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द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन पूजा के समय सुनें ये व्रत कथा, वैवाहिक जीवन रहेगा खुशहाल!
Dharm Desk
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि रहती है. इस दिन भगवान के व्रत और पूजन से सभी दुख दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूरी जाती हैं. इस दिन पूजा के समय कथा भी अवश्य पढ़नी या सुननी चाहिए.
हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व है. फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कहलाती है. द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश का पूजन और व्रत किया जाता है. इस दिन भगवान के व्रत और पूजन से सभी दुख दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. इस दिन व्रत और पूजन करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि रहती है. साथ ही इस दिन पूजा के समय कथा पढ़ने या सुनने से वैवाहक जीवन खुशहाल रहता है.
कब है द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी ?
हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 15 फरवरी दिन शनिवार को रात 11 बजकर 52 मिनट पर शुरू हो जाएगी. इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 17 फरवरी दिन सोमवार को तड़के सुबह 2 बजकर 15 मिनट पर हो जाएगा. ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 16 फरवरी को रहेगी. इसी दिन इसका व्रत भी रखा जाएगा.
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
प्राचीन काल में एक युवनाश्व नाम के राजा थे. राजा के राज्य में विष्णुशर्मा नाम का एक तपस्वी ब्राह्मण निवास करता था. ब्राह्मण के सात पुत्र थे. सभी धन धान्य से समृद्ध थे. परिवार में कलह के चलते सब अलग हो चुके थे. ब्राह्मण हर पुत्र के घर में क्रमश: एक-एक दिन भोजन करता था. समय बीतने के साथ वो बूढ़ा और कमजोर हो गया. बूढ़ापे की वजह से उसकी सभी बहुएं उसका अनादर करने लगीं.
एक समय की बात है ब्राह्मण द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखकर अपनी बड़ी बहु के घर गया. ब्राह्मण ने कहा आज द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत है. तुम पूजा की सामग्री एकत्र कर दो. भगवान प्रसन्न होकर तुम्हें खूब धन देंगे. ब्राह्मण की बात सुनकर बहु कठोर स्वर में बोली ससुर जी मुझे घर के कामों से फुरसत नहीं है. मैं इस झमेले में नहीं पड़ना चाहती और ये कहकर ब्राह्मण की बड़ी बहु ने पूजा की सामग्री एकत्र करने से मना कर दिया. इसके बाद ब्राह्मण बारी-बारी 6 बहुओं के पास गए. उन सभी ने भी मना कर दिया.
इसके बाद ब्राह्मण अपनी सबसे छोटी बहु के घर जाकर बैठ गया. छोटी बहु बहुत निर्धन थी. ब्राह्मण ने इस व्रत की महीमा के बारे में छोटी बहु को बताया. साथ ही ये भी बाताया कि किसी भी बहु ने उसे पूजा की सामग्री एकत्र करके नहीं दी. इस पर ब्राह्मण की छोटी बहु ने उससे कहा कि आप व्रत कीजिए. मैं भी इस व्रत को करूंगी. इतना कहकर ब्राह्मण की छोटी बहु भिक्षा मांगने चली गई. वो भीक्षा मांगकर अनेक समान लाई. अलग-अलग लड्डू बनाए. चंदन, फूल, फल, धूप, दीप नैवेद्य रखकर विधि-पूर्वक भगवान गणेश की पूजान और व्रत किया. इससे भगवान गणेश प्रसन्न हुए और ब्राह्मण की छोटी बहु की दरिद्रता और निर्धनता दूर हो गई.
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द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन पूजा के समय सुनें ये व्रत कथा, वैवाहिक जीवन रहेगा खुशहाल!
Dharm Desk
हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व है. फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कहलाती है. द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश का पूजन और व्रत किया जाता है. इस दिन भगवान के व्रत और पूजन से सभी दुख दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. इस दिन व्रत और पूजन करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि रहती है. साथ ही इस दिन पूजा के समय कथा पढ़ने या सुनने से वैवाहक जीवन खुशहाल रहता है.
कब है द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी ?
हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 15 फरवरी दिन शनिवार को रात 11 बजकर 52 मिनट पर शुरू हो जाएगी. इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 17 फरवरी दिन सोमवार को तड़के सुबह 2 बजकर 15 मिनट पर हो जाएगा. ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 16 फरवरी को रहेगी. इसी दिन इसका व्रत भी रखा जाएगा.
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
प्राचीन काल में एक युवनाश्व नाम के राजा थे. राजा के राज्य में विष्णुशर्मा नाम का एक तपस्वी ब्राह्मण निवास करता था. ब्राह्मण के सात पुत्र थे. सभी धन धान्य से समृद्ध थे. परिवार में कलह के चलते सब अलग हो चुके थे. ब्राह्मण हर पुत्र के घर में क्रमश: एक-एक दिन भोजन करता था. समय बीतने के साथ वो बूढ़ा और कमजोर हो गया. बूढ़ापे की वजह से उसकी सभी बहुएं उसका अनादर करने लगीं.
एक समय की बात है ब्राह्मण द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखकर अपनी बड़ी बहु के घर गया. ब्राह्मण ने कहा आज द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत है. तुम पूजा की सामग्री एकत्र कर दो. भगवान प्रसन्न होकर तुम्हें खूब धन देंगे. ब्राह्मण की बात सुनकर बहु कठोर स्वर में बोली ससुर जी मुझे घर के कामों से फुरसत नहीं है. मैं इस झमेले में नहीं पड़ना चाहती और ये कहकर ब्राह्मण की बड़ी बहु ने पूजा की सामग्री एकत्र करने से मना कर दिया. इसके बाद ब्राह्मण बारी-बारी 6 बहुओं के पास गए. उन सभी ने भी मना कर दिया.
इसके बाद ब्राह्मण अपनी सबसे छोटी बहु के घर जाकर बैठ गया. छोटी बहु बहुत निर्धन थी. ब्राह्मण ने इस व्रत की महीमा के बारे में छोटी बहु को बताया. साथ ही ये भी बाताया कि किसी भी बहु ने उसे पूजा की सामग्री एकत्र करके नहीं दी. इस पर ब्राह्मण की छोटी बहु ने उससे कहा कि आप व्रत कीजिए. मैं भी इस व्रत को करूंगी. इतना कहकर ब्राह्मण की छोटी बहु भिक्षा मांगने चली गई. वो भीक्षा मांगकर अनेक समान लाई. अलग-अलग लड्डू बनाए. चंदन, फूल, फल, धूप, दीप नैवेद्य रखकर विधि-पूर्वक भगवान गणेश की पूजान और व्रत किया. इससे भगवान गणेश प्रसन्न हुए और ब्राह्मण की छोटी बहु की दरिद्रता और निर्धनता दूर हो गई.
