्रधानमंत्री के विचारों के विपरीत है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक बार फिर से देश में आबादी घटने की भयानक भविष्यवाणी कर रहा है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हाल में कहा कि फर्टिलिटी रेट अगर रिप्लेसमेंट रेट 2.1 से नीचे आता है, तो जनसंख्या को लेकर संकट खड़ा हो जाएगा। इसे रोकने के लिए उन्होंने देश के हर दंपती से कम से कम तीन बच्चे पैदा करने का आग्रह किया है।
गलत डर
जनसंख्या विशेषज्ञ पहले ही इन दावों को खारिज कर चुके हैं। उनका कहना है कि जनसंख्या में बदलाव बहुत धीमी गति से होता है, खासकर भारत जैसे देश में। आबादी के लिहाज से हमने चीन को भी पीछे छोड़ दिया है और दुनिया में सबसे आगे खड़े हुए हैं। अगर मोहन भागवत उन छोटे समुदायों की बात कर रहे होते, जिनका भविष्य सच में खतरे में है, तो बात समझ में आती। मसलन, त्रिपुरा की Karbang जनजाति को ले सकते हैं, जिनकी जनसंख्या अब कुछ सौ में ही बची है या फिर मजबूत पारसी समुदाय, जिनकी आबादी 60 हजार से भी कम है। लेकिन, सभी लोग जानते हैं कि भागवत के दिमाग में ये समुदाय नहीं थे। वह हिंदुओं की बात कर रहे थे, जिनकी आबादी 1.15 अरब है और उनके निकट भविष्य में खत्म होने का डर बिल्कुल गलत है।
नीति के विरुद्ध
दिलचस्प बात यह है कि भागवत का दावा हमारे प्रधानमंत्री के बयान के विपरीत है। पीएम नरेंद्र मोदी ने 2019 में स्वतंत्रता दिवस पर ‘जनसंख्या विस्फोट’ के खतरे पर चिंता जताई थी। भागवत का बयान सरकार की आधिकारिक नीति के भी विपरीत है, जो 1994 से दो-बच्चों के नियम को बढ़ावा दे रही है। इस नीति के तहत दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने की अयोग्यता और सरकारी कर्मचारियों के लिए पहले दो बच्चों के बाद मातृत्व लाभ नहीं देने जैसी सजाएं तय की गई हैं।
नुकसान हो रहा
महिला संगठनों और प्रगतिशील समूहों ने सरकार की जनसंख्या नीति का विरोध किया है। इस नीति के कई हानिकारक परिणाम देखने को मिले हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान तो चाइल्ड सेक्स रेश्यो के मामले में देखने को मिल रहा है। हमारे यहां लिंग अनुपात पहले ही असंतुलित है और जनसंख्या नीति के चलते दंपती अनचाहे कन्या भ्रूण का गर्भपात करा देते हैं। ऐसे में दो बच्चों की सीमा खत्म करने का निश्चित तौर पर स्वागत किया जाना चाहिए।
छोटे परिवार की इच्छा
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि एक सत्तावादी जनसंख्या नीति की जगह ऐसी ही दूसरी नीति लाई जाए। आबादी पर जबरदस्ती नियंत्रण के बजाय हमें यह सवाल करना चाहिए कि आज क्यों इतने सारे परिवार केवल एक या दो बच्चे चाहते हैं। भारत अब demographic evolution के एक अनोखे दौर में प्रवेश कर चुका है। यहां छोटे परिवारों की इच्छा अमीर तबके तक सीमित नहीं रही, बल्कि गरीब परिवारों में भी यह सोच बढ़ी है।
जापान का उदाहरण
भारत में जो ट्रेंड हम आज देख रहे हैं, वह जापान जैसे देश में बहुत पहले से है। दुनिया के सबसे कम प्रजनन दर वाले देशों में जापान का नाम आता है, जहां प्रति महिला औसत जन्म दर 1.4 है। स्थिर कमाई और बच्चों की परवरिश में बढ़ते खर्चों के कारण युवा अब माता-पिता बनने से बच रहे हैं। जापानी सरकार जन्म दर को बढ़ाने के लिए तमाम प्रयास कर रही है, लेकिन इसका कोई असर नहीं दिख रहा। जापानी महिलाएं शादी और मां बनने से कतरा रही हैं। भारत में भी ‘एक बेटा और एक बेटी’ की इच्छा थोपी नहीं गई है। ज्यादातर परिवारों की यह खुद की चुनी पसंद है।
युवाओं का संघर्ष
जनसंख्या बढ़ाने पर जोर देने के बजाय हमें मौजूदा पीढ़ी के संघर्षों पर ध्यान देना चाहिए- उनकी आर्थिक स्थिरता की तलाश, शादी के फैसले और फैमिली प्लानिंग। एक समाज के तौर पर हमने कपल्स पर बच्चे पैदा करने का अनावश्यक दबाव डाल रखा है। इसका सबूत है विशाल फर्टिलिटी इंडस्ट्री। समृद्ध तबका जिस तरह से एक या दो बच्चे करता है और फिर उन पर पूरा ध्यान देता है, उसी तरह का व्यवहार अब वह तबका भी अपनाने लगा है जिसके पास पर्याप्त संसाधन नहीं।
बदलाव का स्वागत
परिवारों पर यह दबाव डालने के बजाय कि कितने बच्चे होने चाहिए और कितने नहीं, हमें उन बड़े बदलावों की सराहना करनी चाहिए जो हाल के समय में हुए हैं। एक वक्त था, जब बच्चों से जुड़े सवाल पर कोई विकल्प नहीं होता था, खासकर महिलाओं के सामने। अब यह चीज बदल रही है। हमें उन लोगों की भावनाओं को भी समझना चाहिए, जो बच्चे नहीं चाहते। साथ ही, बच्चे न होने को कलंक की तरह भी नहीं देखा जाना चाहिए। अब नए तरह के रिश्ते उभर रहे हैं। पारंपरिक परिवारों के इतर वहां भी बच्चों के विकल्प को कानूनी मान्यता देनी चाहिए, उनका स्वागत करना चाहिए। हमारे समाज ने अविवाहित गर्भवती महिला के लिए बच्चे को जन्म देना लगभग असंभव बना दिया है। इस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है।
दूसरे मुद्दे
हमें जनसंख्या से जुड़ी सांप्रदायिक प्रचार की चालों का शिकार नहीं होना चाहिए। हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं, जहां दुनियाभर के युवाओं के सामने कई तरह के खतरे हैं। इनमें पृथ्वी के विनाश का खतरा भी है। यह पीढ़ी खुद से पूछ रही है कि क्या ऐसे माहौल में बच्चों को जन्म देना नैतिक होगा?
(लेखिका Centre for Women’s Development Studies की डायरेक्टर रह चुकी हैं)
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Opinion: जनसंख्या से जुड़ी संघ की चिंता क्या सही है? समझिए ये डर कितना सही
Opinion
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक बार फिर से देश में आबादी घटने की भयानक भविष्यवाणी कर रहा है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हाल में कहा कि फर्टिलिटी रेट अगर रिप्लेसमेंट रेट 2.1 से नीचे आता है, तो जनसंख्या को लेकर संकट खड़ा हो जाएगा। इसे रोकने के लिए उन्होंने देश के हर दंपती से कम से कम तीन बच्चे पैदा करने का आग्रह किया है।
गलत डर
जनसंख्या विशेषज्ञ पहले ही इन दावों को खारिज कर चुके हैं। उनका कहना है कि जनसंख्या में बदलाव बहुत धीमी गति से होता है, खासकर भारत जैसे देश में। आबादी के लिहाज से हमने चीन को भी पीछे छोड़ दिया है और दुनिया में सबसे आगे खड़े हुए हैं। अगर मोहन भागवत उन छोटे समुदायों की बात कर रहे होते, जिनका भविष्य सच में खतरे में है, तो बात समझ में आती। मसलन, त्रिपुरा की Karbang जनजाति को ले सकते हैं, जिनकी जनसंख्या अब कुछ सौ में ही बची है या फिर मजबूत पारसी समुदाय, जिनकी आबादी 60 हजार से भी कम है। लेकिन, सभी लोग जानते हैं कि भागवत के दिमाग में ये समुदाय नहीं थे। वह हिंदुओं की बात कर रहे थे, जिनकी आबादी 1.15 अरब है और उनके निकट भविष्य में खत्म होने का डर बिल्कुल गलत है।
नीति के विरुद्ध
दिलचस्प बात यह है कि भागवत का दावा हमारे प्रधानमंत्री के बयान के विपरीत है। पीएम नरेंद्र मोदी ने 2019 में स्वतंत्रता दिवस पर ‘जनसंख्या विस्फोट’ के खतरे पर चिंता जताई थी। भागवत का बयान सरकार की आधिकारिक नीति के भी विपरीत है, जो 1994 से दो-बच्चों के नियम को बढ़ावा दे रही है। इस नीति के तहत दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने की अयोग्यता और सरकारी कर्मचारियों के लिए पहले दो बच्चों के बाद मातृत्व लाभ नहीं देने जैसी सजाएं तय की गई हैं।
नुकसान हो रहा
महिला संगठनों और प्रगतिशील समूहों ने सरकार की जनसंख्या नीति का विरोध किया है। इस नीति के कई हानिकारक परिणाम देखने को मिले हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान तो चाइल्ड सेक्स रेश्यो के मामले में देखने को मिल रहा है। हमारे यहां लिंग अनुपात पहले ही असंतुलित है और जनसंख्या नीति के चलते दंपती अनचाहे कन्या भ्रूण का गर्भपात करा देते हैं। ऐसे में दो बच्चों की सीमा खत्म करने का निश्चित तौर पर स्वागत किया जाना चाहिए।
छोटे परिवार की इच्छा
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि एक सत्तावादी जनसंख्या नीति की जगह ऐसी ही दूसरी नीति लाई जाए। आबादी पर जबरदस्ती नियंत्रण के बजाय हमें यह सवाल करना चाहिए कि आज क्यों इतने सारे परिवार केवल एक या दो बच्चे चाहते हैं। भारत अब demographic evolution के एक अनोखे दौर में प्रवेश कर चुका है। यहां छोटे परिवारों की इच्छा अमीर तबके तक सीमित नहीं रही, बल्कि गरीब परिवारों में भी यह सोच बढ़ी है।
जापान का उदाहरण
भारत में जो ट्रेंड हम आज देख रहे हैं, वह जापान जैसे देश में बहुत पहले से है। दुनिया के सबसे कम प्रजनन दर वाले देशों में जापान का नाम आता है, जहां प्रति महिला औसत जन्म दर 1.4 है। स्थिर कमाई और बच्चों की परवरिश में बढ़ते खर्चों के कारण युवा अब माता-पिता बनने से बच रहे हैं। जापानी सरकार जन्म दर को बढ़ाने के लिए तमाम प्रयास कर रही है, लेकिन इसका कोई असर नहीं दिख रहा। जापानी महिलाएं शादी और मां बनने से कतरा रही हैं। भारत में भी ‘एक बेटा और एक बेटी’ की इच्छा थोपी नहीं गई है। ज्यादातर परिवारों की यह खुद की चुनी पसंद है।
युवाओं का संघर्ष
जनसंख्या बढ़ाने पर जोर देने के बजाय हमें मौजूदा पीढ़ी के संघर्षों पर ध्यान देना चाहिए- उनकी आर्थिक स्थिरता की तलाश, शादी के फैसले और फैमिली प्लानिंग। एक समाज के तौर पर हमने कपल्स पर बच्चे पैदा करने का अनावश्यक दबाव डाल रखा है। इसका सबूत है विशाल फर्टिलिटी इंडस्ट्री। समृद्ध तबका जिस तरह से एक या दो बच्चे करता है और फिर उन पर पूरा ध्यान देता है, उसी तरह का व्यवहार अब वह तबका भी अपनाने लगा है जिसके पास पर्याप्त संसाधन नहीं।
बदलाव का स्वागत
परिवारों पर यह दबाव डालने के बजाय कि कितने बच्चे होने चाहिए और कितने नहीं, हमें उन बड़े बदलावों की सराहना करनी चाहिए जो हाल के समय में हुए हैं। एक वक्त था, जब बच्चों से जुड़े सवाल पर कोई विकल्प नहीं होता था, खासकर महिलाओं के सामने। अब यह चीज बदल रही है। हमें उन लोगों की भावनाओं को भी समझना चाहिए, जो बच्चे नहीं चाहते। साथ ही, बच्चे न होने को कलंक की तरह भी नहीं देखा जाना चाहिए। अब नए तरह के रिश्ते उभर रहे हैं। पारंपरिक परिवारों के इतर वहां भी बच्चों के विकल्प को कानूनी मान्यता देनी चाहिए, उनका स्वागत करना चाहिए। हमारे समाज ने अविवाहित गर्भवती महिला के लिए बच्चे को जन्म देना लगभग असंभव बना दिया है। इस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है।
दूसरे मुद्दे
हमें जनसंख्या से जुड़ी सांप्रदायिक प्रचार की चालों का शिकार नहीं होना चाहिए। हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं, जहां दुनियाभर के युवाओं के सामने कई तरह के खतरे हैं। इनमें पृथ्वी के विनाश का खतरा भी है। यह पीढ़ी खुद से पूछ रही है कि क्या ऐसे माहौल में बच्चों को जन्म देना नैतिक होगा?
(लेखिका Centre for Women’s Development Studies की डायरेक्टर रह चुकी हैं)
