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संवाद का नया विज्ञान: न्यूरो-पीआर और बिहैवियरल कम्युनिकेशन से बदलता जनसंपर्क का चेहरा
Digital Desk
केवल सूचना नहीं, भावना और व्यवहार की समझ से बनेगा प्रभावी संवाद; आंकड़ों से आगे जाकर इंसान की कहानी पर ज़ोर
संवाद अब सिर्फ बोलने या लिखने तक सीमित नहीं रह गया है। यह समझने का विज्ञान बन चुका है कि लोग क्या सोचते हैं, क्या महसूस करते हैं और किन कारणों से वैसा व्यवहार करते हैं। बदलते समय के साथ शब्द वही हैं, लेकिन उनके अर्थ और प्रभाव के तरीके बदल गए हैं। इसी बदलाव की पड़ताल करता है न्यूरो-पीआर और बिहैवियरल कम्युनिकेशन, जो आधुनिक जनसंपर्क की दिशा और दशा दोनों तय कर रहा है।
सूचना और जनसंपर्क विभाग (DIPR) के उप निदेशक और पब्लिक रिलेशन्स सोसाइटी ऑफ इंडिया (PRSI), देहरादून चैप्टर के अध्यक्ष रवि बिजारनिया द्वारा लिखे गए इस विचार लेख में बताया गया है कि प्रभावी संवाद वह है, जो पहले दिल को छुए और फिर दिमाग तक पहुंचे। उनका मानना है कि जो बात भावनाओं को छू जाती है, वही लंबे समय तक याद रहती है और व्यवहार में बदलाव लाती है।
न्यूरो-पीआर: भावना से जुड़ा संवाद
न्यूरो-पीआर का मूल सिद्धांत यह है कि इंसान पहले महसूस करता है, फिर सोचता है। उदाहरण के तौर पर, “कूड़ा न फैलाएं” जैसे सामान्य संदेश की तुलना में यह कहना ज्यादा असरदार है— “आपका बच्चा जिस गली में खेलता है, क्या आप उसे गंदा देखना चाहेंगे?” यह संदेश माता-पिता की भावना और सुरक्षा से जुड़े मस्तिष्क को सक्रिय करता है, जिससे व्यवहार बदलने की संभावना बढ़ जाती है।
इसी तरह डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए “डिजिटल भुगतान सुरक्षित है” कहना कम प्रभावी होता है, जबकि “आपके मोहल्ले के 10 में से 7 लोग UPI से भुगतान कर रहे हैं” जैसे संदेश सामाजिक स्वीकृति का भाव पैदा करते हैं। लोग वही अपनाते हैं, जो उन्हें सामान्य और प्रचलित लगता है।
आपदा के समय संवाद की भूमिका
लेख में आपदा के समय संवाद को बेहद संवेदनशील बताया गया है। “स्थिति नियंत्रण में है” जैसे औपचारिक बयान की जगह अगर यह कहा जाए— “हम आपकी चिंता समझते हैं, सरकार आपके साथ खड़ी है और हर दो घंटे में सही जानकारी दी जाएगी”— तो इससे डर कम होता है, भरोसा बढ़ता है और अफवाहों पर रोक लगती है।
बिहैवियरल कम्युनिकेशन: आदतों की समझ
बिहैवियरल कम्युनिकेशन इस तथ्य पर आधारित है कि इंसान हमेशा तर्क से निर्णय नहीं लेता। वह अक्सर वही करता है, जो आसान हो और जो अधिकांश लोग कर रहे हों। जैसे, भीड़ वाली दुकान पर ज्यादा ग्राहक पहुंचते हैं। जब दिल किसी बात को मान लेता है, तब आदतें बदलना आसान हो जाता है।
कहानी कहने की भारतीय परंपरा
भारत में संवाद केवल सूचना नहीं, बल्कि संबंध है। रामायण, महाभारत और लोककथाओं की परंपरा बताती है कि कहानी भरोसा बनाती है। सरकारी योजनाओं में सिर्फ यह बताना कि “5 लाख लोगों को लाभ मिला” कम असर डालता है। लेकिन जब किसी लाभार्थी की कहानी सामने आती है—जैसे पहाड़ के गांव की सरस्वती देवी, जो इलाज के खर्च से डरती थीं और आज स्वस्थ हैं—तो योजना लोगों के दिल में उतर जाती है।
भविष्य का संवाद
लेख के अनुसार, भविष्य का पीआर वही होगा जो दिमाग को समझे, दिल से जुड़े और समाज को सकारात्मक दिशा दे। संवाद की यह शक्ति जितनी प्रभावशाली है, उतनी ही जिम्मेदारी भी मांगती है। इसका उपयोग भ्रम नहीं, बल्कि जनहित और सच्चाई के लिए होना चाहिए।
डिस्क्लेमर:
यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों, अनुभवों और विश्लेषण पर आधारित एक विचार लेख (Opinion Article) है। इसमें व्यक्त किए गए विचार, निष्कर्ष और दृष्टिकोण पूरी तरह लेखक के निजी हैं। dainikjagranmpcg.com इस लेख में व्यक्त विचारों, दावों अथवा मतों का आवश्यक रूप से समर्थन, अनुमोदन या प्रतिनिधित्व नहीं करता।
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संवाद का नया विज्ञान: न्यूरो-पीआर और बिहैवियरल कम्युनिकेशन से बदलता जनसंपर्क का चेहरा
Digital Desk
संवाद अब सिर्फ बोलने या लिखने तक सीमित नहीं रह गया है। यह समझने का विज्ञान बन चुका है कि लोग क्या सोचते हैं, क्या महसूस करते हैं और किन कारणों से वैसा व्यवहार करते हैं। बदलते समय के साथ शब्द वही हैं, लेकिन उनके अर्थ और प्रभाव के तरीके बदल गए हैं। इसी बदलाव की पड़ताल करता है न्यूरो-पीआर और बिहैवियरल कम्युनिकेशन, जो आधुनिक जनसंपर्क की दिशा और दशा दोनों तय कर रहा है।
सूचना और जनसंपर्क विभाग (DIPR) के उप निदेशक और पब्लिक रिलेशन्स सोसाइटी ऑफ इंडिया (PRSI), देहरादून चैप्टर के अध्यक्ष रवि बिजारनिया द्वारा लिखे गए इस विचार लेख में बताया गया है कि प्रभावी संवाद वह है, जो पहले दिल को छुए और फिर दिमाग तक पहुंचे। उनका मानना है कि जो बात भावनाओं को छू जाती है, वही लंबे समय तक याद रहती है और व्यवहार में बदलाव लाती है।
न्यूरो-पीआर: भावना से जुड़ा संवाद
न्यूरो-पीआर का मूल सिद्धांत यह है कि इंसान पहले महसूस करता है, फिर सोचता है। उदाहरण के तौर पर, “कूड़ा न फैलाएं” जैसे सामान्य संदेश की तुलना में यह कहना ज्यादा असरदार है— “आपका बच्चा जिस गली में खेलता है, क्या आप उसे गंदा देखना चाहेंगे?” यह संदेश माता-पिता की भावना और सुरक्षा से जुड़े मस्तिष्क को सक्रिय करता है, जिससे व्यवहार बदलने की संभावना बढ़ जाती है।
इसी तरह डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए “डिजिटल भुगतान सुरक्षित है” कहना कम प्रभावी होता है, जबकि “आपके मोहल्ले के 10 में से 7 लोग UPI से भुगतान कर रहे हैं” जैसे संदेश सामाजिक स्वीकृति का भाव पैदा करते हैं। लोग वही अपनाते हैं, जो उन्हें सामान्य और प्रचलित लगता है।
आपदा के समय संवाद की भूमिका
लेख में आपदा के समय संवाद को बेहद संवेदनशील बताया गया है। “स्थिति नियंत्रण में है” जैसे औपचारिक बयान की जगह अगर यह कहा जाए— “हम आपकी चिंता समझते हैं, सरकार आपके साथ खड़ी है और हर दो घंटे में सही जानकारी दी जाएगी”— तो इससे डर कम होता है, भरोसा बढ़ता है और अफवाहों पर रोक लगती है।
बिहैवियरल कम्युनिकेशन: आदतों की समझ
बिहैवियरल कम्युनिकेशन इस तथ्य पर आधारित है कि इंसान हमेशा तर्क से निर्णय नहीं लेता। वह अक्सर वही करता है, जो आसान हो और जो अधिकांश लोग कर रहे हों। जैसे, भीड़ वाली दुकान पर ज्यादा ग्राहक पहुंचते हैं। जब दिल किसी बात को मान लेता है, तब आदतें बदलना आसान हो जाता है।
कहानी कहने की भारतीय परंपरा
भारत में संवाद केवल सूचना नहीं, बल्कि संबंध है। रामायण, महाभारत और लोककथाओं की परंपरा बताती है कि कहानी भरोसा बनाती है। सरकारी योजनाओं में सिर्फ यह बताना कि “5 लाख लोगों को लाभ मिला” कम असर डालता है। लेकिन जब किसी लाभार्थी की कहानी सामने आती है—जैसे पहाड़ के गांव की सरस्वती देवी, जो इलाज के खर्च से डरती थीं और आज स्वस्थ हैं—तो योजना लोगों के दिल में उतर जाती है।
भविष्य का संवाद
लेख के अनुसार, भविष्य का पीआर वही होगा जो दिमाग को समझे, दिल से जुड़े और समाज को सकारात्मक दिशा दे। संवाद की यह शक्ति जितनी प्रभावशाली है, उतनी ही जिम्मेदारी भी मांगती है। इसका उपयोग भ्रम नहीं, बल्कि जनहित और सच्चाई के लिए होना चाहिए।
डिस्क्लेमर:
यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों, अनुभवों और विश्लेषण पर आधारित एक विचार लेख (Opinion Article) है। इसमें व्यक्त किए गए विचार, निष्कर्ष और दृष्टिकोण पूरी तरह लेखक के निजी हैं। dainikjagranmpcg.com इस लेख में व्यक्त विचारों, दावों अथवा मतों का आवश्यक रूप से समर्थन, अनुमोदन या प्रतिनिधित्व नहीं करता।
