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जय जागेश्वरी : किसी शकितपीठ की तरह जाग्रत और चमत्कारी है बीना का माँ जागेश्वरी धाम
MP : बीना से राजेश जैन
80 फुट ऊंचे पीतल के स्तंभ पर चमकता स्वर्ण ध्वज दूर से मां जागेश्वरी के सेवकों को अपनी ओर बुलाता प्रतीक होता है। शहर की एक पुरानी बस्ती ग्वालटोली के एक सिरे पर बसी प्राचीन माता भवानी ने जब कोई चार दशक पूर्व जागेश्वरी माता का बाना धरा तभी से यह धाम चारों दिशाओं में दूर-दूर तक बसे भक्तों के लिए आस्था का केन्द्र बना हुआ है। माना जाता है कि मां जागेश्वरी के दरबार में सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती।
चैत्र एवं शारदीय नवरात्रि के शुरू होते ही नगर के श्रृद्धालुओं द्वारा शक्ति मंदिरों में भक्ति प्रारंभ हो जाती है। नवरात्रि की शुरुआत से ही नगर श्रृद्धालुओं द्वारा नगर के मंदिरों में बड़ी संख्या में भीड़ देखी जा सकती है। नगर के मंदिरों में प्रात:काल से ही देवी मंदिरों में भक्तों का तांता लगना शुरू हो जाता है। श्रद्धालुओं द्वारा नगर के मंदिरों में अलसुबह से ही भीड़ लगना शुरू हो जाती है जो शाम की आरती के बाद भी लगी रहती है। नगर के माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ में भी पूरे नौ दिन भक्तों का तांता लगा रहता है जहां पर माता को जल अर्पित कर भक्तगण पुण्यलाभ प्राप्त करते हैं। जागेश्वरी धाम बुंदेलखंड का वह प्रमुख मंदिर हैं जहां भक्तों की भीड़ बड़ी संख्या में साल के पूरे 365 दिन उमड़ती है।
सागर जिले के बीना शहर में आस्था और विश्वास का एक ऐसा केंद्र है जो सिर्फ बीना तक नहीं बल्कि आस-पास के दर्जनों शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के हजारों भक्तों की आस्था का भी केंद्र बन चुका है। इति प्राचीन माँ जागेश्वरी और भगवान भोलेनाथ की एक छोटी सी मढिय़ा जहां प्रतिवर्ष नवरात्रि में माता की प्रतिमा विराजित होती थी वह आज एक भव्य एवं विशाल शक्तिपीठ में परिवर्तित हो गई है। लगभग 35 वर्ष पूर्व जिस कच्चा रोड नामक क्षेत्र से लोग गुजरने में कतराते थे और उन्हें लूटपाट का भय रहता था वह क्षेत्र आज सैंकड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन चुका है।
कच्चा रोड टूटी पुलिया के नाम से प्रसिद्ध इस क्षेत्र में लगभग 35 वर्ष पूर्व मढिय़ा को हटाकर भव्य मंदिर का स्वरूप यहां के भक्तों द्वारा दिया गया। माता की एक अपूर्व सुंदर सिंह सवार प्रतिमा कि यहां पर विधि-विधान से प्रतिष्ठा की गई और प्रतिष्ठा के समय आचार्य और प्रतिष्ठाचार्यों ने मुहूर्त के अनुसार इस मनोहारी माता की प्रतिमा को माँ जागेश्वरी का नाम दिया।
इसके बाद भक्तों की आस्था का केंद्र बनी माँ जागेश्वरी मंदिर में बिना किसी पदाधिकारी के एक समिति माँ जागेश्वरी सेवा समिति का निर्माण किया गया और इस समिति में शामिल दर्जनों भक्तों और महिलाओं ने मिलकर श्रमदान से एक विशाल मंदिर का निर्माण करा दिया। वर्तमान में माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ मंदिर में काले पत्थर के खड्गासन में भगवान भोलेनाथ और माँ पार्वती की लगभग 5-5 फुट की मनोहारी प्रतिमाएं हैं, 3 फुट के शिवलिंग हैं जिन्हें जागेश्वरनाथ का नाम दिया है।
इसी मंदिर परिसर में भगवान श्री राधा कृष्ण के साथ 50 किलो पीतल की गौमाता कांच मंदिर में विराजमान हैं। मंदिर में माँ जागेश्वरी के साथ श्रीराम दरबार, श्री लक्ष्मीनारायण दरबार एवं श्री सांईनाथ दरबार भी अपने भव्य स्वरूपों में दिखाई देता है। मंदिर में सभी देवताओं की स्थापना के उपरांत भक्तों ने माँ जागेश्वरी की लगभग 11 किलो चांदी की पालकी निर्मित कराई और वर्ष 1993 से मातारानी को रजत पालकी में बैठाकर प्रतिवर्ष शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिवस यानि की प्रतिपदा को भव्य शोभायात्रा निकालने की परंपरा शुरू हुई। इसके बाद माँ जागेश्वरी सेवा समिति के अनन्य भक्तों ने अपनी आस्था और विश्वास को जगाते हुए श्रमदान करके लगभग 75 फुट ऊंची और लगभग 3 फुट चौड़ी पीतल की धर्मध्वजा की स्थापना की। सैंकड़ों क्विंटल पीतल की इस धर्मध्वजा में सबसे ऊपर स्वर्ण ध्वज लगाया गया। ऐसी मान्यता है कि यह धर्मध्वजा कई किलोमीटर दूर से देखने पर भक्तों के कष्ट दूर हो जाते हैं और उन्हें साक्षात माँ जागेश्वरी का आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है।
चंदेरी में माँ जागेश्वरी का मंदिर तीर्थ स्थल के रूप में माना जाता है। उन्हीं माँ जागेश्वरी की महिमा को दर्शाता बीना की माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ की दिव्यता और भव्यता से शायद ही बीना क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति अनजान हो। वर्षों पुराने कुंए के पास स्थित छोटी सी शंकर जी की मढिय़ा एवं चार पत्थरों की छोटी सी मढिय़ा में विराजमान मातेश्वरी की चमत्कारिक शक्ति अचानक इस क्षेत्र के भक्तों में भर गई और माँ जागेश्वरी मंदिर के नाम से एक भव्य माता के भवन का निर्माण जीर्णोद्धार प्रारंभ हो गया।
माँ जागेश्वरी की अतिसुंदर और मनोहारी प्रतिमा की स्थापना 1993-94 में की गई। इसके बाद लगातार इस मंदिर की प्रगति होती रही और भगवान भोलेनाथ-माँ पार्वती की भव्य मूर्तियों, सांई बाबा, राधाकृष्ण दरबार, लक्ष्मीनारायण दरबार एवं श्रीराम दरबार की सुंदर मूर्तियों के साथ इसी मंदिर में लगातार अस्सी फुट ऊंची विशाल धर्मध्वजा की स्थापना 2 क्विंटल पीतल के विशालकाय शेरों की स्थापना लगभग 150 किग्रा पीतल के विशालकाय नंदीजी व लगभग 50 किग्रा पीतल की अतिसुंदर गौमाता की स्थापना ने इस मंदिर को शक्तिपीठ का रूप दे दिया।
बताते हैं कि 40-50 वर्ष पूर्व यह क्षेत्र सुनसान था और यहां से निकलने में भी लोगों को एक भय सा बना रहता था किंतु जब से यहां माँ जागेश्वरी विराजी हैं तभी से यहां चमन बरस रहा है। माँ जागेश्वरी देवी एक जागृत देवी के रूप में मानी जाती हैं और यहां माँ के दरबार में सच्चे मन से प्रार्थना करने पर सभी की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कहते हैं कि संततिहीन महिलाओं को माता की पूजा-अर्चना के बाद संतान की प्राप्ति हुई है। इसी तरह जबलपुर के सुप्रसिद्ध माता के भजन गायक बसंत बत्रा पहली बार माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ पर भजन संध्या करके गए इसके बाद दूसरी बार वे बीना में ही कहीं और जब भजन संध्या करने आए तो मंच पर उनकी आवाज अचानक चली गई और वे भजन नहीं गा सके। बाद में जब उन्हें यह अहसास हुआ कि उनकी पहली भजन संध्या माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ पर हुई थी और उन्हें प्रणाम किए बिना मैं दूसरे स्थान पर भजन गाने आ गया, यह अहसास होते ही वे मंच से उतरकर माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ मंदिर पहुंचे, माँ जागेश्वरी से क्षमा याचना कर नमन किया और इसके बाद लौटकर जब उन्होंने भजन संध्या की तो वह बीना की ऐतिहासिक भजन संध्या बन गई। माँ जागेश्वरी के ऐसे कई चमत्कार हैं जो उल्लेखनीय हैं।
30 वर्षों से शोभायात्रा एवं भंडारा
माँ जागेश्वरी सेवा समिति के तत्वाधान में बीते 30 वर्षों से विशाल रजत पालकी शोभायात्रा का आयोजन किया जाता है जिसमें ललितपुर, विदिशा, सागर, गंजबासोदा, खुरई, बांदरी, मालथोन, मंडीबामोरा आदि सहित दर्जनों शहरों और ग्रामों के भक्तगण शामिल होते हैं। इन स्थानों से लगभग 2 दर्जन अखाड़े आते हैं जो अपने हैरतअंगेज प्रदर्शन करके माँ के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। शारदीय नवरात्रि की प्रतिपदा को आयोजित इस विशाल शोभायात्रा के साथ ही कई वर्षों से नगर भोज (भंडारा) भी संपन्न होता है। पहले यह भंडारा एक दिन होता था किंतु अब व्यवस्थाओं के चलते माता के नवरातों में 9 दिन ही बड़ी मात्रा में प्रसाद वितरण एवं भंडारा चलता है। प्रतिवर्ष दोनों नवरात्रि की पंचमी पर माँ जागेश्वरी को 56 भोग एवं महाआरती संपन्न कराई जाती है। यहां के भक्तों का यही कहना होता है कि -
तमन्ना लाख करते हैं, तमन्ना टूट जाती है।
माँ जागेश्वरी के दरबार में वही आते हैं जिन्हें माता बुलाती है॥
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जब गायक को आना पड़ा मां जागेश्वरी की शरण में
जबलपुर के सुप्रसिद्ध माता के भजन गायक बसंत बत्रा पहली बार माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ पर भजन संध्या करके गए इसके बाद दूसरी बार वे बीना में ही अन्य स्थान पर आयोजित भजन संध्या में आए तो मंच पर उनकी आवाज अचानक चली गई और वे भजन नहीं गा सके। बाद में जब उन्हें यह अहसास हुआ कि उनकी पहली भजन संध्या माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ पर हुई थी और उन्हें प्रणाम किए बिना मैं दूसरे स्थान पर भजन गाने आ गया, यह अहसास होते ही वे मंच से उतरकर माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ मंदिर पहुंचे, माँ जागेश्वरी से क्षमा याचना कर नमन किया और इसके बाद लौटकर जब उन्होंने भजन संध्या की तो वह बीना की ऐतिहासिक भजन संध्या बन गई।
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प्राचीन माता को नमन करना नहीं भूलते भक्त
जहां आज जागेश्वरी मां विराजमान है वहां पहले एक छोटी सी मढिय़ा में प्राचीन माता का विग्रह विराजमान था। नए मंदिर की स्थापना के बाद प्राचीन माता जी का विग्रह भी भक्तों के लिए स्थापित किया गया है। कहते है प्राचीन माता जी के दर्शन के बिना जागेश्वरी की आराधना अधूरी रहती है। इसलिए मंदिर में आने वाले भक्त प्राचीन माता जी से आर्शीवाद लेना नहीं भूलते। 
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जय जागेश्वरी : किसी शकितपीठ की तरह जाग्रत और चमत्कारी है बीना का माँ जागेश्वरी धाम
MP : बीना से राजेश जैन
चैत्र एवं शारदीय नवरात्रि के शुरू होते ही नगर के श्रृद्धालुओं द्वारा शक्ति मंदिरों में भक्ति प्रारंभ हो जाती है। नवरात्रि की शुरुआत से ही नगर श्रृद्धालुओं द्वारा नगर के मंदिरों में बड़ी संख्या में भीड़ देखी जा सकती है। नगर के मंदिरों में प्रात:काल से ही देवी मंदिरों में भक्तों का तांता लगना शुरू हो जाता है। श्रद्धालुओं द्वारा नगर के मंदिरों में अलसुबह से ही भीड़ लगना शुरू हो जाती है जो शाम की आरती के बाद भी लगी रहती है। नगर के माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ में भी पूरे नौ दिन भक्तों का तांता लगा रहता है जहां पर माता को जल अर्पित कर भक्तगण पुण्यलाभ प्राप्त करते हैं। जागेश्वरी धाम बुंदेलखंड का वह प्रमुख मंदिर हैं जहां भक्तों की भीड़ बड़ी संख्या में साल के पूरे 365 दिन उमड़ती है।
सागर जिले के बीना शहर में आस्था और विश्वास का एक ऐसा केंद्र है जो सिर्फ बीना तक नहीं बल्कि आस-पास के दर्जनों शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के हजारों भक्तों की आस्था का भी केंद्र बन चुका है। इति प्राचीन माँ जागेश्वरी और भगवान भोलेनाथ की एक छोटी सी मढिय़ा जहां प्रतिवर्ष नवरात्रि में माता की प्रतिमा विराजित होती थी वह आज एक भव्य एवं विशाल शक्तिपीठ में परिवर्तित हो गई है। लगभग 35 वर्ष पूर्व जिस कच्चा रोड नामक क्षेत्र से लोग गुजरने में कतराते थे और उन्हें लूटपाट का भय रहता था वह क्षेत्र आज सैंकड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन चुका है।
कच्चा रोड टूटी पुलिया के नाम से प्रसिद्ध इस क्षेत्र में लगभग 35 वर्ष पूर्व मढिय़ा को हटाकर भव्य मंदिर का स्वरूप यहां के भक्तों द्वारा दिया गया। माता की एक अपूर्व सुंदर सिंह सवार प्रतिमा कि यहां पर विधि-विधान से प्रतिष्ठा की गई और प्रतिष्ठा के समय आचार्य और प्रतिष्ठाचार्यों ने मुहूर्त के अनुसार इस मनोहारी माता की प्रतिमा को माँ जागेश्वरी का नाम दिया।
इसके बाद भक्तों की आस्था का केंद्र बनी माँ जागेश्वरी मंदिर में बिना किसी पदाधिकारी के एक समिति माँ जागेश्वरी सेवा समिति का निर्माण किया गया और इस समिति में शामिल दर्जनों भक्तों और महिलाओं ने मिलकर श्रमदान से एक विशाल मंदिर का निर्माण करा दिया। वर्तमान में माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ मंदिर में काले पत्थर के खड्गासन में भगवान भोलेनाथ और माँ पार्वती की लगभग 5-5 फुट की मनोहारी प्रतिमाएं हैं, 3 फुट के शिवलिंग हैं जिन्हें जागेश्वरनाथ का नाम दिया है।
इसी मंदिर परिसर में भगवान श्री राधा कृष्ण के साथ 50 किलो पीतल की गौमाता कांच मंदिर में विराजमान हैं। मंदिर में माँ जागेश्वरी के साथ श्रीराम दरबार, श्री लक्ष्मीनारायण दरबार एवं श्री सांईनाथ दरबार भी अपने भव्य स्वरूपों में दिखाई देता है। मंदिर में सभी देवताओं की स्थापना के उपरांत भक्तों ने माँ जागेश्वरी की लगभग 11 किलो चांदी की पालकी निर्मित कराई और वर्ष 1993 से मातारानी को रजत पालकी में बैठाकर प्रतिवर्ष शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिवस यानि की प्रतिपदा को भव्य शोभायात्रा निकालने की परंपरा शुरू हुई। इसके बाद माँ जागेश्वरी सेवा समिति के अनन्य भक्तों ने अपनी आस्था और विश्वास को जगाते हुए श्रमदान करके लगभग 75 फुट ऊंची और लगभग 3 फुट चौड़ी पीतल की धर्मध्वजा की स्थापना की। सैंकड़ों क्विंटल पीतल की इस धर्मध्वजा में सबसे ऊपर स्वर्ण ध्वज लगाया गया। ऐसी मान्यता है कि यह धर्मध्वजा कई किलोमीटर दूर से देखने पर भक्तों के कष्ट दूर हो जाते हैं और उन्हें साक्षात माँ जागेश्वरी का आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है।
चंदेरी में माँ जागेश्वरी का मंदिर तीर्थ स्थल के रूप में माना जाता है। उन्हीं माँ जागेश्वरी की महिमा को दर्शाता बीना की माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ की दिव्यता और भव्यता से शायद ही बीना क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति अनजान हो। वर्षों पुराने कुंए के पास स्थित छोटी सी शंकर जी की मढिय़ा एवं चार पत्थरों की छोटी सी मढिय़ा में विराजमान मातेश्वरी की चमत्कारिक शक्ति अचानक इस क्षेत्र के भक्तों में भर गई और माँ जागेश्वरी मंदिर के नाम से एक भव्य माता के भवन का निर्माण जीर्णोद्धार प्रारंभ हो गया।
माँ जागेश्वरी की अतिसुंदर और मनोहारी प्रतिमा की स्थापना 1993-94 में की गई। इसके बाद लगातार इस मंदिर की प्रगति होती रही और भगवान भोलेनाथ-माँ पार्वती की भव्य मूर्तियों, सांई बाबा, राधाकृष्ण दरबार, लक्ष्मीनारायण दरबार एवं श्रीराम दरबार की सुंदर मूर्तियों के साथ इसी मंदिर में लगातार अस्सी फुट ऊंची विशाल धर्मध्वजा की स्थापना 2 क्विंटल पीतल के विशालकाय शेरों की स्थापना लगभग 150 किग्रा पीतल के विशालकाय नंदीजी व लगभग 50 किग्रा पीतल की अतिसुंदर गौमाता की स्थापना ने इस मंदिर को शक्तिपीठ का रूप दे दिया।
बताते हैं कि 40-50 वर्ष पूर्व यह क्षेत्र सुनसान था और यहां से निकलने में भी लोगों को एक भय सा बना रहता था किंतु जब से यहां माँ जागेश्वरी विराजी हैं तभी से यहां चमन बरस रहा है। माँ जागेश्वरी देवी एक जागृत देवी के रूप में मानी जाती हैं और यहां माँ के दरबार में सच्चे मन से प्रार्थना करने पर सभी की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कहते हैं कि संततिहीन महिलाओं को माता की पूजा-अर्चना के बाद संतान की प्राप्ति हुई है। इसी तरह जबलपुर के सुप्रसिद्ध माता के भजन गायक बसंत बत्रा पहली बार माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ पर भजन संध्या करके गए इसके बाद दूसरी बार वे बीना में ही कहीं और जब भजन संध्या करने आए तो मंच पर उनकी आवाज अचानक चली गई और वे भजन नहीं गा सके। बाद में जब उन्हें यह अहसास हुआ कि उनकी पहली भजन संध्या माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ पर हुई थी और उन्हें प्रणाम किए बिना मैं दूसरे स्थान पर भजन गाने आ गया, यह अहसास होते ही वे मंच से उतरकर माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ मंदिर पहुंचे, माँ जागेश्वरी से क्षमा याचना कर नमन किया और इसके बाद लौटकर जब उन्होंने भजन संध्या की तो वह बीना की ऐतिहासिक भजन संध्या बन गई। माँ जागेश्वरी के ऐसे कई चमत्कार हैं जो उल्लेखनीय हैं।
30 वर्षों से शोभायात्रा एवं भंडारा
माँ जागेश्वरी सेवा समिति के तत्वाधान में बीते 30 वर्षों से विशाल रजत पालकी शोभायात्रा का आयोजन किया जाता है जिसमें ललितपुर, विदिशा, सागर, गंजबासोदा, खुरई, बांदरी, मालथोन, मंडीबामोरा आदि सहित दर्जनों शहरों और ग्रामों के भक्तगण शामिल होते हैं। इन स्थानों से लगभग 2 दर्जन अखाड़े आते हैं जो अपने हैरतअंगेज प्रदर्शन करके माँ के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। शारदीय नवरात्रि की प्रतिपदा को आयोजित इस विशाल शोभायात्रा के साथ ही कई वर्षों से नगर भोज (भंडारा) भी संपन्न होता है। पहले यह भंडारा एक दिन होता था किंतु अब व्यवस्थाओं के चलते माता के नवरातों में 9 दिन ही बड़ी मात्रा में प्रसाद वितरण एवं भंडारा चलता है। प्रतिवर्ष दोनों नवरात्रि की पंचमी पर माँ जागेश्वरी को 56 भोग एवं महाआरती संपन्न कराई जाती है। यहां के भक्तों का यही कहना होता है कि -
तमन्ना लाख करते हैं, तमन्ना टूट जाती है।
माँ जागेश्वरी के दरबार में वही आते हैं जिन्हें माता बुलाती है॥
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जब गायक को आना पड़ा मां जागेश्वरी की शरण में
जबलपुर के सुप्रसिद्ध माता के भजन गायक बसंत बत्रा पहली बार माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ पर भजन संध्या करके गए इसके बाद दूसरी बार वे बीना में ही अन्य स्थान पर आयोजित भजन संध्या में आए तो मंच पर उनकी आवाज अचानक चली गई और वे भजन नहीं गा सके। बाद में जब उन्हें यह अहसास हुआ कि उनकी पहली भजन संध्या माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ पर हुई थी और उन्हें प्रणाम किए बिना मैं दूसरे स्थान पर भजन गाने आ गया, यह अहसास होते ही वे मंच से उतरकर माँ जागेश्वरी शक्तिपीठ मंदिर पहुंचे, माँ जागेश्वरी से क्षमा याचना कर नमन किया और इसके बाद लौटकर जब उन्होंने भजन संध्या की तो वह बीना की ऐतिहासिक भजन संध्या बन गई।
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प्राचीन माता को नमन करना नहीं भूलते भक्त
जहां आज जागेश्वरी मां विराजमान है वहां पहले एक छोटी सी मढिय़ा में प्राचीन माता का विग्रह विराजमान था। नए मंदिर की स्थापना के बाद प्राचीन माता जी का विग्रह भी भक्तों के लिए स्थापित किया गया है। कहते है प्राचीन माता जी के दर्शन के बिना जागेश्वरी की आराधना अधूरी रहती है। इसलिए मंदिर में आने वाले भक्त प्राचीन माता जी से आर्शीवाद लेना नहीं भूलते। 
