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एकदंत संकष्टी चतुर्थी आज: चंद्रमा को अर्घ्य बिना क्यों अधूरा रहता व्रत
Dharm, Desk
मंगलवार 5 मई 2026 को एकदंत संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जा रहा है और सुबह से ही मंदिरों में पूजा-अर्चना का सिलसिला शुरू हो गया है।
ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष चतुर्थी होने की वजह से इस व्रत को खास माना जाता है। बताया जा रहा है कि इस बार अंगारकी संकष्टी चतुर्थी का संयोग भी बन रहा है, जिससे इसका महत्व और बढ़ गया है। सुबह से ही श्रद्धालु व्रत का संकल्प लेकर भगवान गणेश की पूजा में जुटे हैं। कई जगहों पर घरों में ही गणेश जी का विशेष श्रृंगार किया गया है, तो मंदिरों में भी भक्तों की आवाजाही बनी हुई है। दिनभर उपवास रखने के बाद शाम होते-होते लोगों की नजर चंद्रोदय के समय पर टिकी रहती है, क्योंकि इसी के साथ व्रत पूर्ण माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत सिर्फ दिनभर उपवास रखने तक सीमित नहीं है। इसका असली महत्व चंद्रमा को अर्घ्य देने से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथा के मुताबिक एक बार चंद्रमा ने भगवान गणेश के स्वरूप का उपहास किया था, जिससे नाराज होकर गणेश जी ने उन्हें श्राप दे दिया। बाद में चंद्रमा के क्षमा मांगने पर यह शर्त रखी गई कि चतुर्थी के दिन जो भी व्यक्ति चंद्रमा को अर्घ्य देगा, उसके सभी कष्ट दूर होंगे। यही वजह है कि इस व्रत में चंद्र दर्शन और अर्घ्य देना अनिवार्य माना गया है। सूत्रों के अनुसार कई लोग अनजाने में बिना अर्घ्य दिए ही व्रत खोल लेते हैं, लेकिन धार्मिक दृष्टि से इसे अधूरा माना जाता है और पूर्ण फल नहीं मिल पाता।
शाम के समय जैसे ही चंद्रमा के दर्शन होते हैं, श्रद्धालु जल, दूध या गंगाजल से अर्घ्य अर्पित करते हैं। इसके बाद गणेश जी की आरती कर व्रत का पारण किया जाता है। माना जाता है कि इससे जीवन के संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इस बार मंगलवार का दिन होने से इसका प्रभाव और ज्यादा फलदायी बताया जा रहा है। कई श्रद्धालु इसे मंगल दोष से राहत और कर्ज मुक्ति से भी जोड़कर देख रहे हैं। कुल मिलाकर आज का दिन आस्था और नियम के साथ जुड़ा हुआ है, जहां व्रत की पूर्णता चंद्रमा को अर्घ्य देने के साथ ही मानी जाती है।
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एकदंत संकष्टी चतुर्थी आज: चंद्रमा को अर्घ्य बिना क्यों अधूरा रहता व्रत
Dharm, Desk
ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष चतुर्थी होने की वजह से इस व्रत को खास माना जाता है। बताया जा रहा है कि इस बार अंगारकी संकष्टी चतुर्थी का संयोग भी बन रहा है, जिससे इसका महत्व और बढ़ गया है। सुबह से ही श्रद्धालु व्रत का संकल्प लेकर भगवान गणेश की पूजा में जुटे हैं। कई जगहों पर घरों में ही गणेश जी का विशेष श्रृंगार किया गया है, तो मंदिरों में भी भक्तों की आवाजाही बनी हुई है। दिनभर उपवास रखने के बाद शाम होते-होते लोगों की नजर चंद्रोदय के समय पर टिकी रहती है, क्योंकि इसी के साथ व्रत पूर्ण माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत सिर्फ दिनभर उपवास रखने तक सीमित नहीं है। इसका असली महत्व चंद्रमा को अर्घ्य देने से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथा के मुताबिक एक बार चंद्रमा ने भगवान गणेश के स्वरूप का उपहास किया था, जिससे नाराज होकर गणेश जी ने उन्हें श्राप दे दिया। बाद में चंद्रमा के क्षमा मांगने पर यह शर्त रखी गई कि चतुर्थी के दिन जो भी व्यक्ति चंद्रमा को अर्घ्य देगा, उसके सभी कष्ट दूर होंगे। यही वजह है कि इस व्रत में चंद्र दर्शन और अर्घ्य देना अनिवार्य माना गया है। सूत्रों के अनुसार कई लोग अनजाने में बिना अर्घ्य दिए ही व्रत खोल लेते हैं, लेकिन धार्मिक दृष्टि से इसे अधूरा माना जाता है और पूर्ण फल नहीं मिल पाता।
शाम के समय जैसे ही चंद्रमा के दर्शन होते हैं, श्रद्धालु जल, दूध या गंगाजल से अर्घ्य अर्पित करते हैं। इसके बाद गणेश जी की आरती कर व्रत का पारण किया जाता है। माना जाता है कि इससे जीवन के संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इस बार मंगलवार का दिन होने से इसका प्रभाव और ज्यादा फलदायी बताया जा रहा है। कई श्रद्धालु इसे मंगल दोष से राहत और कर्ज मुक्ति से भी जोड़कर देख रहे हैं। कुल मिलाकर आज का दिन आस्था और नियम के साथ जुड़ा हुआ है, जहां व्रत की पूर्णता चंद्रमा को अर्घ्य देने के साथ ही मानी जाती है।
