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यहां हिंगलाज माताजी के दर्शन के बाद ही शुरू होता है व्यापार! आस्था की अनोखी कहानी
Dharm Desk
पोरबंदर के हिंगलाज माताजी मंदिर को 400 साल पुराना माना जाता है. यहां की जातियों में माताजी को कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है. नवरात्रि में महापूजा और साड़ी चढ़ाने की परंपरा है.
गुजरात के पोरबंदर दुनियाभर में सुदामानगरी के नाम से मशहूर है. यहां कई प्राचीन मंदिर हैं, जो आज भी लोगों की आस्था का प्रतीक बने हुए हैं. खासतौर पर यहां के मंदिरों का निर्माण शाही परिवार ने करवाया था और उनकी स्थापना के लिए ज़मीन भी दान में दी थी. पोरबंदर के केदारेश्वर महादेव मंदिर को एक हजार साल पुराना माना जाता है, जबकि बांगड़ी बाज़ार में स्थित हिंगलाज माताजी के मंदिर को 400 साल से भी ज़्यादा पुराना माना जाता है. इस हिंगलाज माताजी के मंदिर से एक अनोखी मान्यता जुड़ी हुई है.
पोरबंदर के लोगों की आस्था का प्रतीक
हिंगलाज माताजी मंदिर के पुजारी जितुभाई ने लोकल 18 को बताया कि, “हमारी फैमिली की चौथी पीढ़ी इस मंदिर में माताजी की सेवा कर रही है. दरजी, खत्री, भट्ट और भानुशाली जातियों में हिंगलाज माताजी को कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है. इन जातियों के लोगों की इस मंदिर के प्रति अटूट आस्था है. यहां नवरात्रि बहुत ही श्रद्धा के साथ मनाई जाती है.
नवरात्रि के नौ दिनों तक यहां महापूजा होती है और रात को नौ बजे आरती की जाती है. भक्तजन सालभर माताजी को साड़ी चढ़ाते हैं. इस साड़ी में बच्चों को भोजन कराया जाता है और उपहार भी दिए जाते हैं. इस मंदिर में 80 साल पहले आशापुरा माताजी की मूर्ति स्थापित की गई थी. इसलिए, यहां हिंगलाज माताजी के साथ आशापुरा माताजी भी विराजमान हैं. यह मंदिर भक्तों की आस्था का प्रतीक बनता जा रहा है.”
मंदिर के पुजारी ने आगे बताया कि यह मंदिर भक्तों की आस्था का केंद्र है. मंदिर के आसपास के व्यापारी रोज़ाना माताजी के दर्शन कर फिर व्यापार शुरू करते हैं. दो साल पहले दिवाली के दौरान रात में मंदिर के गर्भगृह में अचानक आग लग गई थी. इस आग में यहां रखी सारी साड़ियां भी जल गईं. इस अग्निकांड के दौरान, माताजी के चेहरे का सिंदूर भी हट गया था और माताजी की मूर्ति का रूप भी बदल गया था.
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गुजरात के पोरबंदर दुनियाभर में सुदामानगरी के नाम से मशहूर है. यहां कई प्राचीन मंदिर हैं, जो आज भी लोगों की आस्था का प्रतीक बने हुए हैं. खासतौर पर यहां के मंदिरों का निर्माण शाही परिवार ने करवाया था और उनकी स्थापना के लिए ज़मीन भी दान में दी थी. पोरबंदर के केदारेश्वर महादेव मंदिर को एक हजार साल पुराना माना जाता है, जबकि बांगड़ी बाज़ार में स्थित हिंगलाज माताजी के मंदिर को 400 साल से भी ज़्यादा पुराना माना जाता है. इस हिंगलाज माताजी के मंदिर से एक अनोखी मान्यता जुड़ी हुई है.
पोरबंदर के लोगों की आस्था का प्रतीक
हिंगलाज माताजी मंदिर के पुजारी जितुभाई ने लोकल 18 को बताया कि, “हमारी फैमिली की चौथी पीढ़ी इस मंदिर में माताजी की सेवा कर रही है. दरजी, खत्री, भट्ट और भानुशाली जातियों में हिंगलाज माताजी को कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है. इन जातियों के लोगों की इस मंदिर के प्रति अटूट आस्था है. यहां नवरात्रि बहुत ही श्रद्धा के साथ मनाई जाती है.
नवरात्रि के नौ दिनों तक यहां महापूजा होती है और रात को नौ बजे आरती की जाती है. भक्तजन सालभर माताजी को साड़ी चढ़ाते हैं. इस साड़ी में बच्चों को भोजन कराया जाता है और उपहार भी दिए जाते हैं. इस मंदिर में 80 साल पहले आशापुरा माताजी की मूर्ति स्थापित की गई थी. इसलिए, यहां हिंगलाज माताजी के साथ आशापुरा माताजी भी विराजमान हैं. यह मंदिर भक्तों की आस्था का प्रतीक बनता जा रहा है.”
मंदिर के पुजारी ने आगे बताया कि यह मंदिर भक्तों की आस्था का केंद्र है. मंदिर के आसपास के व्यापारी रोज़ाना माताजी के दर्शन कर फिर व्यापार शुरू करते हैं. दो साल पहले दिवाली के दौरान रात में मंदिर के गर्भगृह में अचानक आग लग गई थी. इस आग में यहां रखी सारी साड़ियां भी जल गईं. इस अग्निकांड के दौरान, माताजी के चेहरे का सिंदूर भी हट गया था और माताजी की मूर्ति का रूप भी बदल गया था.
