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राम नवमी में कन्या भोज का महत्व
Dharm Desk
By दैनिक जागरण
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चैत्र नवरात्रि हो या फिर शारदीय नवरात्रि, दोनों में ही कन्या पूजन किया जाता है। भक्तजन नवरात्रि में अष्टमी या नवमी के दिन कन्याओं को भोजन करवाते हैं। लेकिन क्या आपको कन्या भोज और कन्या भोजन में भैरव के बैठने के पीछे का महत्व पता है? आइए, कन्या पूजन का महत्व विस्तार से जानें।
पौराणिक कथा के अनुसार
शास्त्रों के अनुसार, इंद्रदेव माता को प्रसन्न करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने ब्रह्मा जी से माता को प्रसन्न करने का उपाय पूछा। तब ब्रह्मा जी ने उन्हें उपाय बताते हुए कहा, "आपको कन्या पूजन करना चाहिए और उन्हें भोजन करवाना चाहिए।" इसके बाद, इंद्रदेव ने पूरी विधि-विधान से माता की पूजा-अर्चना कर कन्या पूजन किया और कुवारी कन्याओं को भोजन करवाया। माता ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया। तभी से नवरात्रि में कन्या पूजन और कन्या भोज करवाने की प्रथा चली आ रही है।
शक्ति रूपी कन्या
नवरात्रि के नौ दिनों में माता के नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। कन्या पूजन में 2 से 10 वर्ष तक की कन्याओं को भोजन कराया जाता है।
देवी पुराण के अनुसार, विभिन्न आयु की कन्याओं का महत्व:
2 वर्ष की कन्या – कुमारी
3 वर्ष की कन्या – त्रिमूर्ति
4 वर्ष की कन्या – कल्याणी
5 वर्ष की कन्या – रोहिणी
6 वर्ष की कन्या – कलिका
7 वर्ष की कन्या – चंडिका
8 वर्ष की कन्या – शांभवी
9 वर्ष की कन्या – दुर्गा
10 वर्ष की कन्या – सुभद्रा
माता के नौ स्वरूपों का प्रतीक मानकर ही कन्या पूजन किया जाता है।
कन्या पूजा में भैरव की पूजा
माता के कन्या भोज में एक बालक भी बैठता है, जिसे भैरव माना जाता है। माता के जितने भी शक्तिपीठ मंदिर हैं, उनके साथ भैरव बाबा का मंदिर अवश्य ही मिलता है। मान्यताओं के अनुसार, भैरव बाबा के दर्शन के बिना माता के दर्शन अधूरे माने जाते हैं। इसलिए कन्या भोज में भैरव के रूप में एक बालक को भी भोजन कराया जाता है।
महत्व
आदि शक्ति माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना के बाद कन्या भोज आवश्यक माना गया है। यही नौ कन्याएँ माता के नौ रूपों का प्रतीक बनती हैं, और बालक भैरव बाबा का स्वरूप धारण करता है।
Edited By: दैनिक जागरण
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29 Mar 2025 By दैनिक जागरण
राम नवमी में कन्या भोज का महत्व
Dharm Desk
चैत्र नवरात्रि हो या फिर शारदीय नवरात्रि, दोनों में ही कन्या पूजन किया जाता है। भक्तजन नवरात्रि में अष्टमी या नवमी के दिन कन्याओं को भोजन करवाते हैं। लेकिन क्या आपको कन्या भोज और कन्या भोजन में भैरव के बैठने के पीछे का महत्व पता है? आइए, कन्या पूजन का महत्व विस्तार से जानें।
पौराणिक कथा के अनुसार
शास्त्रों के अनुसार, इंद्रदेव माता को प्रसन्न करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने ब्रह्मा जी से माता को प्रसन्न करने का उपाय पूछा। तब ब्रह्मा जी ने उन्हें उपाय बताते हुए कहा, "आपको कन्या पूजन करना चाहिए और उन्हें भोजन करवाना चाहिए।" इसके बाद, इंद्रदेव ने पूरी विधि-विधान से माता की पूजा-अर्चना कर कन्या पूजन किया और कुवारी कन्याओं को भोजन करवाया। माता ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया। तभी से नवरात्रि में कन्या पूजन और कन्या भोज करवाने की प्रथा चली आ रही है।
शक्ति रूपी कन्या
नवरात्रि के नौ दिनों में माता के नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। कन्या पूजन में 2 से 10 वर्ष तक की कन्याओं को भोजन कराया जाता है।
देवी पुराण के अनुसार, विभिन्न आयु की कन्याओं का महत्व:
2 वर्ष की कन्या – कुमारी
3 वर्ष की कन्या – त्रिमूर्ति
4 वर्ष की कन्या – कल्याणी
5 वर्ष की कन्या – रोहिणी
6 वर्ष की कन्या – कलिका
7 वर्ष की कन्या – चंडिका
8 वर्ष की कन्या – शांभवी
9 वर्ष की कन्या – दुर्गा
10 वर्ष की कन्या – सुभद्रा
माता के नौ स्वरूपों का प्रतीक मानकर ही कन्या पूजन किया जाता है।
कन्या पूजा में भैरव की पूजा
माता के कन्या भोज में एक बालक भी बैठता है, जिसे भैरव माना जाता है। माता के जितने भी शक्तिपीठ मंदिर हैं, उनके साथ भैरव बाबा का मंदिर अवश्य ही मिलता है। मान्यताओं के अनुसार, भैरव बाबा के दर्शन के बिना माता के दर्शन अधूरे माने जाते हैं। इसलिए कन्या भोज में भैरव के रूप में एक बालक को भी भोजन कराया जाता है।
महत्व
आदि शक्ति माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना के बाद कन्या भोज आवश्यक माना गया है। यही नौ कन्याएँ माता के नौ रूपों का प्रतीक बनती हैं, और बालक भैरव बाबा का स्वरूप धारण करता है।
https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/importance-of-kanya-bhoj-in-ram-navami/article-15846
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